मंगलवार, 12 मई 2020

कभी लिखा गया था।

ताली, थाली, घंटी और परम्परा ...

कोरोना के आक्रांत से लड़ते हुए योद्धाओं के लिए, कल पाँच मिनट तक करतल और नाद के आह्वान पर ऐसा घमासान मचा हुआ है कि लोग कल से ही छाती पीट रहे हैं । 

विरोध की ऐसी दुर्भावना की प्राणों तक का मोल नहीं ! घृणा की ऐसी आग की बुद्धिहीन पशु बनने पर आमादा ! ऐसी कुंठा क्यों ? 

साहस और विवेक के सामंजस्य से जंगें जीती गई हैं और आगे भी ऐसा होता रहेगा । 

जब साहस को डर लगता है तब तालियों के करतल नाद से, उस उपजे भय पर विजय प्राप्त किया जाता है । तालियाँ इसलिए बजाई जाती हैं कि मैदान में जो उतरा है उसका साहस बना रहे । 

शहरीकरण के दौड़ में हमारी परम्पराएं हाँफ कर पीछे छूटती गई हैं । जन्म पर थाली बजाने की परंपरा भी उन्हीं में से एक है । 

गर्भस्त महिला के घर मे थाली बजने का संकेत इस बात का प्रमाण था कि नवजात शिशु का जन्म हुआ है । 

ऐसी मान्यता है की नवजात के जन्म पर थाली बजाने से वह नवजात शिशु निडर, बलवान, साहसी और हर समय सजग रहने वाला होता है । कानों में थाली बजाने से नवाजात का प्रसुप्त दिमाग जाग उठता है और वह रोने लगता है।   

घंटी से निकले नाद और उससे उत्पन्न होने वाले झंकारों के वैज्ञानिक प्रभावों को लिखने की क्या ही आवश्यकता है । 

ख़ैर ! अगर परम्पराओं और मान्यताओं को सिरे से नकार भी लिया जाए और इस आह्वान को सांकेतिक ही मान लिया जाय तो क्या :- 

इस माहमारी से लड़ते हमारे चिकित्सक, चिकित्सक सहयोगी, पुलिस, प्रशासन, सफाई कर्मी द्वारा समर्पण भाव से दिनरात की सेवा के बदले हमलोग पाँच मिनट तक करतल ध्वनियों से उनका हौसला नहीं बढ़ा सकते है ?

सोचियेगा जरा ....

सचिन-२

सचिन-२

एको अहं, द्वितीयो नास्ति, न भूतो न भविष्यति ....

सचिन यूँ ही नहीं महान हैं । सचिन जैसा ना पहले कोई था, ना दूसरा कोई होगा । सर्वाधिक एकदिवसीय और टेस्ट शतक । सर्वाधिक एकदिवसीय और टेस्ट रन। अंतरराष्ट्रीय मैच में तीस हज़ार से ज्यादा रन । पहला एकदिवसीय दोहरा शतक । शतकों का शतक । एकदिवसीय क्रिकेट में सर्वाधिक बार मैन ऑफ द मैच।  सर्वाधिक विश्वकप शतक । 200 अंतरास्ट्रीय टेस्ट और 463 एकदिवसीय मैच खेलने के विशाल रिकॉर्ड के साथ सचिन अपराजेय लगते हैं ।
(कुछ छूट गया हो तो आपलोग जोड़ लीजियेगा)

ऊपर के आंकड़ों में 90-99 रनों के बीच 28 बार आउट होने और 80-89 रनों के बीच 30 बार आउट होने को सचिन अगर शतक में तब्दील कर, जोड़ पाते तो रिकॉर्ड क्या होता इसे कहने की क्या ही जरूरत है।
(गेंदबाज़ी कैरियर को अभी छोड़ देते हैं)

ख़ैर ! ऊपर के आँकड़े ये बताने के लिए पर्याप्त हैं कि सचिन केवल क्रिकेट खेलने नहीं आए थे । उन्होंने क्रिकेट के हर स्वरूप को रचा है। जिसमें विलक्षण शॉट्स हैं । मर्यादित खेल भावना है । समर्पित संयम है और धीर-भीर और गम्भीर स्वभाव है । 

क्रिकेट के 24 साल के लंबे कैरियर के दौरान मैदान पर ऐसी घटनाएं विरले ही देखने को मिलती थी जब सचिन विचलित होकर खेल मर्यादा को लाँघ रहे होते थे। 

