शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2021

वृंदावन की यात्रा..

पिछले दिनों ठाकुर जी की नगरी मथुरा/वृंदावन जाने की कामना फलीभूत हुई। मेरी वृंदावन की ये दूसरी यात्रा थी। दस साल पहले और अब के मथुरा/वृंदावन में बहुत कुछ बदलाव था। नई दुकाने, नए होटल, सड़कें और भक्तों की भीड़। सब कुछ बदली हुई थी। लेकिन जो नहीं बदला था वो वृंदावन की गलियों में बाँके बिहारी लाल और राधा रानी के प्रेम के उस दिब्य स्वरूप के होने की अनुभूति थी, जिसके स्मरण मात्र से चेतना के समस्त दिशाओं में प्रेम का प्रवाह होता रहता है। इस अमूर्त प्रेम और समर्पण के स्वरूप का आभास आज से दस साल पहले भी मुझे इसी स्वरूप में हुआ था जैसा उस दिन हो रहा था और शायद युगों-युगांतर तक यहाँ आने वाला हरेक व्यक्ति, राधा-कृष्ण के प्रेम के इस स्वरूप को अनुभूत करता रहेगा। 

कृष्ण प्रेमी हैं, कृष्ण प्रेम भी। कृष्ण भक्ति भी हैं, कृष्ण भक्त भी। कृष्ण मनहर हैं, कृष्ण मनस्वी भी।कृष्ण सृष्टा भी हैं, कृष्ण सृष्टि भी।
कृष्ण महापराक्रमी हैं लेकिन कृष्ण अपूर्व प्रेमी भी हैं। कृष्ण के निस्नात प्रेम को वृंदावन की वसुंधरा का कण-कण, राधा नाम जपते हुए इस प्रेम के सम्मान की व्यख्या करती रहती है। गली,चौराहे, चबूतरे,घड़ी-घण्टों,सत्संग स्थानों और आश्रमों से उठते ध्वनियों में राधा नाम के स्मरण की गूंज मात्र इसलिए गूंजती रहती है क्योंकि  राधा नाम में ही कृष्ण समाहित है।  

कृष्ण प्रेमी भी हैं, कृष्ण प्रेम भी। कृष्ण कृष्ण भी हैं, राधा भी....

हमारी वृंदावन की यात्रा इस अनुभूति से समाप्त हुई कि दुनियाँ में प्रेम बना रहे। राधा-कृष्ण लोगों के चेतना में प्रेम का संचार करते रहे। जय श्री कृष्ण...

रविवार, 21 फ़रवरी 2021

हरिद्वार यात्रा...

किंवदंतीयाँ ऐसी है कि जब तक ईश्वर आपको अपने पास बुलाते नहीं है आप उनके दरबार में हाजरी नहीं लगा पाते हैं। पिछला पूरा साल कोरोना के भेंट चढ़ने के कारण साल भर से टलती आ रही हरिद्वार यात्रा का मुहूर्त तय किया गया और अन्ततः शनिवार की सुबह हमलोग पाप नाशनी माँ गंगा में डुबकी लगाने इस विश्वास से निकल पड़े थे कि दुनियाँ के पापों को धोने वाली माँ गंगा अपने निर्मल और पवित्र आँचल से हमलोगों के पापों को धोकर आशीर्वाद से सिक्त करेंगीं ! 
                                   (रास्ते का चाय)
                                      (रास्ते)
अपराह्न में हमलोग हरिद्वार पहुँच चुके थे। विशाल जलराशि को समेट कर शांत भाव से बहने वाली माँ गंगा अपने निर्मल और पवित्र स्वरूप में आंखों के सामने दृष्टिगोचर थी। घाटों में डुबकियां लगाते भक्तों द्वारा माँ गँगा की जयजयकार, मंदिरों के घण्टों से उठती हुई पवित्र प्रतिध्वनि और मंत्रोच्चार से हरकीपौडी का वातावरण हर और हरी के हरिद्वार में विराजने की स्वर्गीय अनुभूति प्रदान कर रहा था।                           (हरिद्वार में माँ गंगा का प्रवेश)
                               (हरकीपौडी)
माँ गंगा के जल को आचमन और आँखों से लगाकर श्रद्धा अर्पित करते हुए हमने माँ गंगा में हमने डुबकी लगाया। कुछ डुबकि अपने नाम और बाकी की डुबकियां माता-पिता और परिवार वालों के नाम से। डुबकी लगाने के बाद महसूस ऐसा हुआ जैसे देह का आधा भार किसी ने कम कर दिया हो। 

