रविवार, 15 जनवरी 2023

दही-चूड़ा (हास्य)

मधुमेह के प्रसार से पहले, मैथिलों के दैनिक भोजन और विशेष आयोजनों में दही-चूड़ा अपना यथेष्ट जगह छेंक आकषर्ण के केंद्र में बना रहता था। लेकिन दही-चूड़ा के साथ समस्या यह रहता है की ज्यादा खा लेने के बाद यह अपच की समस्या उत्पन्न करता है। विशेषकर उनलोगों को जिन्हें इसके खाने की आदत कम होती है। 

बात दोस्त के बारात की है (दोस्त इसलिए क्योंकि नाम नहीं लिख सकते)। रात्रि भोज में दही-चूड़ा का प्रबंध था। दही स्वादिष्ट थी तो दोस्त ने अपने पेट के सामर्थ्य से कहीं ज्यादा दही गटक लिया। इस कारण वह पंक्ति में बैठे भोजनभट्ट लोगों के नजरों में सम्मान का पात्र बन गया था और उनके द्वारा किये जा रहे प्रशंशा के वशीभूत उसने एक-आध किलो दही को और उदरस्थ कर लिया। उसका पेट हाँथ जोड़ कर उसे दही खाने से मना करता रहा लेकिन उसके दही गटकने की रफ्तार कम ना हुई। अन्ततः जब उसका पेट फटने को आया तो उसने खाना बन्द किया।

भोज का आयोजन समाप्त हुआ तो लोग जनवासे की और लौटे। वह दोस्त भी जनवासे की और लौटना चाह रहा था लेकिन उसके पेट मे हिलता-डुलता दही उसे जनवासे के बजाय, तालाब की और ले जाना चाह रहा था। वह इस कशमकश में दस मिनट तक वहीं रुका और अंततः  परिस्थितियों के सम्मुख आत्मसमर्पण कर तालाब के रास्ते की और चल पड़ा।  

गाँव में महिलाएं (बीते समय की बात है) प्रातः काल मे ही सरोवर चली जाती थीं उस समय पुरुष तालाब की और नहीं जाते थे। अब महाशय भद्र पुरुष तो थे लेकिन दबाव भी तो कोई चीज होती है। कहते हैं दबाव बाघ के भय से भी भयभीत नहीं होता है फिर तो ये महज उस सज्जन के भद्रता की ही बात मात्र थी। लेकिन सज्जन भद्र थे तो अंततः उसने तालाब से दूर  झाड़ियों के शरणागत होकर अपना शरण वहीं लिया और देर सुबह होने तक वहीं बैठे रहे। तब तक, जब तक की गाँव के अन्य पुरुष तालाब की और आते ना दिखाई पड़ने लगे। 

अन्ततः दोस्त जब निवृत होकर गमछे में ही वापस लौटे तब यह पता चला कि बारात तो वापस लौट चुकी है। थोड़ी देर तक वो वहीं रुके और अंततः गमछे में ही वापस गाँव लौटने का निर्णय लिया। बस में कोई पहचानने वाला उनसे मिले तो उन्होंने सफाई में कहा कि रास्ते मे पैर फिसल गया था तो पेंट गन्दी हो गई, उसे वहीं फेंकना पड़ा। 

लेकिन घर जब लौटे तब दही के स्वाद के बारे में बखान करते नही थकते थे....

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