ऑस्ट्रेलिया, साउथ अफ़्रीका, वेस्टइंडीज और पाकिस्तान के दुर्धस गेंदबाजों के गलीच टिप्पणियों का प्रतिउत्तर सचीन ने हमेशा अपने बल्ले से ही दिया था और यह सिद्ध किया था कि वो यहाँ गालियाँ सुनने के लिए नहीं, पूजे जाने के लिए आया है ।

सचिन ने कई यादगार पारियाँ खेली हैं । हरेक प्रशंसक की अपनी सूची भी है । लेकिन सचिन की एक पारी सभी प्रशंसको की सूची में आज भी ऊपरी पायदान पर विराजती है ।  जब एक फूहड़/मूढ़ पाकिस्तानी गेंदबाज, अपने सर्वश्रेष्ठ होने के स्तम्भित दम्भ और सचिन को नवसिखुवा होने के पूर्वाभास में, यह चुनोती दे देता है कि "तुम मेरे गेंद को छू कर तो दिखाओ" और अगले ही क्षण उसके फूहड़पन और मूढ़मति का प्रतिउत्तर सचिन के दनदनाते शॉट्स देते हैं, फलस्वरूप दर्शकदीर्घा में जो खुशियों की कोलाहल आती है उसका स्मरण भी मंत्रमोहित करता रहता है । 

दुनियाँ के सर्वश्रेष्ठ गेंदबाजों ने जहाँ सचिन का लोहा सहर्ष मानना स्वीकार किया था वहीं पाकिस्तानी चिरकुट गेंदबाज जिन्हें अपने गेंदबाजी पर विश्वास कम और अंहकार ज्यादा था, की कुटाई भी सचिन के बल्ले ने मुक्त हाथों से किया था । चिरकुट इसलिए क्योंकि उनके क्रिकेट में खेल भावना कम और पाकिस्तानी बनकर भारत फ़तह करने की मंशा मुखर होकर दिखाई पड़ती थी । 

सचिन के प्रशंसकों की एक लंबी विश्वव्यापी फेरहिस्त है । भारत में उनके नाम के मंदिर हैं । सम्मान की एक लंबी कतार है और हम जैसे प्रशंसकों का विशाल जनसमूह जिनके लिए क्रिकेट की परिभाषा सचिन से होकर शुरू होता है । 

खैर! कुछ आलोचक भी हैं जिन्हें गाहे बगाहे ये लगता है कि सचिन ने क्रिकेट में निजस्वार्थ को पहले ढूंढा है । उनको बस इतना कहना है कि सचिन ने क्रिकेट को एक लंबे कालखण्ड तक अपने जीवन के बहुमुल्य क्षणों को समर्पित किया है । हो सकता है इस दौरान कुछ ऐसी परियाँ खेली गई हों जिन्हें आलोचकों को पसंद ना आया हो । वैसे एक सवाल तो उनके लिए भी है कि अगर सचिन ने क्रिकेट में निजस्वार्थ को पहले ढूंढा तो बाकि क्या कर रहे हैं ?

रोटी और राजनीति

भूख सभी को लगती है । रोटियाँ भूख मिटाती हैं । धनवान-निर्धन सभी की । रोटियों का अपना इतिहास है । रोटियाँ चूल्हे पर उस समय से पकाई जाती रही हैं जब मानव सभ्यता ने खेती करना भी प्रारम्भ नहीं किया था । 

इतिहास का एक टुकड़ा इस बात का गवाह रहा है कि रोटियाँ सिक्कों का पर्याय थी। रोटी दो चावल ले जाओ । रोटी दो मिठाई ले जाओ । अधिकारी, श्रमिक और मजदूरों को वेतन के रूप में रोटियाँ ही दी जाती थी । 

रोटियों के सहारे साकारात्मक आंदोलन होते रहे हैं । 1857 के चपाती आंदोलन में जनभावनाओं को रोटियों के सहारे ही उजागर किया गया था । लेकिन रोटियों पर कभी घिनोनी राजनीति हुई हो इतिहास ऐसा ज्ञात नहीं कराता है । 

ख़ैर ! वक्त बदला, लोग बदले और रोटियों के महत्व का नजरिया भी बदला । पाँच दिन पहले मजदूरों का एक पैदल समूह घर की और निकला था । रास्ते मे थक कर वे लोग इस पूर्वाभास में ट्रेन की पटरी पर ही सो गए थे कि "अभी ट्रेनें तो चलती ही नहीं हैं " । लेकिन वो लोग ये भूल गए थे कि मालगाड़ियों का परिचाल अभी भी जारी था । दुर्भाग्यवश सभी मजदूर मारे गए, लेकिन इसमें गलती भी उन मजदूरों की ही थी । कोई ट्रेन की पटरी पर भला क्यों सोएगा ? 