पूजा अर्चना और माता मनसा के दर्शन के बाद हमलोग घाट पर पुनः वापस आ चुके थे। संध्या आरती प्रारम्भ हो चुकी थी। दक्षिण दिशा में अस्त होते सूर्य की किरणें गंगा की लहरों को छू कर संध्या वंदन किये जा रही थीं। अब चारों दिशाओं से उठते वैदिक मंत्रों की प्रतिध्वनियों का ईश्वरीय सम्मोहन था। माँ के जय जयकार से गंगा आरती सम्पूर्ण हुई। सबने जयजयकारा लगाया। पपनाशनी माँ गंगे की जय-जय...
                              (गंगा आरती)
                          (माँ गंगा की सुंदरता)
हरकीपौडी से गंगा जल साथ लेकर माँ गंगा से यह विनती किया कि अगले बार फिर से अपने पास जल्दी ही बुलान, आगे की यात्रा ऋषिकेश की और बढ़ गई थी।


शनिवार, 7 नवंबर 2020

मधुपुर डायरी - ३

नवम्बर लौटने का महीना है। किसान खेतों में लौट रहे हैं। बाहर मजदूरी करने गए लोग फिर से गाँव लौट रहे हैं। ठंढ भी अब धीरे-धीरे लौटने लगी है। गाँव के बड़े तालाब में साइबेरियन पक्षी फिर से लौटने लगे हैं। टूटे हुए खलिहान को सँवारने, महिलाएं खलिहान लौट रही हैं और लौट रहा है धान का सुनहला रंग।

धान की कटाई अब शुरू हो गई है। कोरोना के संत्रास के बीच किसानों के लिए सुखद यह कि इंद्रदेव की कृपा से इस साल की उपज ठीक होने वाली है।

बिहार चुनाव सम्पन्न हो गए हैं। एक्जिट पोल आने लगे हैं। बैठकों की बतकही में इन मुद्दों ने भी अपना जगह घेर रखा है। लेकिन किसानों को इन सब बातों से कोई सरोकार नहीं है। वो धान की बालियों को देखकर अपने हिसाब से उपज का एक्जिट पोल निकालते हैं और उससे होने वाली कमाई को सोचकर मुस्कुराते हुए फसल पर हंसिया चलाते हैं....

गुरुवार, 29 अक्टूबर 2020

मधुपुर डायरी -२

माता रानी की प्रतिमा के विसर्जन के साथ दुर्गापूजा का समापन हो चुका है। इस साल के दुर्गापूजा का उमंग कोरोना के कारण फीका-फीका सा रहा यहाँ। कोरोना प्रोटोकॉल के तहत प्रसाशन के आदेशानुसार पंडाल नहीं बनाये गए थे, रावण दहन का कार्यक्रम भी आयोजित नहीं किया गया था। सब कुछ सादा-सादा सा ही खत्म हो गया।  
ये अलग बात है कि मधुपुर विधानसभा के निर्वाचित जनप्रतिनिधि के आकस्मिक निधन के कारण, खाली हुए इस विधानसभा में उपचुनाव जल्द ही होने वाले हैं। उस समय रेलियाँ भी होंगीं, सभाएं भी आयोजित की जायेंगीं और भीड़ तो इक्कट्ठा होगा ही। अब चुनाव में कोरोना को भाव देता ही कौन है। बिहार में ही देख लीजिए।
ख़ैर अब जो है सो है। फिलहाल मैं बहन घर से आये हुए बालूशाही का आनन्द लेते हुए यह सोच रहा हूँ की देवघर का पेड़ा ही केवल मशहूर नहीं है। पांडे दुकान का बालूशाही का भी अपना ही स्वाद है....

