शनिवार, 7 नवंबर 2020

मधुपुर डायरी - ३

नवम्बर लौटने का महीना है। किसान खेतों में लौट रहे हैं। बाहर मजदूरी करने गए लोग फिर से गाँव लौट रहे हैं। ठंढ भी अब धीरे-धीरे लौटने लगी है। गाँव के बड़े तालाब में साइबेरियन पक्षी फिर से लौटने लगे हैं। टूटे हुए खलिहान को सँवारने, महिलाएं खलिहान लौट रही हैं और लौट रहा है धान का सुनहला रंग।

धान की कटाई अब शुरू हो गई है। कोरोना के संत्रास के बीच किसानों के लिए सुखद यह कि इंद्रदेव की कृपा से इस साल की उपज ठीक होने वाली है।

बिहार चुनाव सम्पन्न हो गए हैं। एक्जिट पोल आने लगे हैं। बैठकों की बतकही में इन मुद्दों ने भी अपना जगह घेर रखा है। लेकिन किसानों को इन सब बातों से कोई सरोकार नहीं है। वो धान की बालियों को देखकर अपने हिसाब से उपज का एक्जिट पोल निकालते हैं और उससे होने वाली कमाई को सोचकर मुस्कुराते हुए फसल पर हंसिया चलाते हैं....

गुरुवार, 29 अक्टूबर 2020

मधुपुर डायरी -२

माता रानी की प्रतिमा के विसर्जन के साथ दुर्गापूजा का समापन हो चुका है। इस साल के दुर्गापूजा का उमंग कोरोना के कारण फीका-फीका सा रहा यहाँ। कोरोना प्रोटोकॉल के तहत प्रसाशन के आदेशानुसार पंडाल नहीं बनाये गए थे, रावण दहन का कार्यक्रम भी आयोजित नहीं किया गया था। सब कुछ सादा-सादा सा ही खत्म हो गया।  
ये अलग बात है कि मधुपुर विधानसभा के निर्वाचित जनप्रतिनिधि के आकस्मिक निधन के कारण, खाली हुए इस विधानसभा में उपचुनाव जल्द ही होने वाले हैं। उस समय रेलियाँ भी होंगीं, सभाएं भी आयोजित की जायेंगीं और भीड़ तो इक्कट्ठा होगा ही। अब चुनाव में कोरोना को भाव देता ही कौन है। बिहार में ही देख लीजिए।
ख़ैर अब जो है सो है। फिलहाल मैं बहन घर से आये हुए बालूशाही का आनन्द लेते हुए यह सोच रहा हूँ की देवघर का पेड़ा ही केवल मशहूर नहीं है। पांडे दुकान का बालूशाही का भी अपना ही स्वाद है....

मंगलवार, 27 अक्टूबर 2020

मधुपुर डायरी-१

ऑक्सीजन की कमी से फड़फड़ाता हुआ फेफड़ा दिल्ली छोड़ जब गाँव में पहुँचता है तो उसे सहजता से यह महसूस होने लगता है कि हवा की भी अपनी मोटाई होती है और वजन तो होता ही है। 

कोरोना का डर अब धीरे-धीरे बड़े शहरों में ही जैसे सिमटने लगा है। यहाँ कम लोग ही मास्क लगा रहे हैं (समाजिक दूरी तो खैर अब कहीं रहा ही नहीं है)। लेकिन इन सबों के बीच सुखद यह कि संक्रमण का दर गाँवों में नहीं के बराबर है। ऐसा शायद इसलिए भी की गाँव की दिनचर्या शहरी लोगों से आज भी काफी बेहतर है। प्रदूषण के बढ़ते स्तर ने शहरी जीवन को किस स्तर तक प्रभावित किया है इसका अंदाजा शहरी संक्रमण दर को देख कर सहजतापूर्वक  ही लगाया जा सकता है। 

इन सब बातों को सोचते हुए घर के बालकॉनी में बैठा हुआ हूँ। कार्तिक महीने के शुक्लपक्ष का चंद्रमा धीरे-धीरे जवान होता जा रहा है। सामने बगीचे में लगे सागौन के पेड़ों की मद्धम हवा चल रही है और मैं अपने फेफड़े में इस ताजी हवा को ठूँस कर उसे फिर से जवान करना चाह रहा हूँ....

रविवार, 16 अगस्त 2020

मैं पल दो पल का शायर हूँ...

धोनी कल रिटायर्ड हो गए। एक छोटे से इंस्टाग्राम वीडियो के मार्फ़त धोनी ने लोगों को बताया कि उन्होंने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के सभी फॉर्मेट से सन्यास ले लिया है। उनके प्रशंसकों कि यह चाह थी की धोनी अपना आख़री मैच मैदान पर खेलने उतरते और सम्भवतः यह भी तमन्ना कि वो विजयी छक्के से अपनी अंतिम पारी को घोषित करते! लेकिन धोनी ने हमेशा सम्भावनाओं से आगे बढ़कर खेल खेला है। रिटायरमेंट का उनका यह मास्टरस्ट्रोक भी शायद उसी खेल का आखरी हिस्सा रहा हो। 

लम्बे बालों वाले हेलीकॉप्टर शॉट के जनक के रूप में प्रसिध्दि प्राप्त करने वाले खिलाड़ी से कैप्टन कूल तक का उनका सफर क्रिकेट प्रशंसकों के लिए हमेशा ही हर्षदायक रहा। बतौर कैप्टन, गाँगुली से प्राप्त भारतीय क्रिकेट टीम की विरासत (द्रविड़ को छोड़ते हैं) को धोनी ने उन सभी क्षेत्रों में इनरीच किया जिसकी कमी से भारतीय टीम जीत के आखरी लम्हों को भुना पाने में असमर्थ रह जाती थी। 

यह सब इतना आसान भी नहीं था। आईसीसी के सभी तीनों ट्रॉफियों को जीतने वाले कैप्टन कुल ने क्रिकेट में कभी निज स्वार्थ के लिए जगह नहीं ढूंढा। जीत को जब भी धोनी की जरूरत पड़ी धोनी ने उसी अनुरूप अपनेआप को वहाँ फिट करने का सफल प्रयास किया। 

खेल के आखरी गेंद तक पराजय की रथ को विजय जुलूस के पथ पर मोड़ देने वाले महेंद्र सिंह हमेशा ही आस पास की परिस्थितियों से सांत्वनाशून्य भाव लिए ही अपने आप को परिचित करवाते रहते थे। फिर वो विश्वकप का विश्वविजयी छक्का हो या पिछले विश्वकप के सेमीफाइनल में रन आउट होकर पेवेलियन लौटता धोनी हो। धोनी जब बहुत गदगद होते थे तब थोड़ी मुस्कान अपने चेहरे पर बिखेरते थे पर दर्शकों की स्मृति में विरले ही ऐसी घटना अंकित हुई हों जब धोनी ने शतक लगा कर भुजाओं को लहराते हुए अपना दम्भ प्रदर्शित किया हो।

कैप्टन कूल का क्रिकेट को छोड़ना एक ऐसा वैक्यूम है जिसे शायद धोनी ही पूरा कर सकते हैं..

गुरुवार, 2 जुलाई 2020

उसेन बोल्ट और ट्रिपल-ट्रिपल ......

