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मंगलवार, 12 मई 2020

कभी लिखा गया था।

ताली, थाली, घंटी और परम्परा ...

कोरोना के आक्रांत से लड़ते हुए योद्धाओं के लिए, कल पाँच मिनट तक करतल और नाद के आह्वान पर ऐसा घमासान मचा हुआ है कि लोग कल से ही छाती पीट रहे हैं । 

विरोध की ऐसी दुर्भावना की प्राणों तक का मोल नहीं ! घृणा की ऐसी आग की बुद्धिहीन पशु बनने पर आमादा ! ऐसी कुंठा क्यों ? 

साहस और विवेक के सामंजस्य से जंगें जीती गई हैं और आगे भी ऐसा होता रहेगा । 

जब साहस को डर लगता है तब तालियों के करतल नाद से, उस उपजे भय पर विजय प्राप्त किया जाता है । तालियाँ इसलिए बजाई जाती हैं कि मैदान में जो उतरा है उसका साहस बना रहे । 

शहरीकरण के दौड़ में हमारी परम्पराएं हाँफ कर पीछे छूटती गई हैं । जन्म पर थाली बजाने की परंपरा भी उन्हीं में से एक है । 

गर्भस्त महिला के घर मे थाली बजने का संकेत इस बात का प्रमाण था कि नवजात शिशु का जन्म हुआ है । 

ऐसी मान्यता है की नवजात के जन्म पर थाली बजाने से वह नवजात शिशु निडर, बलवान, साहसी और हर समय सजग रहने वाला होता है । कानों में थाली बजाने से नवाजात का प्रसुप्त दिमाग जाग उठता है और वह रोने लगता है।   

घंटी से निकले नाद और उससे उत्पन्न होने वाले झंकारों के वैज्ञानिक प्रभावों को लिखने की क्या ही आवश्यकता है । 

ख़ैर ! अगर परम्पराओं और मान्यताओं को सिरे से नकार भी लिया जाए और इस आह्वान को सांकेतिक ही मान लिया जाय तो क्या :- 

इस माहमारी से लड़ते हमारे चिकित्सक, चिकित्सक सहयोगी, पुलिस, प्रशासन, सफाई कर्मी द्वारा समर्पण भाव से दिनरात की सेवा के बदले हमलोग पाँच मिनट तक करतल ध्वनियों से उनका हौसला नहीं बढ़ा सकते है ?

सोचियेगा जरा ....