मंगलवार, 27 अक्टूबर 2020

मधुपुर डायरी-१

ऑक्सीजन की कमी से फड़फड़ाता हुआ फेफड़ा दिल्ली छोड़ जब गाँव में पहुँचता है तो उसे सहजता से यह महसूस होने लगता है कि हवा की भी अपनी मोटाई होती है और वजन तो होता ही है। 

कोरोना का डर अब धीरे-धीरे बड़े शहरों में ही जैसे सिमटने लगा है। यहाँ कम लोग ही मास्क लगा रहे हैं (समाजिक दूरी तो खैर अब कहीं रहा ही नहीं है)। लेकिन इन सबों के बीच सुखद यह कि संक्रमण का दर गाँवों में नहीं के बराबर है। ऐसा शायद इसलिए भी की गाँव की दिनचर्या शहरी लोगों से आज भी काफी बेहतर है। प्रदूषण के बढ़ते स्तर ने शहरी जीवन को किस स्तर तक प्रभावित किया है इसका अंदाजा शहरी संक्रमण दर को देख कर सहजतापूर्वक  ही लगाया जा सकता है। 

इन सब बातों को सोचते हुए घर के बालकॉनी में बैठा हुआ हूँ। कार्तिक महीने के शुक्लपक्ष का चंद्रमा धीरे-धीरे जवान होता जा रहा है। सामने बगीचे में लगे सागौन के पेड़ों की मद्धम हवा चल रही है और मैं अपने फेफड़े में इस ताजी हवा को ठूँस कर उसे फिर से जवान करना चाह रहा हूँ....

रविवार, 16 अगस्त 2020

मैं पल दो पल का शायर हूँ...

धोनी कल रिटायर्ड हो गए। एक छोटे से इंस्टाग्राम वीडियो के मार्फ़त धोनी ने लोगों को बताया कि उन्होंने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के सभी फॉर्मेट से सन्यास ले लिया है। उनके प्रशंसकों कि यह चाह थी की धोनी अपना आख़री मैच मैदान पर खेलने उतरते और सम्भवतः यह भी तमन्ना कि वो विजयी छक्के से अपनी अंतिम पारी को घोषित करते! लेकिन धोनी ने हमेशा सम्भावनाओं से आगे बढ़कर खेल खेला है। रिटायरमेंट का उनका यह मास्टरस्ट्रोक भी शायद उसी खेल का आखरी हिस्सा रहा हो। 

लम्बे बालों वाले हेलीकॉप्टर शॉट के जनक के रूप में प्रसिध्दि प्राप्त करने वाले खिलाड़ी से कैप्टन कूल तक का उनका सफर क्रिकेट प्रशंसकों के लिए हमेशा ही हर्षदायक रहा। बतौर कैप्टन, गाँगुली से प्राप्त भारतीय क्रिकेट टीम की विरासत (द्रविड़ को छोड़ते हैं) को धोनी ने उन सभी क्षेत्रों में इनरीच किया जिसकी कमी से भारतीय टीम जीत के आखरी लम्हों को भुना पाने में असमर्थ रह जाती थी। 

यह सब इतना आसान भी नहीं था। आईसीसी के सभी तीनों ट्रॉफियों को जीतने वाले कैप्टन कुल ने क्रिकेट में कभी निज स्वार्थ के लिए जगह नहीं ढूंढा। जीत को जब भी धोनी की जरूरत पड़ी धोनी ने उसी अनुरूप अपनेआप को वहाँ फिट करने का सफल प्रयास किया। 