वोल्ट हँसते हुए कहते हैं कि आप सौ आदमियों को कतार में खड़ा कर बारी-बारी से बास्केटबॉल, फुटबॉल या क्रिकेट के विश्वप्रसिद्ध खिलाड़ियों के नाम को पूछें !
ऐसा करने से इस बात की शत-प्रतिशत सम्भावना बनी रहेगी कि उनकी सहमति किसी एक खिलाड़ी के नाम पर ना बने। लेकिन अगर आप उनसे दुनियाँ के सबसे बेहतरीन धावक का नाम पूछेंगे तो इस बात की भी शत-प्रतिशत सम्भावना रहेगी कि वो एक ही नाम लेंगें "उसेन बोल्ट" !
दरअसल ये उनके मन मे उपजा हुआ विश्वास है जिसे अर्जित करने के लिए समर्पण के इस यज्ञ कुंड में मैंने अपना सर्वस्व आहूत कर दिया था। 6.8 बिलियन जनसंख्या वाली दुनियाँ में, आजतक लगभग 107 बिलियन लोग रह चुके हैं। लेकिन जब आप यह जानते हैं कि आप इन सबों में सबसे तेज हैं तो यह आश्चर्यजनक सा लगता है। "इट डजन्ट गेट ऐनी कूलर देन नोइंग यू आर द फास्टेस्ट देन देम"।
15 साल की उम्र में ही विश्व जूनियर एथिलट चैम्पियनशिप में गोल्ड मैडल जितने वाले बोल्ट ने जब 2004 के एथेंस ऑलम्पिक के ट्रेक पर अपना डेब्यु किया था, तो दर्शकों की करतल ध्वनियाँ बोल्ट के सहर्ष अभिवादन को आतुर थीं। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। कम उम्र में ही मिली सफलता और उससे उपजे उन्माद को पचा पाने में असफल रहे बोल्ट की अनियमित दिनचर्या ने उनके रफ़्तार को असाधारण रूप से छति पहुंचाई थी। बोल्ट को छठे पायदान से ही संतोष करना पड़ा था।
हालांकि ये हार बोल्ट द्वारा साध्य कर पाना कठिन था, अपितु, उनके कैरियर के उत्थान का वास्तविक प्रारूप इस हार ने ही ड्राफ्ट किया था। बोल्ट ने यहाँ से पीछे मुड़ कर कभी नहीं देखा। वो मैदान पर उतरते और पुराने रिकॉर्ड को ध्वस्त कर नए कीर्तिमान स्थापित करते। कई बार दूसरे खिलाड़ियों का और कई बार खुद के ही स्थापित रिकॉर्डों का!
2008 के बीजिंग, 2012 के लंदन और 2016 के रियो ऑलम्पिक में 100 मीटर और 200 मीटर के दौड़ में रफ्तार के इस अजेय योद्धा ने स्वर्ण पदकों की झड़ी लगा दी। बोल्ट ने अपने सभी प्रतिस्पर्धाओं के स्वर्ण पदकों को अपने नाम कर लिया था। तीन ओलम्पिक और हर पर्तिस्पर्धा के तीनो स्वर्ण पदक। बोल्ट, कार्ल लुइस के रिकॉर्ड को तोड़ कर ऐसा कारनामा कर इतिहास रच लिया था। ट्रिपल-ट्रिपल...
बोल्ट आगे कहते हैं कि लोग अक्सर मुझसे पूछते रहते हैं, क्या ऐसा करना आसान है? "इट्स प्रिटी कुल एंड इजियर"। मैं अक्सर उन्हें यही जवाब देता हूँ। लेकिन वास्तव में ये सब इतना आसान नहीं है। बोल्ट को बोल्ट बने रहने की पीछे घण्टों का संयमित मेहनत और उससे उपजता थकावट है। जिससे बोल्ट को नियमित जूझना पड़ता है। लोगों को जीत पसंद होती है और वो वही देखना चाहते हैं। उन्हें पर्दे के पीछे चलने वाले संघर्षों से कोई राब्ता नहीं होता है..


जस्टिन गैटलिन की चुनौती और बोल्ट द्वारा अपने बादशाहत को क़ायम रखना.....

साल 2016 के रियो ऑलम्पिक की तैयारियाँ आखरी छोर पर खड़ी थी। बीजिंग और लंदन में आयोजित पिछले दो ऑलम्पिक के दौरान रफ़्तार में अपनी बादशाहत कायम कर चुके बोल्ट, 100, 200 और 400 मीटर रीले के सभी स्वर्ण पदकों को अपने नाम कर, विरोधियों को यह बता चुके थे कि असल मे रफ़्तार के वो ही क्षत्राधिपति हैं।
इधर बोल्ट को अपना चिरप्रतिद्वंद्वी मानने वाले जस्टिन गैटलिन पर लगा प्रतिबंध अब तक खत्म हो चुका था। एक इंटरव्यू के दौरान पूछे गए सवाल पर गैटलिन ने जवाब देते हुए कहा था कि "विजयी राष्ट्र ध्वजवाहक गैटलिन ही होगा" । दरअसल ये चुनोती सीधे-सीधे बोल्ट को थी। हालाँकि, बोल्ट ने गैटलिन के इस चुनौती का कोई मौखिक जवाब तो नहीं दिया था लेकिन उनके दिनचर्या को इस चुनौती ने प्रभावित तो किया ही था। बोल्ट हंसते हुए आगे कहते हैं "गैटलिन की स्ट्रेटजी काम कर गई थी" ।
लेकिन कठोर परिश्रम को चुनोतियों ने कब तक प्रभावित किया है भला! बोल्ट और गैटलिन अब ट्रैक पर फिर से आमने-सामने थे। बोल्ट ने पुनः सौ, दो सौ, और चार सौ मीटर रीले के सभी प्रतिस्पर्धाओं के स्वर्ण पदक को आपने नाम कर लिया था।
दौड़ खत्म होने के बाद फफ़कते हुए जस्टिन गैटलिन को बोल्ट ने गले लगा कर यह स्थापित किया की खिलाड़ियों के लिए जीत के साथ-साथ दूसरे खिलाड़ियों की भावनाओं का सम्मान महत्वपूर्ण होता है। दर्शकों की करतल ध्वनियाँ बजती रही। प्रशंसकों के नजर में बोल्ट का कद और भी बढ़ता गया। आखीर,यूँ ही तो कोई चैम्पियन नहीं बन जाता है ....
(तस्वीर में गैटलिन हैं । बोल्ट को कौन नही जानता ! उनका भला परिचय क्यों कराया जाए!)

दौड़ का इतिहास और उसेन बोल्ट....

आदमी अनादि काल से दौड़ता रहा है। सभ्यता के विकासपूर्व में मनुष्य भोजन की तालाश में दौड़ता था और सभ्यता के उत्तरार्ध में अब भी इसकी दौड़ जारी है।
एक सैनिक ने ऐसी ही दौड़ ईसा से 490 ईस्वी पूर्व, युद्ध मे जीत की खुशखबरी को अपने राजा तक पहुँचाने के लिए "मैराथन" से "एथेंस" तक बिना रुके ही लगाया था।
समय के साथ उस सैनिक की किंवन्दतियाँ भी आगे बढ़ती गयीं और अंत मे उसके सम्मान में दुनियाँ भर में दौड़ प्रतियोगितायें आयोजित होने लगीं। प्रतियोगिता शुरू हुआ तो सर्वश्रेष्ठ धावकों (जिसकी सूची काफी लंबी है) ने अपनी कीर्ति को स्थापित कर नए-नए कीर्तिमान बनाये। एक बनाता तो दूसरा उसे तोड़ उससे भी श्रेष्ठ कीर्ति स्थापित करता। समय आगे बढ़ता गया और सर्वश्रेष्ठ धावकों की सूची लम्बी होती गई।
मेरे लिए सर्वश्रेष्ठ धावक के रूप में पहला नाम जमैका के "असफा पॉवेल" थे। इसमे कोई दो मत नहीं है कि इनके पहले भी कई दिग्गजों ने अपनी कीर्ति यहाँ स्थापित की थी। लेकिन, पढाई के दौरान मेरे द्वारा किसी धावक का पहला परिचय पॉवेल ने उस समय कराया था जब उन्होंने 2005 में 100 मीटर रीले को 9.77 सेकेंड में दौड़ कर विश्वखेल जगत में अपना झंडा लहराया था।
पहला परिचय लोगों को बहुत दिनों तक याद रहता है इस कारन पॉवेल आज भी मुझे प्रिय हैं। फिर जस्टिन गैटलिन आ गए। कुछ दिन रुके और डोप टेस्ट में फेल होने के बाद कहीं नेपथ्य में गुम हो गए। अब बोल्ट आ गए थे। "उसेन सेंट लियो बोल्ट"। बोल्ट आये, रफ़्तार के आश्चर्यजनक कीर्तिमान को स्थापित किया और अपने कैरियर के उत्थान पर विराजित रहते हुए ही 2017 में इस खेल से विदा ले लिया। पॉवेल मेरे प्रिय रहे हैं लेकिन बोल्ट जैसा कोई नहीं !
कार्ल लुइस से क्षमा याचना के साथ......
(तस्वीरें इंटरनेट से ली गई हैं। बांयें से क्रम में पॉवेल, गैटलिन और बोल्ट हैं)


कारगिल विजय के इक्कीस साल.......

