शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2021

वृंदावन की यात्रा..

पिछले दिनों ठाकुर जी की नगरी मथुरा/वृंदावन जाने की कामना फलीभूत हुई। मेरी वृंदावन की ये दूसरी यात्रा थी। दस साल पहले और अब के मथुरा/वृंदावन में बहुत कुछ बदलाव था। नई दुकाने, नए होटल, सड़कें और भक्तों की भीड़। सब कुछ बदली हुई थी। लेकिन जो नहीं बदला था वो वृंदावन की गलियों में बाँके बिहारी लाल और राधा रानी के प्रेम के उस दिब्य स्वरूप के होने की अनुभूति थी, जिसके स्मरण मात्र से चेतना के समस्त दिशाओं में प्रेम का प्रवाह होता रहता है। इस अमूर्त प्रेम और समर्पण के स्वरूप का आभास आज से दस साल पहले भी मुझे इसी स्वरूप में हुआ था जैसा उस दिन हो रहा था और शायद युगों-युगांतर तक यहाँ आने वाला हरेक व्यक्ति, राधा-कृष्ण के प्रेम के इस स्वरूप को अनुभूत करता रहेगा। 

कृष्ण प्रेमी हैं, कृष्ण प्रेम भी। कृष्ण भक्ति भी हैं, कृष्ण भक्त भी। कृष्ण मनहर हैं, कृष्ण मनस्वी भी।कृष्ण सृष्टा भी हैं, कृष्ण सृष्टि भी।
कृष्ण महापराक्रमी हैं लेकिन कृष्ण अपूर्व प्रेमी भी हैं। कृष्ण के निस्नात प्रेम को वृंदावन की वसुंधरा का कण-कण, राधा नाम जपते हुए इस प्रेम के सम्मान की व्यख्या करती रहती है। गली,चौराहे, चबूतरे,घड़ी-घण्टों,सत्संग स्थानों और आश्रमों से उठते ध्वनियों में राधा नाम के स्मरण की गूंज मात्र इसलिए गूंजती रहती है क्योंकि  राधा नाम में ही कृष्ण समाहित है।  

कृष्ण प्रेमी भी हैं, कृष्ण प्रेम भी। कृष्ण कृष्ण भी हैं, राधा भी....

हमारी वृंदावन की यात्रा इस अनुभूति से समाप्त हुई कि दुनियाँ में प्रेम बना रहे। राधा-कृष्ण लोगों के चेतना में प्रेम का संचार करते रहे। जय श्री कृष्ण...

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