12th फेल फ़िल्म में किरदार का वह हिस्सा उतना स्ट्रगलपूर्ण नहीं है जितना उसे दिखाया गया है। फ़िल्म में असली स्ट्रगलर तो अभिनेता का बड़ा भाई है जिसने अपने छोटे भाई के पढ़ाई के लिए, अपनी सम्पूर्ण ऊर्जा,अपनी सारी इच्छाओं को झोंक कर पूरे परिवार को संभाला। छोटे भाई की सफलता में स्वयं की सफलता को तलाशा। लेकिन फ़िल्म के डायरेक्टर ने उसके स्ट्रगल को पर्दे पर जगह ही नहीं दिया।
शुक्रवार, 29 मार्च 2024
अस्तित्व को लील जाने की उत्कट मनोरथ लिए हुए दैत्यों के अंतर्मन से भी अपने लिए आशीर्वाद प्राप्त कर लेना ही हनुमान हो जाना है।
अस्तित्व को लील जाने की उत्कट मनोरथ लिए हुए दैत्यों के अंतर्मन से भी अपने लिए आशीर्वाद प्राप्त कर लेना ही हनुमान हो जाना है।
बजरंगबली जब लंका, सिया सुधि लेने निकले तो सबसे पहले उनका सामना सुरसा नामक राक्षसी से हुआ जो हनुमान को निगलने को आतुर थीं। हनुमान जी ने विनती की। नहीं मानने पर उसके दिए गए शर्तों पर ही उसे पराजित किया और आशीर्वाद प्राप्त किया:-
"राम काजु सब करिहहु, तुम बल बुद्धि निधान।
आसिष देइ गई सो हरषि चलेउ हनुमान"
हनुमान जी आगे बढ़े। लंका प्रवेश करने के लिए अति सूक्ष्म रूप धारण करने पर भी उनका सामना लंकिनी नामक राक्षसी से हुआ। लंकिनी हनुमान जी के हाथों पराजित हुई और आशीर्वाद दिया:-
"प्रबिसि नगर कीजे सब काजा,हृदय राखि कोसलपुर राजा।"
सीता माता की सुधि लेने के लिए बजरंगबली जब पेड़ की छावं में बैठे तब तब त्रिजटा नामक राक्षसी ने हनुमान जी की प्रशंसा करते हुए यह कहा था कि आप चिंता मत कीजिये। मैंने सपने में देखा कि एक विशालकाय बन्दर आया है जो लंका को तहस नहस कर देगा:-
"सपनों बानर लंका जारी , जातुधान सेना सब मारी"
लंकापति रावण अपने अहंकार के वशीभूत बजरंगबली को अंग भंग कर वापस राम के पास भेजना चाहते थे और बजरंगबली के पूँछ को आग भी उसने इसी कारण लगाया था। लेकिन जब बजरंगबली ने सम्पूर्ण लंका को जला दिया तब रावण यह कहने पर विवस हुआ कि :-
"हम जो कहा यह कपि नहीं होई, बानर रूप धरें सुर कोई"
आपके आस पास भी तो कई हनुमान रहते हैं। जो बजरंगबली तो नहीं लेकिन उनके स्वभाव जैसे होते हैं। उन सभी बजरंगबली को प्रणाम 🙏🙏
मंगलवार, 24 अक्टूबर 2023
शुभ विजयादशमी
रावण यह जानता था कि वह अहंकारी है। उसे यह भी ज्ञात था कि अपने अंहकार के वशीभूत उसने अपने पिता को भी अपमानित किया था और सृष्टि के पंचदेवताओं को भी अपना शत्रु मानने लगा था।
रावण यह जानता था कि वह व्यभिचारी है। परस्त्रियों के प्रति उसकी मानसिकता कलुषित और दुर्भावनापूर्ण है। परन्तुं, अपने व्यभिचारी प्रविर्ती को संयमित करने के बजाय सर्वथा ही वह असहाय स्त्रियों पर आसुरी अट्टहास किया करता था और व्यभिचार के सम्मोहन में आकर ही उसने माता सीता का बलात अपहरण किया था।
रावण यह भी जानता था कि जिस हनुमान ने उसके पुत्र अक्षय कुमार का वध अशोक वाटिका में कर दिया है उसे बंदी बनाना उसके राक्षस सैनिकों के क्षमता के अधीन नहीं है। बावजूद इसके, अपने दंभ के वशीभूत होकर उसने हनुमान की पूँछ में आग लगवाई और सोने की लंका को भस्मीभूत होने दिया।
रावण यह भी जानता था कि अपने भाई विभीषण द्वारा किये जा रहे अनुरोध जिसमे युद्ध के पूर्व श्रीराम के शरणागत होने और सीता माता को सम्मानपूर्वक लौटाने का प्रस्ताव सर्वथा उचित था बावजूद इसके, प्रतिशोध की दुर्भावना के अधीन होकर रावण भगवान श्रीराम से युद्ध करने को उन्नमत्त था।
अतएव...
