भूख सभी को लगती है । रोटियाँ भूख मिटाती हैं । धनवान-निर्धन सभी की । रोटियों का अपना इतिहास है । रोटियाँ चूल्हे पर उस समय से पकाई जाती रही हैं जब मानव सभ्यता ने खेती करना भी प्रारम्भ नहीं किया था ।
इतिहास का एक टुकड़ा इस बात का गवाह रहा है कि रोटियाँ सिक्कों का पर्याय थी। रोटी दो चावल ले जाओ । रोटी दो मिठाई ले जाओ । अधिकारी, श्रमिक और मजदूरों को वेतन के रूप में रोटियाँ ही दी जाती थी ।
रोटियों के सहारे साकारात्मक आंदोलन होते रहे हैं । 1857 के चपाती आंदोलन में जनभावनाओं को रोटियों के सहारे ही उजागर किया गया था । लेकिन रोटियों पर कभी घिनोनी राजनीति हुई हो इतिहास ऐसा ज्ञात नहीं कराता है ।
ख़ैर ! वक्त बदला, लोग बदले और रोटियों के महत्व का नजरिया भी बदला । पाँच दिन पहले मजदूरों का एक पैदल समूह घर की और निकला था । रास्ते मे थक कर वे लोग इस पूर्वाभास में ट्रेन की पटरी पर ही सो गए थे कि "अभी ट्रेनें तो चलती ही नहीं हैं " । लेकिन वो लोग ये भूल गए थे कि मालगाड़ियों का परिचाल अभी भी जारी था । दुर्भाग्यवश सभी मजदूर मारे गए, लेकिन इसमें गलती भी उन मजदूरों की ही थी । कोई ट्रेन की पटरी पर भला क्यों सोएगा ?
लेकिन खेल अब शुरू हुआ था । मजदूर बहस से गायब थे । रोटियों की तस्वीर सामने थीं । कर्ता भी गौण था , कारक भी गौण था लेकिन एक तीसरा था जो रोटियों की तस्वीरों को ठेले जा रहा था । वो मजदूर जो अपने घरों के लिए निकले थे, वो किस गाँव के थे ? उन्हें कहाँ जाना था ? इस बात का सरोकार किसी को नहीं था । सरोकार था तो केवल रोटियों के उस तस्वीर का जिसके ऊपर खून के छीटें थे ।
ऐसे में रमाकांत द्ववेदी की लिखी हुई एक कविता याद आ रही है कि :-
बिन रोटी क्या पूजा-अर्चा-तीरथ-बरत-नहान
छापा-तिलक-जनेऊ-कंठी-माला कथा-पुराण
बिन रोटी सब सूना-सूना घर-बाहर-मैदान
मन्दिर-मस्जिद-मठ-गुरुद्वारा-गिरजाघर मसान
रोटी बढ़कर स्वर्ग लोक से, रोटी जीवन प्राण
रोटी से बढ़कर ना कोई देव-दनुज-भगवान
सो रोटी उपजे खेती से, खेती करे किसान
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