आज युद्ध से वानर सेना क्षत-विक्षत होकर शिविर में वापस लौटी थी। सुग्रीव, अंगद और लक्ष्मण रणक्षेत्र में रावण के अमोघ वाणों के प्रहार से मूर्छित हो कर गिर पड़े थे। राक्षसी शक्तियों का दर्प धर्मस्त वानरी सेना पर आज पुनः अट्ठहास कर रहा था जिसकी करकस ध्वनि वानर शिविरों तक स्पष्ट सुनाई पड़ रही थी। शिविर के मध्य भाग में स्थित एक शिला पर चिंता भाव में भगवान श्रीराम मौन बैठे थे। पीछे अनुज लक्ष्मण, सम्मुख बजरंगबली,जामवंत,सुग्रीव,अंगद और वानर वीरों का दल श्रीराम के चिंतित चेहरे को देखकर व्यग्र होता जा रहा था।
उम्र के थपेड़ों और अनुभव के रत्नों से परिपूर्ण स्थितप्रज्ञ विभीषण ने सभा के मौन को तोड़ते हुए श्रीराम को चिंतामुक्त होने का विनम्रतापूर्वक आग्रह करते हुए कहा की प्रलय को समेटे हुए आपके तूणीर में आज भी वही वाण शेष हैं जिनकी अमोघ शक्तियों से राक्षस कुल का समूल सर्वनाश तड़ित के द्रुत वेग से भी तीव्र गति से हो सकता है। आपके हाँथों में सुसज्जित ये वही कोदण्ड है जिसके टँकार मात्र से राक्षस सेनाओं में तुमुल कोलाहल मच जाता है। वीरों से भरे वानरदल,पवनपुत्र हनुमान, ब्रम्हा पुत्र जामवंत के होते हुए भी विजय के अंतिम क्षणों में यह कैसी चिंता, यह कैसा शोक!
श्रीराम शिला से उठे। अपने व्याकुल मौन को तोड़ते हुए विभीषण को एकटक देखते हुए कहा। मैं रावण के इस एक दिन के भीषण युद्ध को देखकर चिंतिंत नहीं हूँ राजन। मैंने आज युद्ध में रावण को अपनी दसभुज शक्तिबाहु से अशीर्वादित करते हुए माता शक्ति के दिब्य स्वरूप को भी देखा है। रावण भले ही कुकर्मी हो, कुसंगी हो, कुबुद्धि हो, कुलाचार विहीन हो लेकिन जब तक उसपर माता शक्ति की कृपादृष्टि पड़ती रहेगी यह युद्ध तब तक कैसे समाप्त हो सकता है भला! मेरी चिंता का यही मुख्य कारण है।
सब चुप बैठे रह गए। कुछ देर ठहर कर वृद्ध जामवंत ने सभा के मौन को तोड़ा। कहा महाराज अगर रावण जैसे अधर्मी की पूजा से माता शक्ति प्रशन्न हो कर उसे सर्वशक्तिसम्पन्न बना सकती हैं तो फिर आपको क्यों नहीं प्रभु? आप धर्मस्त हैं, माता शक्ति को आपकी पूजा निश्चित ही प्रतिफलित करनी पड़ेगी।आप के शक्ति पूजा के सम्पन्न होने तक वानर सेना अपने सम्पूर्ण शक्तियों में साथ राक्षसों से लड़ती रहेगी। पूरी सभा माता शक्ति के जयजयकार के जयघोष से अब आनन्दित थी।
श्रीराम ने अपने प्रिय हनुमान को अगले सुबह तक 108 नीलकमल लाने का आदेश दिया। अगली सुबह पूर्वगिरी में उदयाचल सूर्य के उदय के साथ ही राम की शक्ति पूजा प्रारम्भ हुई....
"राम की शक्ति पूजा में महाप्राण निराला "
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