गुरुवार, 30 अप्रैल 2020

ऋषि कपूर और इरफान का यूँ चले जाना बहुत कुछ खाली कर गया ...

वक्त ने किया क्या हसीं सितम
तुम रहे ना तुम, हम रहे ना हम !!

कलाकार मरा नहीं करते ! कलाकार अपनी सीमाओं से परे, समय से परे जीते हैं । यूँ तो,कलाकार जिस कालखण्ड को जीता है उसकी हस्ती उसी कालखण्ड को निछावर होती है, लेकिन ये बात दूसरी है कि एक कलाकार अपने कला श्रेष्ठता के दम पर प्रशंसकों के समाज में शताब्दियों तक याद किया जाता है और उसके किये हुए कामो पर बलिहार होकर प्रशंसक कृतज्ञता लुटाता रहता है ।  

स्वर्गीय इरफ़ान और ऋषि कपूर भारतीय अभिनय कला जगत के ऐसे ही धुरंधर थे जिनकी कलाश्रेष्ठता से वशीभूत प्रशंसकों का एक वर्ग उन्हें जीवनपर्यंत स्मृत करता रहेगा । 

राजस्थान के टोंक से निकल कर गरीबी के टेढ़े और खुरदरे रास्ते को नापते हुए इरफ़ान ने फिल्मी जगत के छोटे पर्दे से अपने अभिनय का श्रीगणेश, द ग्रेट मराठा,चंद्रकांता और चाणक्य जैसे सीरियलों में जब किया, तो गरीबी से लड़ते हुए एक श्रेष्ट अभिनेता की संजीदगी उनके अभिनय में स्पष्तः दृष्टिगत हो रही थी । 

यहाँ से फिर इरफ़ान ने पीछे मुड़कर कभी नहीं देखा । इरफान के अभिनय और इनके नशीले आँखों के जादुई सम्मोहन से बने मिश्रित रासायन से कोई नहीं बच सका । कारवाँ आगे बढ़ता गया लोग सम्मोहित होते गए ।  

इरफ़ान ने एक इंटरव्यू में कहा था कि मेरा आधा अभिनय मेरी आँखें करती हैं और बाकी का आधा मैं । मेरे अब्बा ने एक बार मेरी आँखों के लिए कहा था " तुम्हारी ये आँखें हैं कि जादू का प्याला !! " 

संजीदे अभिनय और बोलती हुई आँखों की सुघड़ क्षमता के बदौलत इनके ठुमके नहीं लगाने की कमी को दर्शकों ने सहर्ष ही स्वीकार कर लिया था । दर्शकों को इऱफान वैसे ही पसन्द थे जैसे वो वास्तविक जीवन में थे।

लेकिन आज, आद्र कण्ठों से यह स्वीकार कर लेना पड़ता है की स्लमडॉग मिलियनर , लाइफ ऑफ पाई, लंच बॉक्स, हिंदी मीडियम ,पान सिंह तोमर जैसी फिल्मों को अपने अभिनय के दम पर भारतीय अभिनय कला कल नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने वाला इरफान नहीं रहा ! 

अभी ये से सब नया ही था कि विरक्तियों से लड़ते हुए आज ऋषि कपूर विदा कह गए ! 

चले जाना, दुनियाँ की सभी क्रियाओं में सबसे वीभत्स क्रिया है । जाने वाले चले जाते हैं स्मृतियों को शेष छोड़ जाते हैं । इस चले जाने की क्रिया का ना आदि है न अंत होगा ।  फिर भी इस रहस्यमय प्रश्न का जवाब कोई दे पाता तो मैं पूछने वालों की कतार में सबसे आगे खड़ा रहता । 

ख़ैर ! अपनी पुरखों से मिले अभिनय के उत्तराधिकार को ऋषि कपूर ने सम्पूर्ण समर्पण से आत्मसात कर आगे बढ़या था । उनकी सीधी टक्कर अपने जमाने के लिजेंड्रि बच्चन और खन्ना साहब से था । 

लेकिन चॉकलेटी बॉबी (बॉबी),  अकबर(अमर अकबर ऍंथोनी),  रवि वर्मा (कर्ज),रोहित(चांदनी), राजीव(नगीना) रवि(दीवाना) और रौफलाला के किरदारों से सने हुए अभिनय से वसीभूत होकर सिनेमा जगत के स्थापित कलाकारों ने ऋषि कपूर को  स्नेहित भाव से अंगीकार कर यह स्वीकृत किया था कि ऋषि कपूर सभी जॉनर के श्रेष्ठ अभिनेता थे । 

ऋषि कपूर जितने मंझे थे उतने ही सरल । एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि "जीवन के कड़वे सच्चाई से लड़ने के लिए आदमी को रोमांटिक बनना पड़ता है " अब इस बात को सूनकर कोई क्या ही कह पायेगा सिवाय रोने के ! 

लेख लम्बा हो रहा है लेकिन फिर भी ये बताना चाह रहा हूँ कि, कला जगत में कलाकार दो तरह के होते हैं । एक वो जिनके किये काम कम हैं लेकिन उनकी पहुँच प्रशंसकों और इस परिधि से बाहर के लोग भी हैं । 

कपूर साहब और इऱफान भाई इसी श्रेणी में आते हैं । आज दोनों हमारे बीच में नहीं हैं । इस तस्वीर में बात करते हुए ऋषि कपूर और इरफान खान एक दूसरे से यही बोल रहे होंगे :- 

मैं ना रहूँगा, तुम ना रहोगे,
फिर भी रहेंगीं ये निशानियां ...

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