गुरुवार, 7 मई 2020

सेनाओं के नायक रुपहले पर्दे पर नहीं आते हैं, लेकिन उनकी विजय गाथा उन्हें सर्वकालिक महानायक बनाते हैं ..

विश्व युद्ध इतिहास का हर पन्ना साक्षी है कि सेनापतियों के अतुलित साहस औऱ निपुण युद्धकौशल, युद्धभूमियों में विजयश्री के उतुंग ध्वज को गाड़ते आये हैं ।

सेनापति विजयश्री के मनोरथ से जब अपनी सेनाओं को समर समर्पित करता है तब उसका अवचेतन मन यह कामना भी करता रहता है कि विजयश्री के अंतिम क्षणों तक उसकी सेनाएं निर्विघ्न रहे ! परन्तु, समराग्नि अगर उसे मृत्यु वरन को विवश ही कर दे तो, मृत्यु के अंतिम क्षणों तक भी उसकी सेनाएं अक्षुण्य रहे !

सेनापति अपने सेनाओं के परिवार का बरगद होता है । जिसके गहरे छाँव के निचे उसकी सेनाएं आशंका मुक्त रहती हैं ।   

शहीद कर्नल आशुतोष शर्मा का नाम ऐसे ही शूरवीर सेनापतियों के नामों के साथ शताब्दियों तक स्मृत किया जाएगा । १४वें और अंतिम प्रयास में सेना में भर्ती होने वाले आशुतोष शर्मा की नियति ही देश सेवा की थी । अपने सैन्य सेवाओं के दौरान दुर्गम और दुरूह अभियानों को अपने युद्धकौशल और चपल निर्णय के दम पर सुगम बनाने वाले कर्नल आशुतोष शर्मा ने यह सत्यापित किया था कि ईश्वर ने उन्हें सैन्य सेवा के लिए ही रचा था । उनके उत्कृष्ट सेवाओं के लिए कर्नल आशुतोष शर्मा को सेना ने इन्हें अपने तमगे से भी सजाया था । 

भारतीय सेना के राष्ट्रीय राइफलस को परमवीर और दुर्धस योद्धाओं का खजाना कहा जाता है । अपने अंतिम विजय अभियान के दौरान कर्नल शर्मा २१ वें आर आर के कमांडिंग ऑफिसर थे । पहाड़-पर्वत-जंगल के खाख छानने वाले कर्नल आशुतोष शर्मा ने अपने सेवाकाल में चले दुर्गम विजय अभियानों के अनुभवों से परिपक्वता की उच्च सीमा को प्राप्त किया था । 

तीन दिन पहले दस्युदल द्वारा अप्रिय घटना के कलुषित मंशा को विफल करने के दौरान, मृत्यु के अंतिम क्षणों तक अपने टीम को सुरक्षित करने की जद्दोजहद में कर्नल आशुतोष शर्मा वीरगति को प्राप्त हो गए ।  

भारत, प्रलय के अंतिम दिनों तक स्वर्गीय कर्नल आशुतोष शर्मा का ऋणी रहेगा । इन्होंने अपने पीछे वीरता की अथाह विरासत को छोड़ा है जिसे पढ़-सुन कर पीढ़ियाँ उनके पदचिन्हों को अनुसरीत करती रहेंगीं। 

सेनाओं के नायक पर्दे पर नहीं आते हैं लेकिन उनके विजय गाथाओं का वास्तव अभिनय उन्हें  सर्वकालिक महानायक बनाते हैं ।

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