लेकिन खेल अब शुरू हुआ था । मजदूर बहस से गायब थे । रोटियों की तस्वीर सामने थीं । कर्ता भी गौण था , कारक भी गौण था लेकिन एक तीसरा था जो रोटियों की तस्वीरों को ठेले जा रहा था । वो मजदूर जो अपने घरों के लिए निकले थे, वो किस गाँव के थे ? उन्हें कहाँ जाना था ? इस बात का सरोकार किसी को नहीं था । सरोकार था तो केवल रोटियों के उस तस्वीर का जिसके ऊपर खून के छीटें थे । 

ऐसे में रमाकांत द्ववेदी की लिखी हुई एक कविता याद आ रही है कि :- 

बिन रोटी क्या पूजा-अर्चा-तीरथ-बरत-नहान
छापा-तिलक-जनेऊ-कंठी-माला कथा-पुराण

बिन रोटी सब सूना-सूना घर-बाहर-मैदान
मन्दिर-मस्जिद-मठ-गुरुद्वारा-गिरजाघर मसान

रोटी बढ़कर स्वर्ग लोक से, रोटी जीवन प्राण
रोटी से बढ़कर ना कोई देव-दनुज-भगवान

सो रोटी उपजे खेती से, खेती करे किसान
जो किसान का साथ निबाहे, सो सच्चा इनसान

शनिवार, 9 मई 2020

सेनापतियों के लिए उसका सैनिक परिवार की तरह होता है

एक सैनिक को उसके दिए हुए उत्कृष्ट सेवा के लिए जब किसी सैन्य दल का सेनापति घोषित किया जाता है तो उसके पीछे सेवाकाल में प्राप्त अनुभवों और सैनिक सम्वेदनाओं का विशाल सागर साथ चलता रहता है । 

एक सेनापति सेनाओं का नायक कम और अपने सैनिक परिवार का मुखिया ज्यादा होता है । वो अपने सैनिकों के अंतर्मन से उठते भावनात्मक तरंगों के सम्प्रेषण को पढ़ने में निपुण होता है जिसकी अभिव्यक्ति में वह कभी सख्त, कभी नर्म और कभी भावुक होता रहता है । 

लेकिन एक सेनापति अपने सैनिकों के हितार्थ, निःसंकोच भाव से तत्क्षण ही सब कुछ छोड़ने के लिए सदैव तत्तपर रहता है ।

"कैप्टन ब्रेट क्रोजियर" ऐसे ही सेनापतियों के फेरहिस्त में विराजने वाले सेनापति हैं । युद्धक हैलीकॉप्टर उड़ाने से अपने कैरियर की शुरुआत करने वाले ब्रेट क्रोजियर को उनके उत्कृष्ट प्रतिभा के लिए अमेरिकन परमाण्विक विमान वाहक पोत थियोडोर रूजवेल्ट का कप्तान बनाया गया था । 

लेकिन ब्रेट क्रोजियर को जब यह ज्ञात हुआ कि कोरोना महामारी के प्रचंड प्रकोप ने रूजवेल्ट पर पदस्थापित सैनिकों को अपने पाश में जकड़ना शुरू कर दिया है और उनके किये हुए अनुरोध का समुचित संज्ञान नहीं लिया जा रहा है तो उन्होंने अपने कैरियर की परवाह किये बिना सैनिकों की जान बचाने के लिए वो सब किया जो उन्हें एक कुशल सेनापति बनाता है । 

बाद में ब्रेट क्रोजियर द्वारा उठाए गए कदमों को असंवैधानिक करार देकर उन्हें पदमुक्त कर दिया गया ।  लेकिन जब वो अपने जहाज को छोड़कर जा रहे थे तो सैनिकों की कतारबद्ध पङ्गतियाँ, तालियों की गड़गड़ाहट और सैनिकों की गीली आंखों द्वारा दी गई विदाई यह कहने को पर्याप्त था कि ब्रेट क्रोजियर सर्वसिद्ध कुशल सेनापति रहे थे जिन्होंने अपने सैनिकों के हितों में अपने कैरियर तक को दांव लगा दिया था । 

हालांकि ब्रेट क्रोजियर पर अंतिम फैसला अभी आना बाकी है लेकिन ब्रेट क्रोजियर का यह निश्चल त्याग समयचक्र की परिधियों में आने वाले सेनापतियों के लिए अनुकरणीय उदाहरण सदैव रहेगा ।

गुरुवार, 7 मई 2020

सेनाओं के नायक रुपहले पर्दे पर नहीं आते हैं, लेकिन उनकी विजय गाथा उन्हें सर्वकालिक महानायक बनाते हैं ..