जब भी कोई रावण अंहकार के वशीभूत होकर अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने को उन्नमत्त होता है। अपने व्यभिचारी स्वभाव से दूसरों के प्रति कलुषित मानसिकता रखता है। भगवान के उपासक और उनके दूत को अनादर के भाव से उनकी पूँछ में आग लगाने को उन्ममत्त रहता है। अपने धर्मपरायण भाई द्वारा अच्छे सुझाव देने पर उसकी पीठ पर लात मारता है। तब-तब प्रकृति उसे रावण बनाकर उसके समूल कृतियों को भस्मीभूत कर देती है और समाज उसे केवल आततायी राक्षस के रूप में ही याद करने लगता है।
आप सबों को अधर्म पर धर्म के विजय की दशमी की शुभकामनाएं। जय जय श्री राम...
शनिवार, 22 जुलाई 2023
बटालिक युद्ध क्षेत्र- ग्यारवीं गोरखा राइफल्स - कर्नल ललित रॉय - कैप्टन मनोज पांडेय और खलुबाग टॉप...
कर्नल ललित रॉय ने अपने बाकी बचे साथियों को गिना। चार सौ जवानों की नफरी से शुरू हुए इस अभियान में अब केवल 60 जवान ही ऐसे बचे थे जिन्हें लेकर आगे बढ़ा जा सकता था। कर्नल रॉय ने इन्हें दो टुकड़ियों में बाँट कर 30 जवानों की एक टुकड़ी को लेफ्टिनेंट मनोज पाण्डेय के नेतृत्व में खलुबार टॉप पर बने पाकिस्तानी बंकरों को ध्वस्त करने के लिए बायीं तरफ से आगे बढ़ने का आदेश दिया और बाकी बचे 30 जावनों को लेकर दाहिनी और से बढ़ने का निर्णय लिया।
कैप्टन मनोज पांडेय की शौर्य कृतियों का स्वर्णिम इतिहास यहीं से शुरू होता है। पाकिस्तानियों की तरफ से आती हुई बर्स्ट फायर, स्प्लिन्टर्स की बौछारें और बारूदों के गुबारों से बेख़ौफ़ मनोज पांडेय की टीम पाकिस्तानियों के गर्दनों को दबोचने खलुबार टॉप की तरफ आगे बढ़ रही थी।
टीम के सभी सदस्यों के वाटर बोटल में भरे बर्फ के टुकड़े जिन्हें प्यास बुझाने के लिए रखा गया था अब तक खत्म हो चुका था। अब यहाँ आस-पास जो भी बर्फ था उनपर बारूदों की चादरें बिछी हुई थी जिनसे प्यास नहीं बुझाया जा सकता था। हालांकि मिशन के शुरुआत में ही उन्हें इन सब परिस्थितियों का आभास था,उनके लिए यह कोई नई बात नहीं थी।वे जानते थे कि उनमें से कई लौट कर वापस भी आना चाहते हैं परन्तु वो लोग इस बात से कभी विचलित नहीं थे कि ये सफर मुश्किलों भरा था। कैप्टन मनोज पांडेय ने अपनी डायरी में लिखा था:- "सम गोल्स आर सो वर्दी, ईट्स ग्लोरियस इवन टू फेल"।