कारगिल - बटालिक सैक्टर - तासी नामगियाल - कैप्टन सौरभ कालिया और ऑपरेशन विजय की शुरुआत.....
उन्नीस सौ निन्यानबे का अप्रेल अपने आखरी दिनों में था। कारगिल के बटालिक सैक्टर के नजदीक "गेरकोन" गाँव में रहने वाले तासी नामगियाल का याक जिसे उन्होंने 12 हजार रुपए से खरीदा था, पिछले तीन-चार दिनों से घर नहीं लौटा था। तासी नामगियाल अपने बायनाकुलर और कुछ साथियों के साथ अपने याक को खोजने पहाड़ों की तरफ आगे बढ़े। बायनाकुलर के सहारे तासी नामगियाल ने अपने याक को तो खोज लिया था लेकिन इस दौरान उन्हें चोटियों के ऊपर आर्मी के वर्दी में बंकर बनाते कुछ लोग भी दिख गए थे जिनकी एपियरेंस पठानों की जैसी थी और उनके पास बंदूके भी थीं।
तासी नामगियाल अपने गाँव लौट कर इस खबर की सूचना, उनके गाँव मे ही रुके सेना के पंजाब रेजिमेंट के जवानों तक पहुँचा दिया था। सेना में यह खबर आग की तरह आगे बढ़ी। सेना ने वास्तविक स्थिति का पता लगाने के लिए कई पैट्रोल टीमों का गठन एक साथ किया था। लेफ्टिनेंट सौरभ कालिया के कमांड में भी एक पैट्रोल पार्टी को एडवांस करने का आदेश मिला था।
पढाई के दिनों में स्कॉलरशिप पाने वाले लेफ्टिनेंट सौरभ कालिया ने दिसम्बर 1998 में भारतीय सेना के फोर्थ जाट रेजिमेंट को जॉइन किया था और उनकी प्रतिनियुक्ति 1999 के हाल के दिनों में ही कारगिल में हुई थी। लेफ्टिनेंट कालिया ने अपने गस्त के दौरान यह पाया कि पहाड़ की चोटियों पर कुछ संदिग्ध लोग भारतीय बंकरों (पाकिस्तान और भारत की सेना एक समझौते के तहत ठंडे के दिनों में अपने-अपने बंकरों को खाली छोड़ पहाड़ के नीचे चले आते थे) में अपनी बन्दूकों और भारी मसीनगनों को माउंट कर रखा था। लेफ्टिनेंट सौरभ कालिया ने इस खबर को सेना तक सबसे पहले पहुंचा दिया था।
पंद्रह मई 1999 को लेफ्टिनेंट सौरभ कालिया अपने पाँच जवान साथियों के साथ जब काकसर सैक्टर के बजरंग पोस्ट की पैट्रोलिंग करते हुए आगे बढ़े थे कि अचानक ही उनकी पैट्रोल पार्टी पर पहाड़ की चोटियों से ताबड़तोड़ गोलियों की बौछारें आनी शुरू हो गईं। लेफ्टिनेंट सौरभ कालिया और उनके साथियों की गोलियां लगातार खत्म हो रही थी। उन्होंने मदद के लिए बैकप का सन्देश रेडियो सेट से रीले किया। लेकिन जब तक भारतीय सेना की रिइंफोर्समेंट उन तक पहुँचती पाकिस्तानी सैनिकों ने सौरभ कालिया और उनके पाँच साथियों को जिंदा ही पकड़ लिया था।
गोपनीय तथ्यों को उगलवाने के लिए पाकिस्तानी सैनिकों ने लेफ्टिनेंट सौरभ कालिया और उनके साथी जवानों को सात जून 1999 (22 दिन) तक क्रूरता के आखरी छोर तक प्रताड़ित किया। लेकिन भारतीय सेना के बहादुर जवानों की सत्यनिष्ठ देशभक्ति से हार कर पाकिस्तानी सैनिकों को जब कुछ हासिल नहीं हो पाया तो अन्ततः इन्हें जान से मार दिया गया। असहनीय पीड़ा को हँसी-हँसी बर्दास्त करते हुए भारत माता के ये वीर सपूत वीरगति को प्राप्त हुए थे।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट पाकिस्तानी सैनिकों की नीचता और क्रूरता को तस्दीक करते हुए यह कहती है कि उनके कानों में गर्म सलाखें डाल दी गई थी। दाँत निकाल लिए गए थे। आँखें निकालने से पहले उन्हें बुरी तरह से छतिग्रस्त किया गया था। जबड़े तौड़ दिए गए थे। होंठों को काट लिया गया था। नाक तोड़ दिए गए। हड्डियाँ तोड़ दी गईं थी आगे और भी बहुत कुछ है जिन्हें नहीं लिखा जा सकता है....।
लेफ्टिनेंट सौरभ कालिया और साथी जवानों की शहादत के प्रतिशोध में भारतीय सेना ने अब ऑपरेशन विजय का आरम्भ किया था ।

मंगलवार, 26 मई 2020

मृत्यु पर आयोजित होने वाले भोज का विकृत चेहरा.....

शास्त्रों में वर्णित मानव जीवन के १६ संस्कारों ( वर्तमान परिदृश्य में आधे पर ही सिमटे हुए ) में मृत्यु, अंतिम संस्कार है । इसके आगे किसी संस्कार का वर्णन किसी पुराण,उपनिषद या ग्रंथ में नहीं मिलता है । मृत्यु के बाद आत्मा,परात्मा और पितरों का जिक्र पुराणों और उपनिषदों में तो है पर श्रीमद्भागवत इन सब से ऊपर है ।  (आत्मा, परात्मा और ऊर्जा के संचरण के बारे में अगले पोस्ट में)
फ़िर चाहे कठोपनिषद में नचिकेता-यम संवाद हो, गरुड़ पुराण में स्वर्गारोहण का आख्यान हो या छान्दोग्य उपनिषद में मानव जीवन की चर्चा हो । श्रीमद्भागवत में इन सबों का जिक्र अलग तरीके से किया गया है । महाभारत के अनुशासन पर्व में इस बात का जिक्र है कि जब भगवान श्रीकृष्ण की युद्ध संधि को दुर्योधन ने ठुकरा कर उन्हे भोजन ग्रहण के लिए आमंत्रित किया था तो भगवन श्रीकृष्ण ने कहा था :- "सम्प्रीति भोज्यानि आपदा भोज्यानि वा पुनैः’’ अर्थात् , जब खिलाने वाले का मन प्रसन्न हो, खाने वाले का मन प्रसन्न हो, तभी भोजन करना चाहिए। लेकिन जब खिलाने वाले एवं खाने वालों के दिल में दर्द हो, वेदना हो, तो ऐसी स्थिति में कदापि भोजन नहीं करना चाहिए।”
जहां तक कर्मकांडों की बात है तो मृत्यु के बाद पितरों के सम्मान के लिये आयोजित कर्मकांड "कपालमोचन क्रिया" से प्रारंभ होकर ११ वें और १२ वें दिन कर्ता द्वारा पिंडदान और फिर ब्राम्हण भोजन पर आकर ख़त्म होती है । इस क्रिया में पितरों के प्रति श्रद्धा और परलोक में सद्गति के लिए सामर्थ्य अनुसार दान और खाद्य पदार्थों के पिंड को भोज्य के रूप में दान दिया जाता है ।
कर्मकांड, पिंडदान और अंततः ब्राम्हण भोजन की क्रिया एक सम्पूर्ण प्रक्रिया है । जिससे पितरों के सद्गति का मार्ग प्रशस्त होता है और वंसजों को अपने दायित्व से मुक्ति मिलती है । शास्त्रों में इस बात का जिक्र कहीं नहीं है कि मृत्यु भोज में कितने लोगों को भोजन ग्रहण कराया जाना चाहिए। एक, सौ या एक हज़ार ।
लेकिन आज़कल मृत्यु पर आयोजित होने वाला आडम्बर कर्मकांड कम, सामर्थ्य का स्वांग और जश्न ज्यादा हो गया है जो सर्वथा व्यर्थ और अनुचित है (यहाँ कर्मकांड और जश्न में अंतर समझने की जरूरत है ) । चुकी यह प्रथा समाज के हर तबके में व्याप्त है और मृत्युभोज तब और भी वीभत्स हो जाता है जब समाज का निष्ठुर हृदय एक गरीब को ऋण लेकर/जमीन गिरवी रख कर भी मृत्युभोज के आयोजन करने को बाध्य करता है । तब यह ज़रूरी हो जाता है कि मृत्युभोज का आडम्बर बंद हो जाना चाहिए। (इसमें ब्राम्हण भोजन को नहीं जोड़ें) ।

(एक वास्तविक घटना से मन व्यग्र था। तिथि थी २६ अगस्त २०१९

सोमवार, 25 मई 2020

"आत्मा वा अरे मंतव्यः श्रोतवयः निदिध्या- सितव्य !"