विश्व युद्ध इतिहास का हर पन्ना साक्षी है कि सेनापतियों के अतुलित साहस औऱ निपुण युद्धकौशल, युद्धभूमियों में विजयश्री के उतुंग ध्वज को गाड़ते आये हैं ।

सेनापति विजयश्री के मनोरथ से जब अपनी सेनाओं को समर समर्पित करता है तब उसका अवचेतन मन यह कामना भी करता रहता है कि विजयश्री के अंतिम क्षणों तक उसकी सेनाएं निर्विघ्न रहे ! परन्तु, समराग्नि अगर उसे मृत्यु वरन को विवश ही कर दे तो, मृत्यु के अंतिम क्षणों तक भी उसकी सेनाएं अक्षुण्य रहे !

सेनापति अपने सेनाओं के परिवार का बरगद होता है । जिसके गहरे छाँव के निचे उसकी सेनाएं आशंका मुक्त रहती हैं ।   

शहीद कर्नल आशुतोष शर्मा का नाम ऐसे ही शूरवीर सेनापतियों के नामों के साथ शताब्दियों तक स्मृत किया जाएगा । १४वें और अंतिम प्रयास में सेना में भर्ती होने वाले आशुतोष शर्मा की नियति ही देश सेवा की थी । अपने सैन्य सेवाओं के दौरान दुर्गम और दुरूह अभियानों को अपने युद्धकौशल और चपल निर्णय के दम पर सुगम बनाने वाले कर्नल आशुतोष शर्मा ने यह सत्यापित किया था कि ईश्वर ने उन्हें सैन्य सेवा के लिए ही रचा था । उनके उत्कृष्ट सेवाओं के लिए कर्नल आशुतोष शर्मा को सेना ने इन्हें अपने तमगे से भी सजाया था । 

भारतीय सेना के राष्ट्रीय राइफलस को परमवीर और दुर्धस योद्धाओं का खजाना कहा जाता है । अपने अंतिम विजय अभियान के दौरान कर्नल शर्मा २१ वें आर आर के कमांडिंग ऑफिसर थे । पहाड़-पर्वत-जंगल के खाख छानने वाले कर्नल आशुतोष शर्मा ने अपने सेवाकाल में चले दुर्गम विजय अभियानों के अनुभवों से परिपक्वता की उच्च सीमा को प्राप्त किया था । 

तीन दिन पहले दस्युदल द्वारा अप्रिय घटना के कलुषित मंशा को विफल करने के दौरान, मृत्यु के अंतिम क्षणों तक अपने टीम को सुरक्षित करने की जद्दोजहद में कर्नल आशुतोष शर्मा वीरगति को प्राप्त हो गए ।  

भारत, प्रलय के अंतिम दिनों तक स्वर्गीय कर्नल आशुतोष शर्मा का ऋणी रहेगा । इन्होंने अपने पीछे वीरता की अथाह विरासत को छोड़ा है जिसे पढ़-सुन कर पीढ़ियाँ उनके पदचिन्हों को अनुसरीत करती रहेंगीं। 

सेनाओं के नायक पर्दे पर नहीं आते हैं लेकिन उनके विजय गाथाओं का वास्तव अभिनय उन्हें  सर्वकालिक महानायक बनाते हैं ।

गुरुवार, 30 अप्रैल 2020

ऋषि कपूर और इरफान का यूँ चले जाना बहुत कुछ खाली कर गया ...

वक्त ने किया क्या हसीं सितम
तुम रहे ना तुम, हम रहे ना हम !!

कलाकार मरा नहीं करते ! कलाकार अपनी सीमाओं से परे, समय से परे जीते हैं । यूँ तो,कलाकार जिस कालखण्ड को जीता है उसकी हस्ती उसी कालखण्ड को निछावर होती है, लेकिन ये बात दूसरी है कि एक कलाकार अपने कला श्रेष्ठता के दम पर प्रशंसकों के समाज में शताब्दियों तक याद किया जाता है और उसके किये हुए कामो पर बलिहार होकर प्रशंसक कृतज्ञता लुटाता रहता है ।  