शाम ढल चुकी थी। पश्चिमी आकाश में आज कोई यज्ञ कुंड भभक उठा था। कैप्टन मनोज पांडेय और उनके साथियों के शौर्य की समिधा उस यज्ञकुंड की अग्नि से पाकिस्तानी सैनिकों को भष्मीभूत करने को उतारू थीं। दुश्मनों का पहला बंकर सामने था। कैप्टन मनोज पांडेय ने ग्रेनेड के पिन को निकाल कर पाकिस्तानी बंकर की और हवा में उछाल दिया था। ग्रेनेड निर्दिष्ट जगह पर पहुंच कर अपना काम कर चुका था। यज्ञ कुंड भभक उठा था।
एक तरफ़ मनोज पांडेय की अतुलित बल गाथा, अपराजेय शौर्य और चमकती खुखरी के संत्रास से भयभीत पाकिस्तानी सैनिकों ने भारतीय बंकरों से भागना शुरू कर दिया वहीं दूसरी तरफ कर्नल ललित रॉय, चोटियों पर चढ़ते हुए पाकिस्तानी सैनिकों के अंधाधुंध आर्टलरी और गोलियों के झंझावात में फंस गए थे। रॉकेट लॉंचरों की आर्टलरी और एयर डिफेंस गनों की गोलियों की ताबड़तोड़ फायरिंग में आगे बढ़ते हुए टीम के वीर योद्धाओं की गिनती क्रमशः कम होते जा रही थी।
कर्नल लिलित रॉय ने टीम के बाँकी बचे साथियों को गिना। तीस लोगों से शुरू हुए अभियान में अब मात्र छः वीर योद्धा ही शेष थे जिन्हें लेकर आगे बढ़ा जा सकता था। पाकिस्तानी रेंजर्स अब तक कर्नल ललित रॉय के लोकेशन को ट्रेस कर चुके थे। कर्नल ललित रॉय ने अपने ऐमुनेशन पाउच के बाकी गोलियों को गिना। टीम के पास मुश्किल से दस मिनट तक की लड़ाई के लिए ही गोलियां शेष थी।
कर्नल ललित रॉय ने ऐमुनेशन पाउच से दो गोली निकाल कर उसे अपने पिस्टल में लोड कर लिया। रॉय आगे कहते हैं, उन्हें किसी भी हालात में पाकिस्तानीयों के हाँथों जिंदा नहीं पकड़ाना था। युद्ध क्षेत्र में विपरीत परिस्थितियों के दौरान अपने लिए अंतिम गोली भी संचित करने वाला धनवान की श्रेणी में आता है......
सोमवार, 17 जुलाई 2023
जोकोविच की हार ...
याद है ना आपको 2019 का विम्बलडन ? विम्बल्डन के इतिहास में सबसे लम्बे, 4 घंटे 57 मिनट तक चले इस मुकाबले में डिफेंडिंग चैम्पियन जोकोविच ने फेडरर को हरा कर सेंटर कोर्ट पर अपना वर्चस्व जारी रखा था. फेडरर ने इस मुकाबले को जितने के लिए अपना सब कुछ झोंक दिया, बावजूद इसके जोकोविच के सामने वे टिक नहीं पाए थे. लेकिन इतिहास की हमेशा पुनरावृति हो ऐसा जरूरी तो नहीं !.