महर्षि शुक्राचार्य ने कठोर तपोबल से संजीवनी विद्या अर्जित कर लिया था । दानव दलों के कानों में देवताओं पर जीत के विजयनादों की गूँज अब धीरे-धीरे बढ़ने लगी थी । 

संजीवनी के अलौकिक विद्या के सामर्थ्य से, देवताओं का दानवों के हाथों पराभूत होने के पूर्वाभास से महर्षि अंगिरस ने इस महासमर को रोकने के लिए शांति यज्ञ का अनुष्ठान, आहूत किया था ।

देवऋषि बृहस्पतिपुत्र 'कच' को शांतियज्ञ के प्रमुख ऋत्विक बनने के लिए आमंत्रण भेजा गया था । ऋषिपुत्र कच उम्र में तो छोटा था लेकिन उन्होंने एकनिष्ठ समर्पण से शिष्य परम्परा के सर्वोच्च प्रतिमान को छू कर सभी ब्रम्हविद्याओं को उपार्जित किया था । 

महर्षि अंगिरस और कच के सम्पूर्ण समर्पण से शांतियज्ञ  निर्विघ्न सम्पन्न तो हो गया था बावजूद इसके भी देवासुर
संग्राम को टाला नहीं जा सका । 

दानव, देवताओं के हाँथों मारे जाते लेकिन शुक्राचार्य संजीवनी विद्या से उन्हें पुर्नजीवित कर देते । शुक्राचार्य के पास जब तक संजीवनी विद्या थी तब तक देवताओं का पराभव निश्चित था । 

शांतियज्ञ के अभीष्ठ परिणाम प्राप्त नहीं होने के कारण ऋषिपुत्र कच ने शुक्राचार्य के सानिध्य में जाकर संजीवनी विद्या को प्राप्त करने का दुरूह निर्णय कर लिया । राक्षसों के राज में, राक्षसों से घिरे, राक्षसों के गुरु का, ऋषिपुत्र द्वारा अपने गुरु बनाने की प्रर्थना, मृत्यु को आमंत्रण था लेकिन कच अपनी आत्मा की उद्गार को सुनता था । "आत्मा वा अरे मंतव्यः श्रोतवयः निदिध्या- सितव्य !" 

अपने तेजस्वी और सुविचारी अनुशासन के प्रभुत्व से कच ने शुक्राचार्य के सबसे प्रिय शिष्य की पदवी प्राप्त कर ली थी । गुरुपुत्री "देवयानी" भी कच के आचरणों से प्रसन्न रहती थीं । लेकिन एक ऋषिकुमार की प्रशंसायुक्त ख्याति से हतप्रभ राक्षसों ने एक दिन कच का वध कर उसके शरीर के टुकडों में विभक्त कर भेड़ियों के सम्मुख फेंक दिया था । शुक्राचार्य की दृष्टि मृत कच के कटे हुए मस्तक पर गई तो उन्होंने अपनी संजीवनी से कच को पुनः जीवित कर दिया । 

समय बीतता गया । कच का  देवयानी(गुरुपुत्री), शर्मिष्ठा(राक्षसराज पुत्री) और गुरु शुक्राचार्य से सम्बंध अत्यंत घनिष्ठ होते गए । 

राक्षसों ने पुनः षड्यंत्र रचा, कच को जिंदा जला कर उसके चिताभस्म को मदिरा में मिलाकर शुक्राचार्य को पिला दिया गया । लेकिन जब उन्हें यह ज्ञात हुआ तो क्रोधित शुक्राचार्य ने अपने प्रचंड तपोबल के प्रभाव से कच को पुनः जीवित कर दिया । लेकिन कच अब संजीवनी विद्या को प्राप्त कर चुका था । उसने राक्षस गुरु के देह के अंदर रहते हुए उनसे ये विद्या स्वतः ग्रहण कर लिया था । 

कच अब देवताओं के पक्ष में था । असुरों ने देवताओं से भयभीत होकर देवासुर संग्राम की संधि कर ली थी । शुक्राचार्य की संजीवनी विद्या का अब नाश हो चुका था । पृथ्वी पर शांति थी ।


आशय :- 

आत्मा वा अरे मंतव्यः श्रोतवयः निदिध्या- सितव्य  :- 
आत्मा के स्वरूप का चिंतन करें, आत्मा की पुकार सुनें और आत्मज्ञान को ही अपना लक्ष्य बनाएं ।

शनिवार, 23 मई 2020

स्मृतियों का मायालोक

स्मृतियों का अपना मायालोक है । जन्म से जरा और जरा से मृत्यु तक के चैतन्यरहित यात्रा में स्मृतियाँ, लाठी की टेक होती हैं, जिनके सहारे जीवन अपने उबड़- खाबड़ व्यवधान भरे रास्ते को पार करता रहता है । 

स्मृतियों की अनुपस्थिति में मनुष्य, वीरान रास्ते में पड़ने वाले उस जल विहीन कुवें के समान होता है, जिसे देख प्यास से त्रस्त पथिक पूर्ण अभिलाशा से दौड़ लगता तो है लेकिन उसके अंदर झांक कर निरास हो लौटता है । 

स्मृतियों का शून्य हो जाना, जीवन की समाप्ति है । मृत्यु पूर्व, स्मृतियों का शून्य हो जाना भी मृत्यु समान ही है । स्मृतियाँ हैं तो जीवन की सार्थकता बनी रहती है। स्मृति रहित जीवन का भला क्या मोल !

क्लाइव जो ब्रिटेन का एक मशहूर संगीत सम्पादक था, दिमागी बीमारी के कारण छब्बीस साल की उम्र में सब कुछ भूल गया था । डेब्रा (पत्नी) उसे कुछ दिनों तक सम्भालती रहीं और फिर जीवन के इस घुप्प अँधरे रास्ते से डरकर अमेरिका प्रवासित हो गईं ।

क्लाइव को अपने नाम के अलावे अगर कुछ  याद था तो वो डेब्रा का चेहरा था और कुछ पुराने संगीत की धुने थी, जिसे वह कभी बजाया करता था । क्लाइव ये नहीं जानता था कि डेब्रा को देख कर वो खुश क्यों होता था लेकिन डेब्रा के सामने आते ही क्लाइव, उससे गले मिलने के लिए दौड़ पड़ता था । डेब्रा अब उसके पास नहीं थी । क्लाइव पुराने संगीत के उन टुकड़ों के साथ अब अकेला हो गया था । 

कुछ दिनों बाद डेब्रा क्लाइव के पास लौट आईं, क्लाइव उससे गले मिलकर फफक कर रोने लगा था । डेब्रा ने पूछा, क्यों रो रहे हो ? क्लाइव नहीं जानता था की वह क्यों रो रहा है । लेकिन उसने डायरी में लिखा था "मुझे कुछ याद क्यों नहीं है " !!  डेब्रा कहा करती थीं, क्लाइव के  पास खोने को कुछ नहीं है लेकिन मैं क्लाइव को रोज खोती हूँ । क्लाइव के स्मृतियों के अभाव में, मेरे प्यार और अपनेपन का भला क्या महत्व !

अगर स्मृतियों की शून्यता मृत्यु समान है तो सबकुछ स्मृत रहना भी जीवन की सार्थकता को खत्म कर देता है । 

ओरेलियन को सब कुछ याद रहता था । वह कब भूखा रहा था, उसे कब डांट पड़ी थी, उसने कब चॉकलेट खाया था, उसके पिता ने अपनी कार क्यों बेची थी...इत्यादि । वह आगे कहता है इन्हें नियंत्रित करना इतना आसान नहीं है । मेरा ना तो कोई भूत है और ना ही भविष्य होगा । मेरा विशाल वर्तमान मुझे लगातार परेशान करता रहता है । 

सम्वेदनाओं को हर बार टाल पाना मुश्किल काम है । सुख का दीर्घ समय भी छोटा होता है और दुःख की अल्प अवधि भी दीर्घ लगती है । ऐसा महसूस होना मानव स्मृतियों का प्रभाव है । सब खेल स्मृतियों का है ...

बुधवार, 20 मई 2020

गाँव की रातें ..

गाँव की रातें बड़ी होती हैं । पूस की रातें तो सबसे बड़ी । घर के पिछवाड़े से ठंड में ठिठुरते हुए नवजात कुत्तों के कुईं-कुईं की आवाज आ रही है । 

अगहन बीत चुका है । धनकटनी खत्म हो चुकी है । किसानों का अड्डा खेत से उठ कर अब खलिहान में आ गया है । खेतों में धान की जगह सरसों ने ले लिया है । आने वाले तीन महीने खेतों का श्रृंगार सरसों के पीताम्बरी पुष्पचादर और लहलहाते हुए बालियां करेंगीं ।

किसान रात में भी नहीं सोते हैं । धान की पिटाई हो रही है । किसी ने जोड़ से दूसरे खलिहान में काम कर रहे किसान से खैनी के लिए आवाज लगाया है । बगल वाले खलिहान से निर्गुण गाते हुए किसान का जवाब आया है । यहाँ आकर ले जाओ, "ये दुनियाँ चार दिनों का मेला रे, कि हंस उड़ जाएगा फिर अकेला" !

