राम राम जय राजा राम
राम राम जय सीताराम.....
अपने पिता, अज से मिली विशाल और वैभवशाली विरासत को संभालते हुए महाबाहु दशरथ को अब वंश की चिंता तीक्ष्ण शूल की तरह चुभने लगी थी। गुरुजनों, मंत्रियों और कुलपुरोहित के परामर्श पर अश्वमेध यज्ञ के अनुष्ठान का निर्णय लिया गया। सरयू नदी के उत्तर तट पर यज्ञ भूमि के निर्माण का स्थान निर्धारित किया गया। ऋष्यश्रृंग ने अग्निदेव का आह्वान किया।यज्ञ कुंड में पड़ रही आहुति से अग्नि की लपटें तेज होती गई। यज्ञ के अंत मे पुत्रेष्ठि यज्ञ का अनुष्ठान सफलता पूर्वक सम्पन्न हुआ। यज्ञ कुंड से प्रजापत्य दिव्य पुरुष प्रकट हुए। राजा दशरथ के मनोरथ की पूर्ति होने के आशीर्वाद देने के बाद वे पुनः अंतर्ध्यान हो गए। सभी ऋषि मुनियों ने धर्म के जयजयकार के जयघोष किये।
समय का पहिया आगे घूमता गया। तिथि, पक्ष और मास बदले। आज अयोध्या के शाही वैद्य नीलांजना को राजमहल में तुरन्त ही उपस्थित होने का आदेश आया था। दक्षिण कौशल नरेश पुत्री कौशल्या का सौम्य और संयत स्वभाव आज व्याकुल हो रहा था। प्रसव पीड़ा ने उन्हें बैचेन कर रखा था। तेज कदमों से राजमहल की तरफ बढ़ते हुए नीलांजना अपने इष्टदेव भगवान परशुराम से रानी कौशल्या को पीड़ारहित पुत्र प्रसव की कामना करती जा रही थीं।
राज ज्योतिषी की गणना थी कि अगर बालक का जन्म मध्याहन से पूर्व होगा तो सृष्टि बच्चे की कृतियों को प्रलय के अंतिम वेला तक भी स्मृत करती रहेंगी परन्तु मध्याहन के बाद जन्म लेने वाले बालक को दुर्भाग्य का सामना करना पड़ेगा।
रानी कौशल्या भी प्रसव पीड़ा के दौरान भगवान परसुराम को स्मरण किये जा रही थी। प्रभु परसुराम.... राम .... राम....। अयोध्या पूरी के राजभवन में किलकारी गूंजीं। वर्षों से पुत्र रत्नों के प्राप्ति को प्रतीक्षारत अयोध्या भूप की प्रतीक्षा अब समाप्त हुई। पवन देव ने हर्षित भाव से मन्दिरों में टँगे घण्टियों को बजाना प्रारम्भ किया। आरती के दीये स्वतः जल उठे। बादलों की घनराशि समेटे हुए इंद्रदेव अयोध्या के वितान पर स्वयं उपस्थित हो गए। देव् लोक से देवता, गन्धर्व, यक्ष आसमान में खड़े होकर इस अलौकिक क्षण के लिए संयत भाव से खड़े थे।
नीलांजना ने बच्चे को कौशल्या के गोद मे रख दिया। रानी कौशल्या की वर्षों से सूखी गोद ऐसी भर गई जैसे वर्षों से सूखी पड़ी नदी को विपुल जलराशि की प्राप्ति हो गई हो। माता कौशल्या ने बालक को छाती से लगा स्नेह भरे हाँथों से प्रथम स्पर्श किया। माँ के प्रथम स्पर्श से किलकरियों की गूंज तीव्र हो गई। बालक ने माता कौशल्या के खुले लटों को अपनी मुट्ठी में पकड़ लिया। माता के नयन सजल हो गए, कौशल्या ने कहा राम.... प्रिय राम... । नीलांजना ने समय सूचक यन्त्र को उत्सुकता भरी दृष्टि से तत्काल देखा। यह समय मध्याहन का था। दासियाँ सोहर गाने लगीं:-
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