आज गोप दीक्षा का दिन था। वो दीक्षा जिस अनुष्ठान के पूर्ण होने के बाद ग्वाले गायों को गोकुल के बाहर ले जाकर कर चराने के अधिकारी बनते थे। मधुर वैदिक मंत्रों के साथ गोप दीक्षा प्रारंभ हुई। नंद बाबा अपने वक्ष पर झूलते हुए सोने के अष्टकोणीय पदकनुमा छल्ले को उतारकर कृष्ण के गले मे झूला दिया।उन्होंने अपनी आँखें बंद की और कुछ बुदबुदाए। फिर कृष्ण से कहा,"कृष्ण आज से तुम विधियुक्त गोप बन गए हो"। आज तक मैंने अपने सामर्थ्य के अनुरूप यहाँ सभी छोटे-बड़े गोपालों को संभाला है आज से यह कर्तब्य तुम्हारा है। गोप दीक्षा सम्पन्न हुई।गायें यमुना की गोचर भूमि की और निकल पड़ी।
सांझ होने को थी। पक्षिम दिशा में आरक्त सूर्य बिम्ब धीरे-धीरे यमुना के पाट से मिलने लगा था। गायें रम्भाते हुए गोकुल की तरफ देखने लगी थीं। कृष्ण ने बलराम से कहा। भैया,आज मेरे गोप जीवन का आरम्भ है आज महादेव का दुग्धाभिषेक किया जाए। बलराम और बाकी गोप सखाओं ने भी अपनी सहमति देते हुए कहा। अवश्य!
शुभ्र- धवल पुष्पों और त्रिदल बिल्वपत्रों को गोचारण भूमि के पास ही अवस्थित अरण्यों से तोड़कर गया। गोकुल लौटती गायें को रोककर गोपालों ने गो-दोहन किया। उष्ण दुग्ध को लोटे में भरा गया। यमुना तट की रेतीली भूमि के एक स्वच्छ स्थल को चुनकर महीन रेत से सुंदर शिव पिंडी बनाई गई। बलराम ने धीमे हाँथों से पिंडी के मध्य भाग में त्रिपुंड बनाया। बगल में ही नन्दी महाराज की आकृति स्वरूप एक और पिंडी बनाई गई। पक्षिम में अस्त होते सूर्य को साक्ष्य रखकर श्रीकृष्ण ने आँखें बंद कर महादेव का स्मरण किया :-
"ध्यायेन्नित्यं महेशं रजतगिरिनिभं चारुचन्द्रावतंसं
रत्नाकल्पोज्जवलाड़्गं परशुमृगवराभीतिहस्तं प्रसन्नम्।।
बलराम और सभी गोपों ने हाँथ जोड़ कर, एक साथ कंठनाल फुलाकर हर हर महादेव का जयघोष किया। दुग्धाभिषेक सम्पन्न हुआ। सभी गोप गोकुल की और अब लौटने लगे। गोकुल के गोपाल के गोप बनने का यह पहला दिन था।
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