नवजात पिल्लों ने आवाज निकालना बंद कर दिया है । शायद उनकी माँ उनके पास आ गई है । शायद इसलिए ही कहा जाता है कि माँ की सहचरी दुनियाँ की सबसे सुकूनदायक संगति होती है ।

पूस की रातें  निपट सुनसान होती हैं । दूर शहर से किसी ट्रेन के भोपू की आवाज आ रही है । बाहर धवल आकाश है । पूस की चाँदनी है । कड़ाके की ठंड है । गाँव की अग्गम शांति है । अंदर मैं हूँ । रजाई है । धीरे-धीरे बुझता हुआ अलाव है ।

मंगलवार, 19 मई 2020

मृगतृष्णाओं की दौड़ में छूटते हुए अमूल्य वक्त के टुकड़े...

ये ठीक है की कफ़न में जेबें नहीं होती और कोई कितना ही कमा-धमा ले, अपने साथ लाद-बोज कर कुछ भी नहीं ले जाता है । सब कुछ यहीं छुट जाता है !

कुछ लोग अपने पीछे प्रार्थनाओं का आशीर्वाद छोड़ जाते हैं तो कुछ लोग कड़वी यादों की पोटरी को बांध कर चल बसते हैं । कुछ थोड़े लोग, बहुतों के लिए बहुत कुछ छोड़ जाते हैं जिसके पदचिन्हों पर समाज आगे बढ़ता रहता है । 

ख़ैर ! इस ब्रम्ह ज्ञान को दरकिनार करते हुए कि मेरे भी कफ़न में जेबें नही होंगीं और सब कुछ यहीं छूट जाएगा, फिर भी पिछले बारह- पंद्रह सालों से घर से बाहर हूँ। इस दौरान जब -जब नोकरी के लिए,"घर" और माँ-पापा को छोड़ कर बाहर निकला हूँ कसम से (आप चाहे जो भी कसम खिला लें हम खा लेंगें) मन भारी हो जाता है। लगता है घर, घर ना रहा, मायका हो गया है। लेकिन किया भी क्या जा सकता है ? मृगतृष्णाओं की भी अपनी माया है । 

अभिलासाओं की मृगमरीचिका के पीछे बेतहासा दौड़ते हुए मृग की भाँति आदमी, बीतते हुए समय के टुकड़ों में अपने जीवन के बहुमुल्य क्षणों को दरकिनार करता रहता है ।आदमी आगे बढ़ता है मरीचिका और बढ़ती है । मुक्कममल वक्त ना कभी आता है ना आदमी कभी रुकता है । 

हालांकि, इन मृगतृष्णओं के बीच में वह चाहता है कि पीछे छुटे हुए उन बहुमूल्य वक्त के टुकड़ों को लपक कर उन क्षणों में अपनी खुशियाँ लुटा सके, उन्हें बता सके कि उसके जीवन में उन बीते क्षणों का कितना महत्व है ! लेकिन वक्त की एक बुरी बात है की यह लौटता नहीं है । 

आज जब मेरा, मेरे घर पर रहना अपरिहार्य था, यहाँ फँसा हुआ हूँ । जीवन के महत्वपूर्ण क्षण को ऐसा बर्बाद होते देख कर बंसी बजा रहा हूँ । अच्छा नहीं लग रहा है ...

मारिया शारापोवा ...

साल 2016 का था । शरापोवा पर टैनिस खेलने का प्रतिबंध लगाया जा चुका था ...

17 साल में ही विम्बलडन जीतकर इतिहास में अपने नाम को दर्ज कराने वाली मारिया की ख्याति का दीप्त अब मद्धम हो रहा था । 

प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित किया गया था । मारिया ने अपनी गलती को सहजता से स्वीकार करते हुए यह कहा कि मुझसे गलती हुई है । विश्व टैनिस महासंघ द्वारा जारी किए गए प्रतिबंधित दवाओं के नाम को पढ़ना मेरी सर्वप्रमुख जिम्मेदारी थी । ख़ैर ! अब जो है वो आप सबों के सामने है । मैं वापस टैनिस मैं लौटूंगी "आई बिलीव दैट" ।  ऐसे ही विपरीत परिस्थितियों में मारिया का जुझारूपन स्वभाव, उन्हें बाँकीयों से अलग बनाता था । 

ये मारिया का अक्खड़पना ही था की जिस खिलाड़ी को खेलते देख कर टैनिस का सफर उन्होंने तय किया था उन्हें ही हरा कर शरापोवा ने अपना पहला ग्रैंड स्लैम टाइटल जीता था । 

एक सकक्षात्कार के दौरान शरापोवा से पूछे जाने पर की क्या आप सेरेना विलियम्स से प्यार करती हैं ?  उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा था कि मैं सेरेना को सम्मान की नजरों से देखती हूँ । ऐसा भला कैसे हो सकता है कि जिस खिलाड़ी के सामने मेरे जीत का रेशियो 19-02 का है उसे मैं प्यार की नजरों से देख सकूँ !

समय के कुचक्र ने टैनिस इतिहास को हमेशा रौंदने का सफल प्रयास किया है । यहाँ दो महान खिलाड़ी एक दूसरे के चिरप्रतिद्वंद्वी होते रहे हैं । सेरेना और शरापोवा का भी यही हाल रहा है ।

अपने धुर प्रतिद्वंद्वी खिलाड़ी सेरेना को 17 साल की शारापोवा ने जब विम्बलडन के फाइनल में आश्चर्यजनक रूप से हराया था तो सेरेना को प्राइज डिस्ट्रीब्यूशन के अंतिम क्षणों तक यह विश्वास नही हो रहा था कि वो हार गई हैं । शरापोवा कहतीं हैं कि सेरेना रो रही थीं और उन्होंने मुझे पलट कर देखना भी मुनासिब नहीं समझा था । उन्हें इस बात से दिक्कत नहीं थी कि मैं जीत गई थी । उन्हें इस बात से दिक्कत थी कि एक नवसिखुवा खिलाड़ी ने सरेना जैसे स्थापित खिलाड़ी को हरा दिया था । 

शरापोवा आगे कहतीं हैं, उस समय मेरे पास हारने को कुछ नहीं था लेकिन सरेना के पास बहुत कुछ था ...

मारिया....

मारिया शारापोवा..

ऐसा होता की १७ साल में विम्बलडन जितने वाली  मारिया शारापोवा भी सचिन की तरह परिपक्व होतीं !!!

साल २०१६ का प्रारम्भ था । मारिया के निजी खेल प्रबंधक ने विश्व टेनिस महासंघ द्वारा जारी किए गए प्रतिबंधित दवाओं की नई सूची को नहीं पढ़ा था । बाद में ऐसा कहा गया था कि वो निजी समस्याओं से त्रस्त थे ।

ख़ैर ! इधर मारिया, टेनिस से लभ्य ख्याति के फलस्वाद में प्रायोजकों के विज्ञापनों को प्रचारित करने में आत्ममुग्ध थीं । पूर्वाभास के सम्मोहन में अपने प्रबंधक पर पूर्णनिर्भर मारिया ने भी प्रतिबंधित दवाओं की नई सूची को नहीं पढा था । 

मेलड्रॉनेट (मेलड्रॉनीयम) अब प्रतिबंधित दवाओं की सूची में था । मारिया विगत दस वर्षों से मेलड्रॉनेट का सेवन चिकित्सीय कारणों से कर रहीं थीं और जनवरी २०१६ के बाद भी कर रही थीं । 

परिणामतः २०१६ में ऑस्ट्रेलियन ओपन के पहले हुए डोपिंग टेस्ट में मारिया को प्रतिबंधित दवाओं के सेवन का दोसी पाया गया और उन्हें नियमों के उलंघन के लिए डेढ़ साल तक टेनिस से प्रतिबंधित कर दिया था । 

विश्व टैनिस महासंघ के अध्यक्ष ने अपनी सफाई में यह कहा था कि जिस खेल के कारण आपकी ख्याति है, प्रसिद्धि है, आपने रुपये बनाये हैं , उसके प्रति इतनी लापरवाही कैसे क्षम्य हो सकता है .....

#मारिया

मंगलवार, 12 मई 2020

कभी लिखा गया था।

ताली, थाली, घंटी और परम्परा ...

कोरोना के आक्रांत से लड़ते हुए योद्धाओं के लिए, कल पाँच मिनट तक करतल और नाद के आह्वान पर ऐसा घमासान मचा हुआ है कि लोग कल से ही छाती पीट रहे हैं । 

विरोध की ऐसी दुर्भावना की प्राणों तक का मोल नहीं ! घृणा की ऐसी आग की बुद्धिहीन पशु बनने पर आमादा ! ऐसी कुंठा क्यों ? 