खेल के आखरी गेंद तक पराजय की रथ को विजय जुलूस के पथ पर मोड़ देने वाले महेंद्र सिंह हमेशा ही आस पास की परिस्थितियों से सांत्वनाशून्य भाव लिए ही अपने आप को परिचित करवाते रहते थे। फिर वो विश्वकप का विश्वविजयी छक्का हो या पिछले विश्वकप के सेमीफाइनल में रन आउट होकर पेवेलियन लौटता धोनी हो। धोनी जब बहुत गदगद होते थे तब थोड़ी मुस्कान अपने चेहरे पर बिखेरते थे पर दर्शकों की स्मृति में विरले ही ऐसी घटना अंकित हुई हों जब धोनी ने शतक लगा कर भुजाओं को लहराते हुए अपना दम्भ प्रदर्शित किया हो।

कैप्टन कूल का क्रिकेट को छोड़ना एक ऐसा वैक्यूम है जिसे शायद धोनी ही पूरा कर सकते हैं..

गुरुवार, 2 जुलाई 2020

उसेन बोल्ट और ट्रिपल-ट्रिपल ......

वोल्ट हँसते हुए कहते हैं कि आप सौ आदमियों को कतार में खड़ा कर बारी-बारी से बास्केटबॉल, फुटबॉल या क्रिकेट के विश्वप्रसिद्ध खिलाड़ियों के नाम को पूछें !
ऐसा करने से इस बात की शत-प्रतिशत सम्भावना बनी रहेगी कि उनकी सहमति किसी एक खिलाड़ी के नाम पर ना बने। लेकिन अगर आप उनसे दुनियाँ के सबसे बेहतरीन धावक का नाम पूछेंगे तो इस बात की भी शत-प्रतिशत सम्भावना रहेगी कि वो एक ही नाम लेंगें "उसेन बोल्ट" !
दरअसल ये उनके मन मे उपजा हुआ विश्वास है जिसे अर्जित करने के लिए समर्पण के इस यज्ञ कुंड में मैंने अपना सर्वस्व आहूत कर दिया था। 6.8 बिलियन जनसंख्या वाली दुनियाँ में, आजतक लगभग 107 बिलियन लोग रह चुके हैं। लेकिन जब आप यह जानते हैं कि आप इन सबों में सबसे तेज हैं तो यह आश्चर्यजनक सा लगता है। "इट डजन्ट गेट ऐनी कूलर देन नोइंग यू आर द फास्टेस्ट देन देम"।
15 साल की उम्र में ही विश्व जूनियर एथिलट चैम्पियनशिप में गोल्ड मैडल जितने वाले बोल्ट ने जब 2004 के एथेंस ऑलम्पिक के ट्रेक पर अपना डेब्यु किया था, तो दर्शकों की करतल ध्वनियाँ बोल्ट के सहर्ष अभिवादन को आतुर थीं। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। कम उम्र में ही मिली सफलता और उससे उपजे उन्माद को पचा पाने में असफल रहे बोल्ट की अनियमित दिनचर्या ने उनके रफ़्तार को असाधारण रूप से छति पहुंचाई थी। बोल्ट को छठे पायदान से ही संतोष करना पड़ा था।
हालांकि ये हार बोल्ट द्वारा साध्य कर पाना कठिन था, अपितु, उनके कैरियर के उत्थान का वास्तविक प्रारूप इस हार ने ही ड्राफ्ट किया था। बोल्ट ने यहाँ से पीछे मुड़ कर कभी नहीं देखा। वो मैदान पर उतरते और पुराने रिकॉर्ड को ध्वस्त कर नए कीर्तिमान स्थापित करते। कई बार दूसरे खिलाड़ियों का और कई बार खुद के ही स्थापित रिकॉर्डों का!
2008 के बीजिंग, 2012 के लंदन और 2016 के रियो ऑलम्पिक में 100 मीटर और 200 मीटर के दौड़ में रफ्तार के इस अजेय योद्धा ने स्वर्ण पदकों की झड़ी लगा दी। बोल्ट ने अपने सभी प्रतिस्पर्धाओं के स्वर्ण पदकों को अपने नाम कर लिया था। तीन ओलम्पिक और हर पर्तिस्पर्धा के तीनो स्वर्ण पदक। बोल्ट, कार्ल लुइस के रिकॉर्ड को तोड़ कर ऐसा कारनामा कर इतिहास रच लिया था। ट्रिपल-ट्रिपल...
बोल्ट आगे कहते हैं कि लोग अक्सर मुझसे पूछते रहते हैं, क्या ऐसा करना आसान है? "इट्स प्रिटी कुल एंड इजियर"। मैं अक्सर उन्हें यही जवाब देता हूँ। लेकिन वास्तव में ये सब इतना आसान नहीं है। बोल्ट को बोल्ट बने रहने की पीछे घण्टों का संयमित मेहनत और उससे उपजता थकावट है। जिससे बोल्ट को नियमित जूझना पड़ता है। लोगों को जीत पसंद होती है और वो वही देखना चाहते हैं। उन्हें पर्दे के पीछे चलने वाले संघर्षों से कोई राब्ता नहीं होता है..