कल का मुकाबला भी लगभग 4 घंटे 50 मिनट तक चला. 2019 वाले से मात्र 7 मिनट ही कम. लेकिन इस मुकाबले में जोकोविच अक्सर संघर्ष करते नजर आये. पहले सेट्स को हारने के बाद दुसरे सेट्स में अल्क्राज ने जब धमक के साथ वापसी किया, जित का खाका उसी सेट में निर्धारित हो गया. ऐसा नहीं था की जोकोविच यह नहीं जान रहे थे. उन्होंने लय में आते हुए अल्क्राज के ध्यान को तोड़ने के लिए छद्म का भी सहारा लिया और 7 मिनट के लम्बे समय के लिए बाथरूम ब्रेक तक ले डाला. लेकिन अल्क्राज को जैसे इन सब बातों से कोई सरोकार ही नहीं था. वे तो आज जितने के लिए ही कोर्ट में उतरे थे. एकाग्र और स्थिरचित्त होकर.
जोकोविच ने टेनिस के दीर्घ अनुभवों से अर्जित अपने सभी तिलिस्मी शॉट्स को अल्क्राज के विरुद्ध प्रयोग किया लेकिन अल्क्राज के खेल कौशल के सामने वो सब निष्फल होते रहे. जोकोविच के फोरहैंड और बैकहैण्ड शॉट्स का तिलिस्म टूटता रहा और वे अधीर होकर उग्र होते गए. खेल के अंतिम दौर में पहुंचते-पहुंचते जोकोविच की उग्रता उस सीमा तक पहुंच गई कि वे फिर से मैदान पर रेकेट पटकते हुए नजर आने लगे.
अपने उम्र जितने लम्बे टेनिस करियर और पहाड़ जैसे अनुभवों को समेटे जोकोविच के सामने युवा अल्क्राज की विलक्ष्ण प्रतिभा का दीप्त चमकता रहा और जोकोविच जैसे धूमिल होते रहे. 2002 से चार लोगों के इर्द-गिर्द (फेडरर, नडाल, जोकोविच और एंड्री मरे) घूमते हुए विम्बलडन को नया-नवेला और युवा चैम्पियन मिला. जो प्रतिभा का विलक्ष्ण भी है और संयमित भी.
अमूमन खेल के अंतिम समय तक हार नहीं मानने वाले जोकोविच “प्राइज डिस्ट्रीब्यूशन सिरोमनि” तक पहुंचते-पहुंचते भावुक हो गए. अपने बेटे को देखकर फफकते हुए जोकोविच ने यह माना की आज का दिन उनके लिए अच्छा नहीं रहा लेकिन अगले ही क्षण उन्होंने अल्क्राज के खेल और उनके टीम के एफर्ट्स की प्रशंसा करते हुए यह साबित किया की बेशक खेल के दौरान उनमे प्रतिद्वंदियों के लिए सम्मान की कोई जगह नहीं रहती है लेकिन कोर्ट के बाहर वो एक बेहतरीन इन्सान हैं ........
मंगलवार, 31 जनवरी 2023
रामचरितमानस
हमारे शहर में एक मंदिर है "पंच मंदिर" वहाँ नए साल के शुरुआत होने के पूर्व संध्या पर अखण्ड मानस पाठ का आयोजन होता है। यह प्रथा कई सालों से चली आ रही है। लोग गृह प्रवेश के दौरान अखण्ड मानस पाठ का आयोजन करवाते हैं। किसी अभीष्ट कामना की पूर्ति होने पर,कार्तिक उद्यापन के मौके पर भी मानस के अखण्ड पाठ का आयोजन होता रहता है।
इस अखण्ड मानस पाठ की सबसे मोहक बात यह रहती कि इसमें बिना जाती-बिना भेद के लोग सम्मिलित होते। बड़े भी, बच्चे भी और बूढ़े भी।जिन्हें ढोल बजाना आता वो ढोल, जिन्हें झाल बजाना आता वो झाल और जिन्हें मानस की पंक्तियाँ याद रहती वो माइक को संभालते हैं और रात भर मानस के रामधुन का अखण्ड पाठ चलता रहता।
दादा जी कहते थे किसी घर का संस्कार इस बात से भी परिलक्षित होता है की उसके बुजुर्गों ने रामचरित मानस की प्रतियाँ अपने बच्चों के लिए रखा है या नहीं।
शनिवार, 21 जनवरी 2023
मिठाइयाँ ना हो तो जीवन फीका-फीका सा है। है ना....
