गाँव की रातें बड़ी होती हैं । पूस की रातें तो सबसे बड़ी । घर के पिछवाड़े से ठंड में ठिठुरते हुए नवजात कुत्तों के कुईं-कुईं की आवाज आ रही है ।
अगहन बीत चुका है । धनकटनी खत्म हो चुकी है । किसानों का अड्डा खेत से उठ कर अब खलिहान में आ गया है । खेतों में धान की जगह सरसों ने ले लिया है । आने वाले तीन महीने खेतों का श्रृंगार सरसों के पीताम्बरी पुष्पचादर और लहलहाते हुए बालियां करेंगीं ।
किसान रात में भी नहीं सोते हैं । धान की पिटाई हो रही है । किसी ने जोड़ से दूसरे खलिहान में काम कर रहे किसान से खैनी के लिए आवाज लगाया है । बगल वाले खलिहान से निर्गुण गाते हुए किसान का जवाब आया है । यहाँ आकर ले जाओ, "ये दुनियाँ चार दिनों का मेला रे, कि हंस उड़ जाएगा फिर अकेला" !
नवजात पिल्लों ने आवाज निकालना बंद कर दिया है । शायद उनकी माँ उनके पास आ गई है । शायद इसलिए ही कहा जाता है कि माँ की सहचरी दुनियाँ की सबसे सुकूनदायक संगति होती है ।
पूस की रातें निपट सुनसान होती हैं । दूर शहर से किसी ट्रेन के भोपू की आवाज आ रही है । बाहर धवल आकाश है । पूस की चाँदनी है । कड़ाके की ठंड है । गाँव की अग्गम शांति है । अंदर मैं हूँ । रजाई है । धीरे-धीरे बुझता हुआ अलाव है ।
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