जस्टिन गैटलिन की चुनौती और बोल्ट द्वारा अपने बादशाहत को क़ायम रखना.....

साल 2016 के रियो ऑलम्पिक की तैयारियाँ आखरी छोर पर खड़ी थी। बीजिंग और लंदन में आयोजित पिछले दो ऑलम्पिक के दौरान रफ़्तार में अपनी बादशाहत कायम कर चुके बोल्ट, 100, 200 और 400 मीटर रीले के सभी स्वर्ण पदकों को अपने नाम कर, विरोधियों को यह बता चुके थे कि असल मे रफ़्तार के वो ही क्षत्राधिपति हैं।
इधर बोल्ट को अपना चिरप्रतिद्वंद्वी मानने वाले जस्टिन गैटलिन पर लगा प्रतिबंध अब तक खत्म हो चुका था। एक इंटरव्यू के दौरान पूछे गए सवाल पर गैटलिन ने जवाब देते हुए कहा था कि "विजयी राष्ट्र ध्वजवाहक गैटलिन ही होगा" । दरअसल ये चुनोती सीधे-सीधे बोल्ट को थी। हालाँकि, बोल्ट ने गैटलिन के इस चुनौती का कोई मौखिक जवाब तो नहीं दिया था लेकिन उनके दिनचर्या को इस चुनौती ने प्रभावित तो किया ही था। बोल्ट हंसते हुए आगे कहते हैं "गैटलिन की स्ट्रेटजी काम कर गई थी" ।
लेकिन कठोर परिश्रम को चुनोतियों ने कब तक प्रभावित किया है भला! बोल्ट और गैटलिन अब ट्रैक पर फिर से आमने-सामने थे। बोल्ट ने पुनः सौ, दो सौ, और चार सौ मीटर रीले के सभी प्रतिस्पर्धाओं के स्वर्ण पदक को आपने नाम कर लिया था।
दौड़ खत्म होने के बाद फफ़कते हुए जस्टिन गैटलिन को बोल्ट ने गले लगा कर यह स्थापित किया की खिलाड़ियों के लिए जीत के साथ-साथ दूसरे खिलाड़ियों की भावनाओं का सम्मान महत्वपूर्ण होता है। दर्शकों की करतल ध्वनियाँ बजती रही। प्रशंसकों के नजर में बोल्ट का कद और भी बढ़ता गया। आखीर,यूँ ही तो कोई चैम्पियन नहीं बन जाता है ....
(तस्वीर में गैटलिन हैं । बोल्ट को कौन नही जानता ! उनका भला परिचय क्यों कराया जाए!)

दौड़ का इतिहास और उसेन बोल्ट....