घर से बाहर रहने वाला आदमी जब वापस घर छोड़ शहर को आता है तो घर वाले थोड़ी मिठाई या पकवान साथ भेज देते हैं। ऐसा नहीं है कि भेजी जाने वाली मिठाई कई सप्ताह या महीनों तक खाने योग्य बची रहती हैं या ऐसा भी नहीं है कि उस तरह की मिठाईयां वहाँ उपलब्ध ना रहती हों। बावजूद इसके आप जब भी घर से बाहर निकलते हैं आपके झोले में आपके साथ अपने शहर की मिठाई जरूर साथ निकलती हैं।
दरअसल हमारे संस्कारों में मिठाइयाँ अपनेपन और प्रेम के वाहक हैं।उत्सव- त्योहारों में मिठाई ना बना हो तो सब फीका-फीका सा होता है।मिठाइयाँ खुशियाँ के संचार का माध्यम भी हैं। जितनी बड़ी खुशी, मिठाइयों की मात्रा भी उतनी अधिक।भोज-आयोजन में तो मिठाइयाँ आयोजकों के रसूख तक को प्रतिनिधित्व करती रहती हैं।
लेकिन मिठाइयाँ प्रेम की वाहक भी होती हैं। विदा होते बेटी को जब पिता लड्डू के टोकरियों के साथ विदा करता है तो वो मिठाइयाँ उस पिता के करुणारूपी प्रेम की वाहक होती हैं, जिसके चले जाने पर एक पिता अपने ही घर में स्वयं को अकेला महसूस करता रहता है। एक भक्त जब अपने भगवान को मिठाइयाँ चढाता है तब वो मिठाइयाँ उस अटूट प्रेम की वाहक होती हैं, जिस प्रेम के वशीभूत एक भक्त पत्थर के शिला में भी अपना भगवान ढूंढ लेता है। वही मिठाई जब एक माता-पिता प्रसाद के रूप में अपने बच्चों के बीच बांटता है तब वो प्रेमाशिक्त आशीर्वाद बन कर सभी विघ्नों को दूर करता रहता है।
मिठाइयाँ ना हो तो जीवन फीका-फीका सा है। है ना....
रविवार, 15 जनवरी 2023
सेना दिवस...
देश के पश्चिम से लेकर नैत्रेय कौण तक, दक्षिण से लेकर अग्नि कौण तक और अग्नि कौण से बंगाल की खाड़ी तक फैले हुए विशाल सागरीय तट की सीमा हो। वायव्य कौण में फैला हुआ दग्ध रेगिस्तान हो या शितलहरों को समेटे हुए उत्तर में अवस्थित हिमालय की अगम्य बर्फीली चोटियाँ हो, हमारी शस्य श्यामला धरती की सम्प्रभुता को अक्षुण्य रखने हेतु भारतीय सेना अपने प्राणों को बलिदान करने के लिए सर्वदा आतुर रहती है।
विश्व युद्ध इतिहास का हर पन्ना साक्षी है की विश्व की सबसे बड़ी स्वेक्षिक सेना कहलाने वाली भारतीय सेना अपने अतुलित साहस औऱ निपुण युद्धकौशल के कारण युद्धभूमियों में विजयश्री के उतुंग ध्वज को गाड़ते आये हैं। इनके अतुलित साहस की गाथा तब भी गाई जाती है जब अंग्रेजों ने प्रथम विश्वयुद्ध में अपनी अस्मिता इन्हीं सेनिको के पराक्रम से बचा पाया था।
इस देश मे सेनाओं का इतिहास अत्यंत ही प्राचीन है। रामायण से लेकर महाभारत काल तक,मौर्य से लेकर गुप्त काल तक, चोल से लेकर चालुक्य के होते हुए वर्तमान की भारतीय सेनाओं के अतुलित साहस के सम्मुख आक्रांताओं ने अपने साहस का परित्याग कर पराजय को ही वरण किया है। बावजूद इसके, भारतीय सेना ने किसी पर अपना बलात आधिपत्य को प्राप्त नहीं किया। फिर चाहे 71 के युद्ध मे अस्सी हजार सैनिकों के साथ जेनरल नियाजी द्वारा समर्पण की ही बात हो, कारगिल में मृत पड़े पाकिस्तानी सैनिकों की लाशों की सम्मानपूर्वक विदाई हो या गलवान घाटी में चीनी सैनिकों की लाशों की बात हो। सैनिकों के सम्मान का स्प्रिट भारतीय सेना का गहना हमेशा रहा है।
