घर से बाहर रहने वाला आदमी जब वापस घर छोड़ शहर को आता है तो घर वाले थोड़ी मिठाई या पकवान साथ भेज देते हैं। ऐसा नहीं है कि भेजी जाने वाली मिठाई कई सप्ताह या महीनों तक खाने योग्य बची रहती हैं या ऐसा भी नहीं है कि उस तरह की मिठाईयां वहाँ उपलब्ध ना रहती हों। बावजूद इसके आप जब भी घर से बाहर निकलते हैं आपके झोले में आपके साथ अपने शहर की मिठाई जरूर साथ निकलती हैं।
दरअसल हमारे संस्कारों में मिठाइयाँ अपनेपन और प्रेम के वाहक हैं।उत्सव- त्योहारों में मिठाई ना बना हो तो सब फीका-फीका सा होता है।मिठाइयाँ खुशियाँ के संचार का माध्यम भी हैं। जितनी बड़ी खुशी, मिठाइयों की मात्रा भी उतनी अधिक।भोज-आयोजन में तो मिठाइयाँ आयोजकों के रसूख तक को प्रतिनिधित्व करती रहती हैं।
लेकिन मिठाइयाँ प्रेम की वाहक भी होती हैं। विदा होते बेटी को जब पिता लड्डू के टोकरियों के साथ विदा करता है तो वो मिठाइयाँ उस पिता के करुणारूपी प्रेम की वाहक होती हैं, जिसके चले जाने पर एक पिता अपने ही घर में स्वयं को अकेला महसूस करता रहता है। एक भक्त जब अपने भगवान को मिठाइयाँ चढाता है तब वो मिठाइयाँ उस अटूट प्रेम की वाहक होती हैं, जिस प्रेम के वशीभूत एक भक्त पत्थर के शिला में भी अपना भगवान ढूंढ लेता है। वही मिठाई जब एक माता-पिता प्रसाद के रूप में अपने बच्चों के बीच बांटता है तब वो प्रेमाशिक्त आशीर्वाद बन कर सभी विघ्नों को दूर करता रहता है।
मिठाइयाँ ना हो तो जीवन फीका-फीका सा है। है ना....
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