आदमी अनादि काल से दौड़ता रहा है। सभ्यता के विकासपूर्व में मनुष्य भोजन की तालाश में दौड़ता था और सभ्यता के उत्तरार्ध में अब भी इसकी दौड़ जारी है।
एक सैनिक ने ऐसी ही दौड़ ईसा से 490 ईस्वी पूर्व, युद्ध मे जीत की खुशखबरी को अपने राजा तक पहुँचाने के लिए "मैराथन" से "एथेंस" तक बिना रुके ही लगाया था।
समय के साथ उस सैनिक की किंवन्दतियाँ भी आगे बढ़ती गयीं और अंत मे उसके सम्मान में दुनियाँ भर में दौड़ प्रतियोगितायें आयोजित होने लगीं। प्रतियोगिता शुरू हुआ तो सर्वश्रेष्ठ धावकों (जिसकी सूची काफी लंबी है) ने अपनी कीर्ति को स्थापित कर नए-नए कीर्तिमान बनाये। एक बनाता तो दूसरा उसे तोड़ उससे भी श्रेष्ठ कीर्ति स्थापित करता। समय आगे बढ़ता गया और सर्वश्रेष्ठ धावकों की सूची लम्बी होती गई।
मेरे लिए सर्वश्रेष्ठ धावक के रूप में पहला नाम जमैका के "असफा पॉवेल" थे। इसमे कोई दो मत नहीं है कि इनके पहले भी कई दिग्गजों ने अपनी कीर्ति यहाँ स्थापित की थी। लेकिन, पढाई के दौरान मेरे द्वारा किसी धावक का पहला परिचय पॉवेल ने उस समय कराया था जब उन्होंने 2005 में 100 मीटर रीले को 9.77 सेकेंड में दौड़ कर विश्वखेल जगत में अपना झंडा लहराया था।
पहला परिचय लोगों को बहुत दिनों तक याद रहता है इस कारन पॉवेल आज भी मुझे प्रिय हैं। फिर जस्टिन गैटलिन आ गए। कुछ दिन रुके और डोप टेस्ट में फेल होने के बाद कहीं नेपथ्य में गुम हो गए। अब बोल्ट आ गए थे। "उसेन सेंट लियो बोल्ट"। बोल्ट आये, रफ़्तार के आश्चर्यजनक कीर्तिमान को स्थापित किया और अपने कैरियर के उत्थान पर विराजित रहते हुए ही 2017 में इस खेल से विदा ले लिया। पॉवेल मेरे प्रिय रहे हैं लेकिन बोल्ट जैसा कोई नहीं !
कार्ल लुइस से क्षमा याचना के साथ......
(तस्वीरें इंटरनेट से ली गई हैं। बांयें से क्रम में पॉवेल, गैटलिन और बोल्ट हैं)


कारगिल विजय के इक्कीस साल.......