साहस और विवेक के सामंजस्य से जंगें जीती गई हैं और आगे भी ऐसा होता रहेगा । 

जब साहस को डर लगता है तब तालियों के करतल नाद से, उस उपजे भय पर विजय प्राप्त किया जाता है । तालियाँ इसलिए बजाई जाती हैं कि मैदान में जो उतरा है उसका साहस बना रहे । 

शहरीकरण के दौड़ में हमारी परम्पराएं हाँफ कर पीछे छूटती गई हैं । जन्म पर थाली बजाने की परंपरा भी उन्हीं में से एक है । 

गर्भस्त महिला के घर मे थाली बजने का संकेत इस बात का प्रमाण था कि नवजात शिशु का जन्म हुआ है । 

ऐसी मान्यता है की नवजात के जन्म पर थाली बजाने से वह नवजात शिशु निडर, बलवान, साहसी और हर समय सजग रहने वाला होता है । कानों में थाली बजाने से नवाजात का प्रसुप्त दिमाग जाग उठता है और वह रोने लगता है।   

घंटी से निकले नाद और उससे उत्पन्न होने वाले झंकारों के वैज्ञानिक प्रभावों को लिखने की क्या ही आवश्यकता है । 

ख़ैर ! अगर परम्पराओं और मान्यताओं को सिरे से नकार भी लिया जाए और इस आह्वान को सांकेतिक ही मान लिया जाय तो क्या :- 

इस माहमारी से लड़ते हमारे चिकित्सक, चिकित्सक सहयोगी, पुलिस, प्रशासन, सफाई कर्मी द्वारा समर्पण भाव से दिनरात की सेवा के बदले हमलोग पाँच मिनट तक करतल ध्वनियों से उनका हौसला नहीं बढ़ा सकते है ?

सोचियेगा जरा ....

सचिन-२

सचिन-२

एको अहं, द्वितीयो नास्ति, न भूतो न भविष्यति ....

सचिन यूँ ही नहीं महान हैं । सचिन जैसा ना पहले कोई था, ना दूसरा कोई होगा । सर्वाधिक एकदिवसीय और टेस्ट शतक । सर्वाधिक एकदिवसीय और टेस्ट रन। अंतरराष्ट्रीय मैच में तीस हज़ार से ज्यादा रन । पहला एकदिवसीय दोहरा शतक । शतकों का शतक । एकदिवसीय क्रिकेट में सर्वाधिक बार मैन ऑफ द मैच।  सर्वाधिक विश्वकप शतक । 200 अंतरास्ट्रीय टेस्ट और 463 एकदिवसीय मैच खेलने के विशाल रिकॉर्ड के साथ सचिन अपराजेय लगते हैं ।
(कुछ छूट गया हो तो आपलोग जोड़ लीजियेगा)

ऊपर के आंकड़ों में 90-99 रनों के बीच 28 बार आउट होने और 80-89 रनों के बीच 30 बार आउट होने को सचिन अगर शतक में तब्दील कर, जोड़ पाते तो रिकॉर्ड क्या होता इसे कहने की क्या ही जरूरत है।
(गेंदबाज़ी कैरियर को अभी छोड़ देते हैं)

ख़ैर ! ऊपर के आँकड़े ये बताने के लिए पर्याप्त हैं कि सचिन केवल क्रिकेट खेलने नहीं आए थे । उन्होंने क्रिकेट के हर स्वरूप को रचा है। जिसमें विलक्षण शॉट्स हैं । मर्यादित खेल भावना है । समर्पित संयम है और धीर-भीर और गम्भीर स्वभाव है । 

क्रिकेट के 24 साल के लंबे कैरियर के दौरान मैदान पर ऐसी घटनाएं विरले ही देखने को मिलती थी जब सचिन विचलित होकर खेल मर्यादा को लाँघ रहे होते थे। 

ऑस्ट्रेलिया, साउथ अफ़्रीका, वेस्टइंडीज और पाकिस्तान के दुर्धस गेंदबाजों के गलीच टिप्पणियों का प्रतिउत्तर सचीन ने हमेशा अपने बल्ले से ही दिया था और यह सिद्ध किया था कि वो यहाँ गालियाँ सुनने के लिए नहीं, पूजे जाने के लिए आया है ।

सचिन ने कई यादगार पारियाँ खेली हैं । हरेक प्रशंसक की अपनी सूची भी है । लेकिन सचिन की एक पारी सभी प्रशंसको की सूची में आज भी ऊपरी पायदान पर विराजती है ।  जब एक फूहड़/मूढ़ पाकिस्तानी गेंदबाज, अपने सर्वश्रेष्ठ होने के स्तम्भित दम्भ और सचिन को नवसिखुवा होने के पूर्वाभास में, यह चुनोती दे देता है कि "तुम मेरे गेंद को छू कर तो दिखाओ" और अगले ही क्षण उसके फूहड़पन और मूढ़मति का प्रतिउत्तर सचिन के दनदनाते शॉट्स देते हैं, फलस्वरूप दर्शकदीर्घा में जो खुशियों की कोलाहल आती है उसका स्मरण भी मंत्रमोहित करता रहता है । 

दुनियाँ के सर्वश्रेष्ठ गेंदबाजों ने जहाँ सचिन का लोहा सहर्ष मानना स्वीकार किया था वहीं पाकिस्तानी चिरकुट गेंदबाज जिन्हें अपने गेंदबाजी पर विश्वास कम और अंहकार ज्यादा था, की कुटाई भी सचिन के बल्ले ने मुक्त हाथों से किया था । चिरकुट इसलिए क्योंकि उनके क्रिकेट में खेल भावना कम और पाकिस्तानी बनकर भारत फ़तह करने की मंशा मुखर होकर दिखाई पड़ती थी । 

सचिन के प्रशंसकों की एक लंबी विश्वव्यापी फेरहिस्त है । भारत में उनके नाम के मंदिर हैं । सम्मान की एक लंबी कतार है और हम जैसे प्रशंसकों का विशाल जनसमूह जिनके लिए क्रिकेट की परिभाषा सचिन से होकर शुरू होता है । 

खैर! कुछ आलोचक भी हैं जिन्हें गाहे बगाहे ये लगता है कि सचिन ने क्रिकेट में निजस्वार्थ को पहले ढूंढा है । उनको बस इतना कहना है कि सचिन ने क्रिकेट को एक लंबे कालखण्ड तक अपने जीवन के बहुमुल्य क्षणों को समर्पित किया है । हो सकता है इस दौरान कुछ ऐसी परियाँ खेली गई हों जिन्हें आलोचकों को पसंद ना आया हो । वैसे एक सवाल तो उनके लिए भी है कि अगर सचिन ने क्रिकेट में निजस्वार्थ को पहले ढूंढा तो बाकि क्या कर रहे हैं ?

रोटी और राजनीति

भूख सभी को लगती है । रोटियाँ भूख मिटाती हैं । धनवान-निर्धन सभी की । रोटियों का अपना इतिहास है । रोटियाँ चूल्हे पर उस समय से पकाई जाती रही हैं जब मानव सभ्यता ने खेती करना भी प्रारम्भ नहीं किया था । 

इतिहास का एक टुकड़ा इस बात का गवाह रहा है कि रोटियाँ सिक्कों का पर्याय थी। रोटी दो चावल ले जाओ । रोटी दो मिठाई ले जाओ । अधिकारी, श्रमिक और मजदूरों को वेतन के रूप में रोटियाँ ही दी जाती थी । 

रोटियों के सहारे साकारात्मक आंदोलन होते रहे हैं । 1857 के चपाती आंदोलन में जनभावनाओं को रोटियों के सहारे ही उजागर किया गया था । लेकिन रोटियों पर कभी घिनोनी राजनीति हुई हो इतिहास ऐसा ज्ञात नहीं कराता है । 

ख़ैर ! वक्त बदला, लोग बदले और रोटियों के महत्व का नजरिया भी बदला । पाँच दिन पहले मजदूरों का एक पैदल समूह घर की और निकला था । रास्ते मे थक कर वे लोग इस पूर्वाभास में ट्रेन की पटरी पर ही सो गए थे कि "अभी ट्रेनें तो चलती ही नहीं हैं " । लेकिन वो लोग ये भूल गए थे कि मालगाड़ियों का परिचाल अभी भी जारी था । दुर्भाग्यवश सभी मजदूर मारे गए, लेकिन इसमें गलती भी उन मजदूरों की ही थी । कोई ट्रेन की पटरी पर भला क्यों सोएगा ? 

