कारगिल - बटालिक सैक्टर - तासी नामगियाल - कैप्टन सौरभ कालिया और ऑपरेशन विजय की शुरुआत.....
उन्नीस सौ निन्यानबे का अप्रेल अपने आखरी दिनों में था। कारगिल के बटालिक सैक्टर के नजदीक "गेरकोन" गाँव में रहने वाले तासी नामगियाल का याक जिसे उन्होंने 12 हजार रुपए से खरीदा था, पिछले तीन-चार दिनों से घर नहीं लौटा था। तासी नामगियाल अपने बायनाकुलर और कुछ साथियों के साथ अपने याक को खोजने पहाड़ों की तरफ आगे बढ़े। बायनाकुलर के सहारे तासी नामगियाल ने अपने याक को तो खोज लिया था लेकिन इस दौरान उन्हें चोटियों के ऊपर आर्मी के वर्दी में बंकर बनाते कुछ लोग भी दिख गए थे जिनकी एपियरेंस पठानों की जैसी थी और उनके पास बंदूके भी थीं।
तासी नामगियाल अपने गाँव लौट कर इस खबर की सूचना, उनके गाँव मे ही रुके सेना के पंजाब रेजिमेंट के जवानों तक पहुँचा दिया था। सेना में यह खबर आग की तरह आगे बढ़ी। सेना ने वास्तविक स्थिति का पता लगाने के लिए कई पैट्रोल टीमों का गठन एक साथ किया था। लेफ्टिनेंट सौरभ कालिया के कमांड में भी एक पैट्रोल पार्टी को एडवांस करने का आदेश मिला था।
पढाई के दिनों में स्कॉलरशिप पाने वाले लेफ्टिनेंट सौरभ कालिया ने दिसम्बर 1998 में भारतीय सेना के फोर्थ जाट रेजिमेंट को जॉइन किया था और उनकी प्रतिनियुक्ति 1999 के हाल के दिनों में ही कारगिल में हुई थी। लेफ्टिनेंट कालिया ने अपने गस्त के दौरान यह पाया कि पहाड़ की चोटियों पर कुछ संदिग्ध लोग भारतीय बंकरों (पाकिस्तान और भारत की सेना एक समझौते के तहत ठंडे के दिनों में अपने-अपने बंकरों को खाली छोड़ पहाड़ के नीचे चले आते थे) में अपनी बन्दूकों और भारी मसीनगनों को माउंट कर रखा था। लेफ्टिनेंट सौरभ कालिया ने इस खबर को सेना तक सबसे पहले पहुंचा दिया था।
पंद्रह मई 1999 को लेफ्टिनेंट सौरभ कालिया अपने पाँच जवान साथियों के साथ जब काकसर सैक्टर के बजरंग पोस्ट की पैट्रोलिंग करते हुए आगे बढ़े थे कि अचानक ही उनकी पैट्रोल पार्टी पर पहाड़ की चोटियों से ताबड़तोड़ गोलियों की बौछारें आनी शुरू हो गईं। लेफ्टिनेंट सौरभ कालिया और उनके साथियों की गोलियां लगातार खत्म हो रही थी। उन्होंने मदद के लिए बैकप का सन्देश रेडियो सेट से रीले किया। लेकिन जब तक भारतीय सेना की रिइंफोर्समेंट उन तक पहुँचती पाकिस्तानी सैनिकों ने सौरभ कालिया और उनके पाँच साथियों को जिंदा ही पकड़ लिया था।
गोपनीय तथ्यों को उगलवाने के लिए पाकिस्तानी सैनिकों ने लेफ्टिनेंट सौरभ कालिया और उनके साथी जवानों को सात जून 1999 (22 दिन) तक क्रूरता के आखरी छोर तक प्रताड़ित किया। लेकिन भारतीय सेना के बहादुर जवानों की सत्यनिष्ठ देशभक्ति से हार कर पाकिस्तानी सैनिकों को जब कुछ हासिल नहीं हो पाया तो अन्ततः इन्हें जान से मार दिया गया। असहनीय पीड़ा को हँसी-हँसी बर्दास्त करते हुए भारत माता के ये वीर सपूत वीरगति को प्राप्त हुए थे।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट पाकिस्तानी सैनिकों की नीचता और क्रूरता को तस्दीक करते हुए यह कहती है कि उनके कानों में गर्म सलाखें डाल दी गई थी। दाँत निकाल लिए गए थे। आँखें निकालने से पहले उन्हें बुरी तरह से छतिग्रस्त किया गया था। जबड़े तौड़ दिए गए थे। होंठों को काट लिया गया था। नाक तोड़ दिए गए। हड्डियाँ तोड़ दी गईं थी आगे और भी बहुत कुछ है जिन्हें नहीं लिखा जा सकता है....।
लेफ्टिनेंट सौरभ कालिया और साथी जवानों की शहादत के प्रतिशोध में भारतीय सेना ने अब ऑपरेशन विजय का आरम्भ किया था ।

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