ये ठीक है की कफ़न में जेबें नहीं होती और कोई कितना ही कमा-धमा ले, अपने साथ लाद-बोज कर कुछ भी नहीं ले जाता है । सब कुछ यहीं छुट जाता है !
कुछ लोग अपने पीछे प्रार्थनाओं का आशीर्वाद छोड़ जाते हैं तो कुछ लोग कड़वी यादों की पोटरी को बांध कर चल बसते हैं । कुछ थोड़े लोग, बहुतों के लिए बहुत कुछ छोड़ जाते हैं जिसके पदचिन्हों पर समाज आगे बढ़ता रहता है ।
ख़ैर ! इस ब्रम्ह ज्ञान को दरकिनार करते हुए कि मेरे भी कफ़न में जेबें नही होंगीं और सब कुछ यहीं छूट जाएगा, फिर भी पिछले बारह- पंद्रह सालों से घर से बाहर हूँ। इस दौरान जब -जब नोकरी के लिए,"घर" और माँ-पापा को छोड़ कर बाहर निकला हूँ कसम से (आप चाहे जो भी कसम खिला लें हम खा लेंगें) मन भारी हो जाता है। लगता है घर, घर ना रहा, मायका हो गया है। लेकिन किया भी क्या जा सकता है ? मृगतृष्णाओं की भी अपनी माया है ।
अभिलासाओं की मृगमरीचिका के पीछे बेतहासा दौड़ते हुए मृग की भाँति आदमी, बीतते हुए समय के टुकड़ों में अपने जीवन के बहुमुल्य क्षणों को दरकिनार करता रहता है ।आदमी आगे बढ़ता है मरीचिका और बढ़ती है । मुक्कममल वक्त ना कभी आता है ना आदमी कभी रुकता है ।
हालांकि, इन मृगतृष्णओं के बीच में वह चाहता है कि पीछे छुटे हुए उन बहुमूल्य वक्त के टुकड़ों को लपक कर उन क्षणों में अपनी खुशियाँ लुटा सके, उन्हें बता सके कि उसके जीवन में उन बीते क्षणों का कितना महत्व है ! लेकिन वक्त की एक बुरी बात है की यह लौटता नहीं है ।
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