मंगलवार, 27 अक्टूबर 2020

मधुपुर डायरी-१

ऑक्सीजन की कमी से फड़फड़ाता हुआ फेफड़ा दिल्ली छोड़ जब गाँव में पहुँचता है तो उसे सहजता से यह महसूस होने लगता है कि हवा की भी अपनी मोटाई होती है और वजन तो होता ही है। 

कोरोना का डर अब धीरे-धीरे बड़े शहरों में ही जैसे सिमटने लगा है। यहाँ कम लोग ही मास्क लगा रहे हैं (समाजिक दूरी तो खैर अब कहीं रहा ही नहीं है)। लेकिन इन सबों के बीच सुखद यह कि संक्रमण का दर गाँवों में नहीं के बराबर है। ऐसा शायद इसलिए भी की गाँव की दिनचर्या शहरी लोगों से आज भी काफी बेहतर है। प्रदूषण के बढ़ते स्तर ने शहरी जीवन को किस स्तर तक प्रभावित किया है इसका अंदाजा शहरी संक्रमण दर को देख कर सहजतापूर्वक  ही लगाया जा सकता है। 

इन सब बातों को सोचते हुए घर के बालकॉनी में बैठा हुआ हूँ। कार्तिक महीने के शुक्लपक्ष का चंद्रमा धीरे-धीरे जवान होता जा रहा है। सामने बगीचे में लगे सागौन के पेड़ों की मद्धम हवा चल रही है और मैं अपने फेफड़े में इस ताजी हवा को ठूँस कर उसे फिर से जवान करना चाह रहा हूँ....

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