अपनी सम्प्रभुता की रक्षा के लिए विश्व की सबसे ऊंची सीमा रेखा पर तैनात होने वाली भारतीय सेना को विश्व शांति के लिए जब भी आह्वान किया गया भारतीय सेना ने अपनी पूर्ण निष्ठा से कर्तव्यों का निर्वहन किया भले ही इसमें प्राणो की आहुति ही क्यों ना देनी पड़ी।
संख्या बल में तीसरी और साहस में विश्व की सबसे बड़ी सेना के पराक्रम से वशीभूत होकर इजरायल अक्सरहाँ यह कहता रहता है की भारतीय सेना के पराक्रम से विश्वविजय प्राप्त किया जा सकता है।सेना अपने देश के परिवार का बरगद होता है जिसके गहरे छाँव के निचे सम्पूर्ण देश की जनता आशंका मुक्त रहती हैं।
सभी को सेना दिवस की ढेरों शुभकामनाएं।
दही-चूड़ा (हास्य)
मधुमेह के प्रसार से पहले, मैथिलों के दैनिक भोजन और विशेष आयोजनों में दही-चूड़ा अपना यथेष्ट जगह छेंक आकषर्ण के केंद्र में बना रहता था। लेकिन दही-चूड़ा के साथ समस्या यह रहता है की ज्यादा खा लेने के बाद यह अपच की समस्या उत्पन्न करता है। विशेषकर उनलोगों को जिन्हें इसके खाने की आदत कम होती है।
बात दोस्त के बारात की है (दोस्त इसलिए क्योंकि नाम नहीं लिख सकते)। रात्रि भोज में दही-चूड़ा का प्रबंध था। दही स्वादिष्ट थी तो दोस्त ने अपने पेट के सामर्थ्य से कहीं ज्यादा दही गटक लिया। इस कारण वह पंक्ति में बैठे भोजनभट्ट लोगों के नजरों में सम्मान का पात्र बन गया था और उनके द्वारा किये जा रहे प्रशंशा के वशीभूत उसने एक-आध किलो दही को और उदरस्थ कर लिया। उसका पेट हाँथ जोड़ कर उसे दही खाने से मना करता रहा लेकिन उसके दही गटकने की रफ्तार कम ना हुई। अन्ततः जब उसका पेट फटने को आया तो उसने खाना बन्द किया।
भोज का आयोजन समाप्त हुआ तो लोग जनवासे की और लौटे। वह दोस्त भी जनवासे की और लौटना चाह रहा था लेकिन उसके पेट मे हिलता-डुलता दही उसे जनवासे के बजाय, तालाब की और ले जाना चाह रहा था। वह इस कशमकश में दस मिनट तक वहीं रुका और अंततः परिस्थितियों के सम्मुख आत्मसमर्पण कर तालाब के रास्ते की और चल पड़ा।
गाँव में महिलाएं (बीते समय की बात है) प्रातः काल मे ही सरोवर चली जाती थीं उस समय पुरुष तालाब की और नहीं जाते थे। अब महाशय भद्र पुरुष तो थे लेकिन दबाव भी तो कोई चीज होती है। कहते हैं दबाव बाघ के भय से भी भयभीत नहीं होता है फिर तो ये महज उस सज्जन के भद्रता की ही बात मात्र थी। लेकिन सज्जन भद्र थे तो अंततः उसने तालाब से दूर झाड़ियों के शरणागत होकर अपना शरण वहीं लिया और देर सुबह होने तक वहीं बैठे रहे। तब तक, जब तक की गाँव के अन्य पुरुष तालाब की और आते ना दिखाई पड़ने लगे।
अन्ततः दोस्त जब निवृत होकर गमछे में ही वापस लौटे तब यह पता चला कि बारात तो वापस लौट चुकी है। थोड़ी देर तक वो वहीं रुके और अंततः गमछे में ही वापस गाँव लौटने का निर्णय लिया। बस में कोई पहचानने वाला उनसे मिले तो उन्होंने सफाई में कहा कि रास्ते मे पैर फिसल गया था तो पेंट गन्दी हो गई, उसे वहीं फेंकना पड़ा।
लेकिन घर जब लौटे तब दही के स्वाद के बारे में बखान करते नही थकते थे....
