गुरुवार, 2 जुलाई 2020

जस्टिन गैटलिन की चुनौती और बोल्ट द्वारा अपने बादशाहत को क़ायम रखना.....

साल 2016 के रियो ऑलम्पिक की तैयारियाँ आखरी छोर पर खड़ी थी। बीजिंग और लंदन में आयोजित पिछले दो ऑलम्पिक के दौरान रफ़्तार में अपनी बादशाहत कायम कर चुके बोल्ट, 100, 200 और 400 मीटर रीले के सभी स्वर्ण पदकों को अपने नाम कर, विरोधियों को यह बता चुके थे कि असल मे रफ़्तार के वो ही क्षत्राधिपति हैं।
इधर बोल्ट को अपना चिरप्रतिद्वंद्वी मानने वाले जस्टिन गैटलिन पर लगा प्रतिबंध अब तक खत्म हो चुका था। एक इंटरव्यू के दौरान पूछे गए सवाल पर गैटलिन ने जवाब देते हुए कहा था कि "विजयी राष्ट्र ध्वजवाहक गैटलिन ही होगा" । दरअसल ये चुनोती सीधे-सीधे बोल्ट को थी। हालाँकि, बोल्ट ने गैटलिन के इस चुनौती का कोई मौखिक जवाब तो नहीं दिया था लेकिन उनके दिनचर्या को इस चुनौती ने प्रभावित तो किया ही था। बोल्ट हंसते हुए आगे कहते हैं "गैटलिन की स्ट्रेटजी काम कर गई थी" ।
लेकिन कठोर परिश्रम को चुनोतियों ने कब तक प्रभावित किया है भला! बोल्ट और गैटलिन अब ट्रैक पर फिर से आमने-सामने थे। बोल्ट ने पुनः सौ, दो सौ, और चार सौ मीटर रीले के सभी प्रतिस्पर्धाओं के स्वर्ण पदक को आपने नाम कर लिया था।
दौड़ खत्म होने के बाद फफ़कते हुए जस्टिन गैटलिन को बोल्ट ने गले लगा कर यह स्थापित किया की खिलाड़ियों के लिए जीत के साथ-साथ दूसरे खिलाड़ियों की भावनाओं का सम्मान महत्वपूर्ण होता है। दर्शकों की करतल ध्वनियाँ बजती रही। प्रशंसकों के नजर में बोल्ट का कद और भी बढ़ता गया। आखीर,यूँ ही तो कोई चैम्पियन नहीं बन जाता है ....
(तस्वीर में गैटलिन हैं । बोल्ट को कौन नही जानता ! उनका भला परिचय क्यों कराया जाए!)

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