स्मृतियों का अपना मायालोक है । जन्म से जरा और जरा से मृत्यु तक के चैतन्यरहित यात्रा में स्मृतियाँ, लाठी की टेक होती हैं, जिनके सहारे जीवन अपने उबड़- खाबड़ व्यवधान भरे रास्ते को पार करता रहता है ।
स्मृतियों की अनुपस्थिति में मनुष्य, वीरान रास्ते में पड़ने वाले उस जल विहीन कुवें के समान होता है, जिसे देख प्यास से त्रस्त पथिक पूर्ण अभिलाशा से दौड़ लगता तो है लेकिन उसके अंदर झांक कर निरास हो लौटता है ।
स्मृतियों का शून्य हो जाना, जीवन की समाप्ति है । मृत्यु पूर्व, स्मृतियों का शून्य हो जाना भी मृत्यु समान ही है । स्मृतियाँ हैं तो जीवन की सार्थकता बनी रहती है। स्मृति रहित जीवन का भला क्या मोल !
क्लाइव जो ब्रिटेन का एक मशहूर संगीत सम्पादक था, दिमागी बीमारी के कारण छब्बीस साल की उम्र में सब कुछ भूल गया था । डेब्रा (पत्नी) उसे कुछ दिनों तक सम्भालती रहीं और फिर जीवन के इस घुप्प अँधरे रास्ते से डरकर अमेरिका प्रवासित हो गईं ।
क्लाइव को अपने नाम के अलावे अगर कुछ याद था तो वो डेब्रा का चेहरा था और कुछ पुराने संगीत की धुने थी, जिसे वह कभी बजाया करता था । क्लाइव ये नहीं जानता था कि डेब्रा को देख कर वो खुश क्यों होता था लेकिन डेब्रा के सामने आते ही क्लाइव, उससे गले मिलने के लिए दौड़ पड़ता था । डेब्रा अब उसके पास नहीं थी । क्लाइव पुराने संगीत के उन टुकड़ों के साथ अब अकेला हो गया था ।
कुछ दिनों बाद डेब्रा क्लाइव के पास लौट आईं, क्लाइव उससे गले मिलकर फफक कर रोने लगा था । डेब्रा ने पूछा, क्यों रो रहे हो ? क्लाइव नहीं जानता था की वह क्यों रो रहा है । लेकिन उसने डायरी में लिखा था "मुझे कुछ याद क्यों नहीं है " !! डेब्रा कहा करती थीं, क्लाइव के पास खोने को कुछ नहीं है लेकिन मैं क्लाइव को रोज खोती हूँ । क्लाइव के स्मृतियों के अभाव में, मेरे प्यार और अपनेपन का भला क्या महत्व !
अगर स्मृतियों की शून्यता मृत्यु समान है तो सबकुछ स्मृत रहना भी जीवन की सार्थकता को खत्म कर देता है ।
ओरेलियन को सब कुछ याद रहता था । वह कब भूखा रहा था, उसे कब डांट पड़ी थी, उसने कब चॉकलेट खाया था, उसके पिता ने अपनी कार क्यों बेची थी...इत्यादि । वह आगे कहता है इन्हें नियंत्रित करना इतना आसान नहीं है । मेरा ना तो कोई भूत है और ना ही भविष्य होगा । मेरा विशाल वर्तमान मुझे लगातार परेशान करता रहता है ।
सम्वेदनाओं को हर बार टाल पाना मुश्किल काम है । सुख का दीर्घ समय भी छोटा होता है और दुःख की अल्प अवधि भी दीर्घ लगती है । ऐसा महसूस होना मानव स्मृतियों का प्रभाव है । सब खेल स्मृतियों का है ...
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