कारगिल - बटालिक सैक्टर - तासी नामगियाल - कैप्टन सौरभ कालिया और ऑपरेशन विजय की शुरुआत.....
उन्नीस सौ निन्यानबे का अप्रेल अपने आखरी दिनों में था। कारगिल के बटालिक सैक्टर के नजदीक "गेरकोन" गाँव में रहने वाले तासी नामगियाल का याक जिसे उन्होंने 12 हजार रुपए से खरीदा था, पिछले तीन-चार दिनों से घर नहीं लौटा था। तासी नामगियाल अपने बायनाकुलर और कुछ साथियों के साथ अपने याक को खोजने पहाड़ों की तरफ आगे बढ़े। बायनाकुलर के सहारे तासी नामगियाल ने अपने याक को तो खोज लिया था लेकिन इस दौरान उन्हें चोटियों के ऊपर आर्मी के वर्दी में बंकर बनाते कुछ लोग भी दिख गए थे जिनकी एपियरेंस पठानों की जैसी थी और उनके पास बंदूके भी थीं।
तासी नामगियाल अपने गाँव लौट कर इस खबर की सूचना, उनके गाँव मे ही रुके सेना के पंजाब रेजिमेंट के जवानों तक पहुँचा दिया था। सेना में यह खबर आग की तरह आगे बढ़ी। सेना ने वास्तविक स्थिति का पता लगाने के लिए कई पैट्रोल टीमों का गठन एक साथ किया था। लेफ्टिनेंट सौरभ कालिया के कमांड में भी एक पैट्रोल पार्टी को एडवांस करने का आदेश मिला था।
पढाई के दिनों में स्कॉलरशिप पाने वाले लेफ्टिनेंट सौरभ कालिया ने दिसम्बर 1998 में भारतीय सेना के फोर्थ जाट रेजिमेंट को जॉइन किया था और उनकी प्रतिनियुक्ति 1999 के हाल के दिनों में ही कारगिल में हुई थी। लेफ्टिनेंट कालिया ने अपने गस्त के दौरान यह पाया कि पहाड़ की चोटियों पर कुछ संदिग्ध लोग भारतीय बंकरों (पाकिस्तान और भारत की सेना एक समझौते के तहत ठंडे के दिनों में अपने-अपने बंकरों को खाली छोड़ पहाड़ के नीचे चले आते थे) में अपनी बन्दूकों और भारी मसीनगनों को माउंट कर रखा था। लेफ्टिनेंट सौरभ कालिया ने इस खबर को सेना तक सबसे पहले पहुंचा दिया था।
पंद्रह मई 1999 को लेफ्टिनेंट सौरभ कालिया अपने पाँच जवान साथियों के साथ जब काकसर सैक्टर के बजरंग पोस्ट की पैट्रोलिंग करते हुए आगे बढ़े थे कि अचानक ही उनकी पैट्रोल पार्टी पर पहाड़ की चोटियों से ताबड़तोड़ गोलियों की बौछारें आनी शुरू हो गईं। लेफ्टिनेंट सौरभ कालिया और उनके साथियों की गोलियां लगातार खत्म हो रही थी। उन्होंने मदद के लिए बैकप का सन्देश रेडियो सेट से रीले किया। लेकिन जब तक भारतीय सेना की रिइंफोर्समेंट उन तक पहुँचती पाकिस्तानी सैनिकों ने सौरभ कालिया और उनके पाँच साथियों को जिंदा ही पकड़ लिया था।
गोपनीय तथ्यों को उगलवाने के लिए पाकिस्तानी सैनिकों ने लेफ्टिनेंट सौरभ कालिया और उनके साथी जवानों को सात जून 1999 (22 दिन) तक क्रूरता के आखरी छोर तक प्रताड़ित किया। लेकिन भारतीय सेना के बहादुर जवानों की सत्यनिष्ठ देशभक्ति से हार कर पाकिस्तानी सैनिकों को जब कुछ हासिल नहीं हो पाया तो अन्ततः इन्हें जान से मार दिया गया। असहनीय पीड़ा को हँसी-हँसी बर्दास्त करते हुए भारत माता के ये वीर सपूत वीरगति को प्राप्त हुए थे।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट पाकिस्तानी सैनिकों की नीचता और क्रूरता को तस्दीक करते हुए यह कहती है कि उनके कानों में गर्म सलाखें डाल दी गई थी। दाँत निकाल लिए गए थे। आँखें निकालने से पहले उन्हें बुरी तरह से छतिग्रस्त किया गया था। जबड़े तौड़ दिए गए थे। होंठों को काट लिया गया था। नाक तोड़ दिए गए। हड्डियाँ तोड़ दी गईं थी आगे और भी बहुत कुछ है जिन्हें नहीं लिखा जा सकता है....।
लेफ्टिनेंट सौरभ कालिया और साथी जवानों की शहादत के प्रतिशोध में भारतीय सेना ने अब ऑपरेशन विजय का आरम्भ किया था ।