शास्त्रों में वर्णित मानव जीवन के १६ संस्कारों ( वर्तमान परिदृश्य में आधे पर ही सिमटे हुए ) में मृत्यु, अंतिम संस्कार है । इसके आगे किसी संस्कार का वर्णन किसी पुराण,उपनिषद या ग्रंथ में नहीं मिलता है । मृत्यु के बाद आत्मा,परात्मा और पितरों का जिक्र पुराणों और उपनिषदों में तो है पर श्रीमद्भागवत इन सब से ऊपर है । (आत्मा, परात्मा और ऊर्जा के संचरण के बारे में अगले पोस्ट में)
फ़िर चाहे कठोपनिषद में नचिकेता-यम संवाद हो, गरुड़ पुराण में स्वर्गारोहण का आख्यान हो या छान्दोग्य उपनिषद में मानव जीवन की चर्चा हो । श्रीमद्भागवत में इन सबों का जिक्र अलग तरीके से किया गया है । महाभारत के अनुशासन पर्व में इस बात का जिक्र है कि जब भगवान श्रीकृष्ण की युद्ध संधि को दुर्योधन ने ठुकरा कर उन्हे भोजन ग्रहण के लिए आमंत्रित किया था तो भगवन श्रीकृष्ण ने कहा था :- "सम्प्रीति भोज्यानि आपदा भोज्यानि वा पुनैः’’ । अर्थात् , जब खिलाने वाले का मन प्रसन्न हो, खाने वाले का मन प्रसन्न हो, तभी भोजन करना चाहिए। लेकिन जब खिलाने वाले एवं खाने वालों के दिल में दर्द हो, वेदना हो, तो ऐसी स्थिति में कदापि भोजन नहीं करना चाहिए।”
जहां तक कर्मकांडों की बात है तो मृत्यु के बाद पितरों के सम्मान के लिये आयोजित कर्मकांड "कपालमोचन क्रिया" से प्रारंभ होकर ११ वें और १२ वें दिन कर्ता द्वारा पिंडदान और फिर ब्राम्हण भोजन पर आकर ख़त्म होती है । इस क्रिया में पितरों के प्रति श्रद्धा और परलोक में सद्गति के लिए सामर्थ्य अनुसार दान और खाद्य पदार्थों के पिंड को भोज्य के रूप में दान दिया जाता है ।
कर्मकांड, पिंडदान और अंततः ब्राम्हण भोजन की क्रिया एक सम्पूर्ण प्रक्रिया है । जिससे पितरों के सद्गति का मार्ग प्रशस्त होता है और वंसजों को अपने दायित्व से मुक्ति मिलती है । शास्त्रों में इस बात का जिक्र कहीं नहीं है कि मृत्यु भोज में कितने लोगों को भोजन ग्रहण कराया जाना चाहिए। एक, सौ या एक हज़ार ।
लेकिन आज़कल मृत्यु पर आयोजित होने वाला आडम्बर कर्मकांड कम, सामर्थ्य का स्वांग और जश्न ज्यादा हो गया है जो सर्वथा व्यर्थ और अनुचित है (यहाँ कर्मकांड और जश्न में अंतर समझने की जरूरत है ) । चुकी यह प्रथा समाज के हर तबके में व्याप्त है और मृत्युभोज तब और भी वीभत्स हो जाता है जब समाज का निष्ठुर हृदय एक गरीब को ऋण लेकर/जमीन गिरवी रख कर भी मृत्युभोज के आयोजन करने को बाध्य करता है । तब यह ज़रूरी हो जाता है कि मृत्युभोज का आडम्बर बंद हो जाना चाहिए। (इसमें ब्राम्हण भोजन को नहीं जोड़ें) ।
(एक वास्तविक घटना से मन व्यग्र था। तिथि थी २६ अगस्त २०१९
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