किंवदंतीयाँ ऐसी है कि जब तक ईश्वर आपको अपने पास बुलाते नहीं है आप उनके दरबार में हाजरी नहीं लगा पाते हैं। पिछला पूरा साल कोरोना के भेंट चढ़ने के कारण साल भर से टलती आ रही हरिद्वार यात्रा का मुहूर्त तय किया गया और अन्ततः शनिवार की सुबह हमलोग पाप नाशनी माँ गंगा में डुबकी लगाने इस विश्वास से निकल पड़े थे कि दुनियाँ के पापों को धोने वाली माँ गंगा अपने निर्मल और पवित्र आँचल से हमलोगों के पापों को धोकर आशीर्वाद से सिक्त करेंगीं !
अपराह्न में हमलोग हरिद्वार पहुँच चुके थे। विशाल जलराशि को समेट कर शांत भाव से बहने वाली माँ गंगा अपने निर्मल और पवित्र स्वरूप में आंखों के सामने दृष्टिगोचर थी। घाटों में डुबकियां लगाते भक्तों द्वारा माँ गँगा की जयजयकार, मंदिरों के घण्टों से उठती हुई पवित्र प्रतिध्वनि और मंत्रोच्चार से हरकीपौडी का वातावरण हर और हरी के हरिद्वार में विराजने की स्वर्गीय अनुभूति प्रदान कर रहा था। (हरिद्वार में माँ गंगा का प्रवेश)
माँ गंगा के जल को आचमन और आँखों से लगाकर श्रद्धा अर्पित करते हुए हमने माँ गंगा में हमने डुबकी लगाया। कुछ डुबकि अपने नाम और बाकी की डुबकियां माता-पिता और परिवार वालों के नाम से। डुबकी लगाने के बाद महसूस ऐसा हुआ जैसे देह का आधा भार किसी ने कम कर दिया हो।
पूजा अर्चना और माता मनसा के दर्शन के बाद हमलोग घाट पर पुनः वापस आ चुके थे। संध्या आरती प्रारम्भ हो चुकी थी। दक्षिण दिशा में अस्त होते सूर्य की किरणें गंगा की लहरों को छू कर संध्या वंदन किये जा रही थीं। अब चारों दिशाओं से उठते वैदिक मंत्रों की प्रतिध्वनियों का ईश्वरीय सम्मोहन था। माँ के जय जयकार से गंगा आरती सम्पूर्ण हुई। सबने जयजयकारा लगाया। पपनाशनी माँ गंगे की जय-जय...
(गंगा आरती)
(माँ गंगा की सुंदरता)
हरकीपौडी से गंगा जल साथ लेकर माँ गंगा से यह विनती किया कि अगले बार फिर से अपने पास जल्दी ही बुलान, आगे की यात्रा ऋषिकेश की और बढ़ गई थी।
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