लेकिन खेल अब शुरू हुआ था । मजदूर बहस से गायब थे । रोटियों की तस्वीर सामने थीं । कर्ता भी गौण था , कारक भी गौण था लेकिन एक तीसरा था जो रोटियों की तस्वीरों को ठेले जा रहा था । वो मजदूर जो अपने घरों के लिए निकले थे, वो किस गाँव के थे ? उन्हें कहाँ जाना था ? इस बात का सरोकार किसी को नहीं था । सरोकार था तो केवल रोटियों के उस तस्वीर का जिसके ऊपर खून के छीटें थे । 

ऐसे में रमाकांत द्ववेदी की लिखी हुई एक कविता याद आ रही है कि :- 

बिन रोटी क्या पूजा-अर्चा-तीरथ-बरत-नहान
छापा-तिलक-जनेऊ-कंठी-माला कथा-पुराण

बिन रोटी सब सूना-सूना घर-बाहर-मैदान
मन्दिर-मस्जिद-मठ-गुरुद्वारा-गिरजाघर मसान

रोटी बढ़कर स्वर्ग लोक से, रोटी जीवन प्राण
रोटी से बढ़कर ना कोई देव-दनुज-भगवान

सो रोटी उपजे खेती से, खेती करे किसान
जो किसान का साथ निबाहे, सो सच्चा इनसान

शनिवार, 9 मई 2020

सेनापतियों के लिए उसका सैनिक परिवार की तरह होता है

एक सैनिक को उसके दिए हुए उत्कृष्ट सेवा के लिए जब किसी सैन्य दल का सेनापति घोषित किया जाता है तो उसके पीछे सेवाकाल में प्राप्त अनुभवों और सैनिक सम्वेदनाओं का विशाल सागर साथ चलता रहता है । 

एक सेनापति सेनाओं का नायक कम और अपने सैनिक परिवार का मुखिया ज्यादा होता है । वो अपने सैनिकों के अंतर्मन से उठते भावनात्मक तरंगों के सम्प्रेषण को पढ़ने में निपुण होता है जिसकी अभिव्यक्ति में वह कभी सख्त, कभी नर्म और कभी भावुक होता रहता है । 

लेकिन एक सेनापति अपने सैनिकों के हितार्थ, निःसंकोच भाव से तत्क्षण ही सब कुछ छोड़ने के लिए सदैव तत्तपर रहता है ।

"कैप्टन ब्रेट क्रोजियर" ऐसे ही सेनापतियों के फेरहिस्त में विराजने वाले सेनापति हैं । युद्धक हैलीकॉप्टर उड़ाने से अपने कैरियर की शुरुआत करने वाले ब्रेट क्रोजियर को उनके उत्कृष्ट प्रतिभा के लिए अमेरिकन परमाण्विक विमान वाहक पोत थियोडोर रूजवेल्ट का कप्तान बनाया गया था । 

लेकिन ब्रेट क्रोजियर को जब यह ज्ञात हुआ कि कोरोना महामारी के प्रचंड प्रकोप ने रूजवेल्ट पर पदस्थापित सैनिकों को अपने पाश में जकड़ना शुरू कर दिया है और उनके किये हुए अनुरोध का समुचित संज्ञान नहीं लिया जा रहा है तो उन्होंने अपने कैरियर की परवाह किये बिना सैनिकों की जान बचाने के लिए वो सब किया जो उन्हें एक कुशल सेनापति बनाता है । 

बाद में ब्रेट क्रोजियर द्वारा उठाए गए कदमों को असंवैधानिक करार देकर उन्हें पदमुक्त कर दिया गया ।  लेकिन जब वो अपने जहाज को छोड़कर जा रहे थे तो सैनिकों की कतारबद्ध पङ्गतियाँ, तालियों की गड़गड़ाहट और सैनिकों की गीली आंखों द्वारा दी गई विदाई यह कहने को पर्याप्त था कि ब्रेट क्रोजियर सर्वसिद्ध कुशल सेनापति रहे थे जिन्होंने अपने सैनिकों के हितों में अपने कैरियर तक को दांव लगा दिया था । 

हालांकि ब्रेट क्रोजियर पर अंतिम फैसला अभी आना बाकी है लेकिन ब्रेट क्रोजियर का यह निश्चल त्याग समयचक्र की परिधियों में आने वाले सेनापतियों के लिए अनुकरणीय उदाहरण सदैव रहेगा ।

गुरुवार, 7 मई 2020

सेनाओं के नायक रुपहले पर्दे पर नहीं आते हैं, लेकिन उनकी विजय गाथा उन्हें सर्वकालिक महानायक बनाते हैं ..

विश्व युद्ध इतिहास का हर पन्ना साक्षी है कि सेनापतियों के अतुलित साहस औऱ निपुण युद्धकौशल, युद्धभूमियों में विजयश्री के उतुंग ध्वज को गाड़ते आये हैं ।

सेनापति विजयश्री के मनोरथ से जब अपनी सेनाओं को समर समर्पित करता है तब उसका अवचेतन मन यह कामना भी करता रहता है कि विजयश्री के अंतिम क्षणों तक उसकी सेनाएं निर्विघ्न रहे ! परन्तु, समराग्नि अगर उसे मृत्यु वरन को विवश ही कर दे तो, मृत्यु के अंतिम क्षणों तक भी उसकी सेनाएं अक्षुण्य रहे !

सेनापति अपने सेनाओं के परिवार का बरगद होता है । जिसके गहरे छाँव के निचे उसकी सेनाएं आशंका मुक्त रहती हैं ।   

शहीद कर्नल आशुतोष शर्मा का नाम ऐसे ही शूरवीर सेनापतियों के नामों के साथ शताब्दियों तक स्मृत किया जाएगा । १४वें और अंतिम प्रयास में सेना में भर्ती होने वाले आशुतोष शर्मा की नियति ही देश सेवा की थी । अपने सैन्य सेवाओं के दौरान दुर्गम और दुरूह अभियानों को अपने युद्धकौशल और चपल निर्णय के दम पर सुगम बनाने वाले कर्नल आशुतोष शर्मा ने यह सत्यापित किया था कि ईश्वर ने उन्हें सैन्य सेवा के लिए ही रचा था । उनके उत्कृष्ट सेवाओं के लिए कर्नल आशुतोष शर्मा को सेना ने इन्हें अपने तमगे से भी सजाया था । 

भारतीय सेना के राष्ट्रीय राइफलस को परमवीर और दुर्धस योद्धाओं का खजाना कहा जाता है । अपने अंतिम विजय अभियान के दौरान कर्नल शर्मा २१ वें आर आर के कमांडिंग ऑफिसर थे । पहाड़-पर्वत-जंगल के खाख छानने वाले कर्नल आशुतोष शर्मा ने अपने सेवाकाल में चले दुर्गम विजय अभियानों के अनुभवों से परिपक्वता की उच्च सीमा को प्राप्त किया था । 

तीन दिन पहले दस्युदल द्वारा अप्रिय घटना के कलुषित मंशा को विफल करने के दौरान, मृत्यु के अंतिम क्षणों तक अपने टीम को सुरक्षित करने की जद्दोजहद में कर्नल आशुतोष शर्मा वीरगति को प्राप्त हो गए ।  

भारत, प्रलय के अंतिम दिनों तक स्वर्गीय कर्नल आशुतोष शर्मा का ऋणी रहेगा । इन्होंने अपने पीछे वीरता की अथाह विरासत को छोड़ा है जिसे पढ़-सुन कर पीढ़ियाँ उनके पदचिन्हों को अनुसरीत करती रहेंगीं। 

सेनाओं के नायक पर्दे पर नहीं आते हैं लेकिन उनके विजय गाथाओं का वास्तव अभिनय उन्हें  सर्वकालिक महानायक बनाते हैं ।

गुरुवार, 30 अप्रैल 2020

ऋषि कपूर और इरफान का यूँ चले जाना बहुत कुछ खाली कर गया ...

वक्त ने किया क्या हसीं सितम
तुम रहे ना तुम, हम रहे ना हम !!