बुधवार, 11 जनवरी 2023
गोप अष्टमी...
आज गोप दीक्षा का दिन था। वो दीक्षा जिस अनुष्ठान के पूर्ण होने के बाद ग्वाले गायों को गोकुल के बाहर ले जाकर कर चराने के अधिकारी बनते थे। मधुर वैदिक मंत्रों के साथ गोप दीक्षा प्रारंभ हुई। नंद बाबा अपने वक्ष पर झूलते हुए सोने के अष्टकोणीय पदकनुमा छल्ले को उतारकर कृष्ण के गले मे झूला दिया।उन्होंने अपनी आँखें बंद की और कुछ बुदबुदाए। फिर कृष्ण से कहा,"कृष्ण आज से तुम विधियुक्त गोप बन गए हो"। आज तक मैंने अपने सामर्थ्य के अनुरूप यहाँ सभी छोटे-बड़े गोपालों को संभाला है आज से यह कर्तब्य तुम्हारा है। गोप दीक्षा सम्पन्न हुई।गायें यमुना की गोचर भूमि की और निकल पड़ी।
सांझ होने को थी। पक्षिम दिशा में आरक्त सूर्य बिम्ब धीरे-धीरे यमुना के पाट से मिलने लगा था। गायें रम्भाते हुए गोकुल की तरफ देखने लगी थीं। कृष्ण ने बलराम से कहा। भैया,आज मेरे गोप जीवन का आरम्भ है आज महादेव का दुग्धाभिषेक किया जाए। बलराम और बाकी गोप सखाओं ने भी अपनी सहमति देते हुए कहा। अवश्य!
शुभ्र- धवल पुष्पों और त्रिदल बिल्वपत्रों को गोचारण भूमि के पास ही अवस्थित अरण्यों से तोड़कर गया। गोकुल लौटती गायें को रोककर गोपालों ने गो-दोहन किया। उष्ण दुग्ध को लोटे में भरा गया। यमुना तट की रेतीली भूमि के एक स्वच्छ स्थल को चुनकर महीन रेत से सुंदर शिव पिंडी बनाई गई। बलराम ने धीमे हाँथों से पिंडी के मध्य भाग में त्रिपुंड बनाया। बगल में ही नन्दी महाराज की आकृति स्वरूप एक और पिंडी बनाई गई। पक्षिम में अस्त होते सूर्य को साक्ष्य रखकर श्रीकृष्ण ने आँखें बंद कर महादेव का स्मरण किया :-
"ध्यायेन्नित्यं महेशं रजतगिरिनिभं चारुचन्द्रावतंसं
रत्नाकल्पोज्जवलाड़्गं परशुमृगवराभीतिहस्तं प्रसन्नम्।।
बलराम और सभी गोपों ने हाँथ जोड़ कर, एक साथ कंठनाल फुलाकर हर हर महादेव का जयघोष किया। दुग्धाभिषेक सम्पन्न हुआ। सभी गोप गोकुल की और अब लौटने लगे। गोकुल के गोपाल के गोप बनने का यह पहला दिन था।
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