मंगलवार, 31 जनवरी 2023

रामचरितमानस

हमारे शहर में एक मंदिर है "पंच मंदिर" वहाँ नए साल के शुरुआत होने के पूर्व संध्या पर अखण्ड मानस पाठ का आयोजन होता है। यह प्रथा कई सालों से चली आ रही है। लोग गृह प्रवेश के दौरान अखण्ड मानस पाठ का आयोजन करवाते हैं। किसी अभीष्ट कामना की पूर्ति होने पर,कार्तिक उद्यापन के मौके पर भी मानस के अखण्ड पाठ का आयोजन होता रहता है।

इस अखण्ड मानस पाठ की सबसे मोहक बात यह रहती कि इसमें बिना जाती-बिना भेद के लोग सम्मिलित होते। बड़े भी, बच्चे भी और बूढ़े भी।जिन्हें ढोल बजाना आता वो ढोल, जिन्हें झाल बजाना आता वो झाल और जिन्हें मानस की पंक्तियाँ याद रहती वो माइक को संभालते हैं और रात भर मानस के रामधुन का अखण्ड पाठ चलता रहता।  

दादा जी कहते थे किसी घर का संस्कार इस बात से भी परिलक्षित होता है की उसके बुजुर्गों ने रामचरित मानस की प्रतियाँ अपने बच्चों के लिए रखा है या नहीं। 

इन तमाम बातों को जब मिलाता हूँ तो यह समझ नहीं पाता हूँ की जिस देश के आमजनों के चेतना और संस्कारों का ताना-बाना मानस जैसे ग्रन्थों से बुना गया हो उसकी प्रतियों को राजनीतिक दुर्भावना के वशीभूत होकर सामुहिक रूप से फाड़ने वालों को सजा का प्रावधान क्यों ना हो...

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