कलाकार मरा नहीं करते ! कलाकार अपनी सीमाओं से परे, समय से परे जीते हैं । यूँ तो,कलाकार जिस कालखण्ड को जीता है उसकी हस्ती उसी कालखण्ड को निछावर होती है, लेकिन ये बात दूसरी है कि एक कलाकार अपने कला श्रेष्ठता के दम पर प्रशंसकों के समाज में शताब्दियों तक याद किया जाता है और उसके किये हुए कामो पर बलिहार होकर प्रशंसक कृतज्ञता लुटाता रहता है ।  

स्वर्गीय इरफ़ान और ऋषि कपूर भारतीय अभिनय कला जगत के ऐसे ही धुरंधर थे जिनकी कलाश्रेष्ठता से वशीभूत प्रशंसकों का एक वर्ग उन्हें जीवनपर्यंत स्मृत करता रहेगा । 

राजस्थान के टोंक से निकल कर गरीबी के टेढ़े और खुरदरे रास्ते को नापते हुए इरफ़ान ने फिल्मी जगत के छोटे पर्दे से अपने अभिनय का श्रीगणेश, द ग्रेट मराठा,चंद्रकांता और चाणक्य जैसे सीरियलों में जब किया, तो गरीबी से लड़ते हुए एक श्रेष्ट अभिनेता की संजीदगी उनके अभिनय में स्पष्तः दृष्टिगत हो रही थी । 

यहाँ से फिर इरफ़ान ने पीछे मुड़कर कभी नहीं देखा । इरफान के अभिनय और इनके नशीले आँखों के जादुई सम्मोहन से बने मिश्रित रासायन से कोई नहीं बच सका । कारवाँ आगे बढ़ता गया लोग सम्मोहित होते गए ।  

इरफ़ान ने एक इंटरव्यू में कहा था कि मेरा आधा अभिनय मेरी आँखें करती हैं और बाकी का आधा मैं । मेरे अब्बा ने एक बार मेरी आँखों के लिए कहा था " तुम्हारी ये आँखें हैं कि जादू का प्याला !! " 

संजीदे अभिनय और बोलती हुई आँखों की सुघड़ क्षमता के बदौलत इनके ठुमके नहीं लगाने की कमी को दर्शकों ने सहर्ष ही स्वीकार कर लिया था । दर्शकों को इऱफान वैसे ही पसन्द थे जैसे वो वास्तविक जीवन में थे।

लेकिन आज, आद्र कण्ठों से यह स्वीकार कर लेना पड़ता है की स्लमडॉग मिलियनर , लाइफ ऑफ पाई, लंच बॉक्स, हिंदी मीडियम ,पान सिंह तोमर जैसी फिल्मों को अपने अभिनय के दम पर भारतीय अभिनय कला कल नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने वाला इरफान नहीं रहा ! 

अभी ये से सब नया ही था कि विरक्तियों से लड़ते हुए आज ऋषि कपूर विदा कह गए ! 

चले जाना, दुनियाँ की सभी क्रियाओं में सबसे वीभत्स क्रिया है । जाने वाले चले जाते हैं स्मृतियों को शेष छोड़ जाते हैं । इस चले जाने की क्रिया का ना आदि है न अंत होगा ।  फिर भी इस रहस्यमय प्रश्न का जवाब कोई दे पाता तो मैं पूछने वालों की कतार में सबसे आगे खड़ा रहता । 

ख़ैर ! अपनी पुरखों से मिले अभिनय के उत्तराधिकार को ऋषि कपूर ने सम्पूर्ण समर्पण से आत्मसात कर आगे बढ़या था । उनकी सीधी टक्कर अपने जमाने के लिजेंड्रि बच्चन और खन्ना साहब से था । 

लेकिन चॉकलेटी बॉबी (बॉबी),  अकबर(अमर अकबर ऍंथोनी),  रवि वर्मा (कर्ज),रोहित(चांदनी), राजीव(नगीना) रवि(दीवाना) और रौफलाला के किरदारों से सने हुए अभिनय से वसीभूत होकर सिनेमा जगत के स्थापित कलाकारों ने ऋषि कपूर को  स्नेहित भाव से अंगीकार कर यह स्वीकृत किया था कि ऋषि कपूर सभी जॉनर के श्रेष्ठ अभिनेता थे । 

ऋषि कपूर जितने मंझे थे उतने ही सरल । एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि "जीवन के कड़वे सच्चाई से लड़ने के लिए आदमी को रोमांटिक बनना पड़ता है " अब इस बात को सूनकर कोई क्या ही कह पायेगा सिवाय रोने के ! 

लेख लम्बा हो रहा है लेकिन फिर भी ये बताना चाह रहा हूँ कि, कला जगत में कलाकार दो तरह के होते हैं । एक वो जिनके किये काम कम हैं लेकिन उनकी पहुँच प्रशंसकों और इस परिधि से बाहर के लोग भी हैं । 

कपूर साहब और इऱफान भाई इसी श्रेणी में आते हैं । आज दोनों हमारे बीच में नहीं हैं । इस तस्वीर में बात करते हुए ऋषि कपूर और इरफान खान एक दूसरे से यही बोल रहे होंगे :- 

मैं ना रहूँगा, तुम ना रहोगे,
फिर भी रहेंगीं ये निशानियां ...

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2020

सचिन.... सचिन.... सचिन...

सचिन... सचिन.....सचिन....

क्रिकेट ने कई महानायकों को जना है, लेकिन सचिन जैसा कोई दूसरा नहीं । नब्बे के दशक में जब क्रिकेट की लोकप्रियता भारत में लगातार कम हो रही थी तब एक नए सूर्य के साथ क्रिकेट का एक नया सवेरा आया, नाम था सचिन रमेश तेंदुलकर ।

अपने डेब्यू मैच में ही सोलह साल के सचिन ने विरोधी टीम के खिलाड़ियों को यह संदेश प्रेषित कर दिया था कि वह केवल क्रिकेट खेलने नहीं आया है, वो यहाँ क्रिकेट रचने आया है जिसे शताब्दियों तक पढा जाएगा । 

बिना मूँछ के इस बल्लेबाज ने जब मुस्ताक अहमद के एक ही ओवर में दो छक्के जड़े थे तो मोहम्मद कादिर ने यह कहा था कि "बच्चे को मार कर क्या दिखाना चाह रहे हो मेरे गेंद को छू कर तो देखो" और अगले ही ओवर में जब उस मूढ़ गेंदबाज को लगातार तीन छक्के जड़ दिए गए तो यह प्रमाणित हुआ था कि क्रिकेट में मूँछों का होना या नहीं होना मायने नही रखा जाता है । 

सचिन का सूर्य अभी ठीक से दीप्तमान हुआ भी नहीं था कि अजेय रहने वाले ऑस्ट्रेलियन टीम और उनके खिलाड़ियों के सपने में सचिन के रहस्यमय शॉट्स और उससे निजात पाने के सपने आने लगे । 

सचिन के शानदार शॉट्स का जादुई तिलस्म अब धीरे धीरे अभेद्य हो रहा था । कवर ड्राइव, स्ट्रेट ड्राइव, पुल, हुक, फ्लिप का प्रमेय विरोधियों के लिए अनसुलझा सवाल बनता जा रहा था । 

समय बढ़ता गया रिकॉर्ड बनते गए । खेल-खेल में सचिन के बल्ले से रिकॉर्ड की इतनी कहानियाँ बन गई है कि क्या याद रखा जाए और किसे भुला जाए है ये याद नहीं आता है ।

इन सब के बीच याद आता है की शोएब के तेज गेंद पर पॉइंट के ऊपर जब सचिन ने छक्का मार दिया था तो सोएब केवल रोया नहीं था, बस!

याद आता है कि शैन वार्न रोते रोते यह स्वीकर कर लेता है कि उसके फिरकी के जादुई तिलिस्म को इस दुर्धष खिलाड़ी ने तोड़ मरोड़ कर रख दिया है । 

याद आता है कि वर्ल्ड कप के फ़ाइनल में जब भारत, ऑस्ट्रेलिया से हार गया था और सचिन को मैन ऑफ द सीरीज घोषित किया गया था लेकिन सचिन को जैसे उस ट्रॉफी प्राप्त करने की कोई खुशी ही नहीं हुई थी । 

याद आता है कि खेल के अंतिम पड़ाव पर खड़े इस महान खिलाड़ी का जब इसका सपना साकार हुआ और इसने विश्व कप के विजयी ट्रॉफी को अपने छाती से लगा कर इस तरह फफक फफक कर रोया था जैसे बिछड़े हुए बेटे से मिलकर माँ गले लगा कर रोती हैं । 

कितना कुछ कहा जाए ! कहने को इतना कुछ है कि आपलोग पढेंगें ही नहीं । 

ख़ैर ! कहना बस इतना है कि सचिन ने क्रिकेट और क्रिकेट प्रेमियों को बस दिया है । बेहिसाब, बेहिचक,बेशर्त । लिटिल मास्टर सचिन को जन्मदिन की ढेरों शुभकामनाएं । आपकी कृति अजेय और अविस्मृत रहे । 

जिंदाबाद ...