स्वर्गीय इरफ़ान और ऋषि कपूर भारतीय अभिनय कला जगत के ऐसे ही धुरंधर थे जिनकी कलाश्रेष्ठता से वशीभूत प्रशंसकों का एक वर्ग उन्हें जीवनपर्यंत स्मृत करता रहेगा । 

राजस्थान के टोंक से निकल कर गरीबी के टेढ़े और खुरदरे रास्ते को नापते हुए इरफ़ान ने फिल्मी जगत के छोटे पर्दे से अपने अभिनय का श्रीगणेश, द ग्रेट मराठा,चंद्रकांता और चाणक्य जैसे सीरियलों में जब किया, तो गरीबी से लड़ते हुए एक श्रेष्ट अभिनेता की संजीदगी उनके अभिनय में स्पष्तः दृष्टिगत हो रही थी । 

यहाँ से फिर इरफ़ान ने पीछे मुड़कर कभी नहीं देखा । इरफान के अभिनय और इनके नशीले आँखों के जादुई सम्मोहन से बने मिश्रित रासायन से कोई नहीं बच सका । कारवाँ आगे बढ़ता गया लोग सम्मोहित होते गए ।  

इरफ़ान ने एक इंटरव्यू में कहा था कि मेरा आधा अभिनय मेरी आँखें करती हैं और बाकी का आधा मैं । मेरे अब्बा ने एक बार मेरी आँखों के लिए कहा था " तुम्हारी ये आँखें हैं कि जादू का प्याला !! " 

संजीदे अभिनय और बोलती हुई आँखों की सुघड़ क्षमता के बदौलत इनके ठुमके नहीं लगाने की कमी को दर्शकों ने सहर्ष ही स्वीकार कर लिया था । दर्शकों को इऱफान वैसे ही पसन्द थे जैसे वो वास्तविक जीवन में थे।

लेकिन आज, आद्र कण्ठों से यह स्वीकार कर लेना पड़ता है की स्लमडॉग मिलियनर , लाइफ ऑफ पाई, लंच बॉक्स, हिंदी मीडियम ,पान सिंह तोमर जैसी फिल्मों को अपने अभिनय के दम पर भारतीय अभिनय कला कल नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने वाला इरफान नहीं रहा ! 

अभी ये से सब नया ही था कि विरक्तियों से लड़ते हुए आज ऋषि कपूर विदा कह गए ! 

चले जाना, दुनियाँ की सभी क्रियाओं में सबसे वीभत्स क्रिया है । जाने वाले चले जाते हैं स्मृतियों को शेष छोड़ जाते हैं । इस चले जाने की क्रिया का ना आदि है न अंत होगा ।  फिर भी इस रहस्यमय प्रश्न का जवाब कोई दे पाता तो मैं पूछने वालों की कतार में सबसे आगे खड़ा रहता । 

ख़ैर ! अपनी पुरखों से मिले अभिनय के उत्तराधिकार को ऋषि कपूर ने सम्पूर्ण समर्पण से आत्मसात कर आगे बढ़या था । उनकी सीधी टक्कर अपने जमाने के लिजेंड्रि बच्चन और खन्ना साहब से था । 

लेकिन चॉकलेटी बॉबी (बॉबी),  अकबर(अमर अकबर ऍंथोनी),  रवि वर्मा (कर्ज),रोहित(चांदनी), राजीव(नगीना) रवि(दीवाना) और रौफलाला के किरदारों से सने हुए अभिनय से वसीभूत होकर सिनेमा जगत के स्थापित कलाकारों ने ऋषि कपूर को  स्नेहित भाव से अंगीकार कर यह स्वीकृत किया था कि ऋषि कपूर सभी जॉनर के श्रेष्ठ अभिनेता थे । 

ऋषि कपूर जितने मंझे थे उतने ही सरल । एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि "जीवन के कड़वे सच्चाई से लड़ने के लिए आदमी को रोमांटिक बनना पड़ता है " अब इस बात को सूनकर कोई क्या ही कह पायेगा सिवाय रोने के ! 

लेख लम्बा हो रहा है लेकिन फिर भी ये बताना चाह रहा हूँ कि, कला जगत में कलाकार दो तरह के होते हैं । एक वो जिनके किये काम कम हैं लेकिन उनकी पहुँच प्रशंसकों और इस परिधि से बाहर के लोग भी हैं । 

कपूर साहब और इऱफान भाई इसी श्रेणी में आते हैं । आज दोनों हमारे बीच में नहीं हैं । इस तस्वीर में बात करते हुए ऋषि कपूर और इरफान खान एक दूसरे से यही बोल रहे होंगे :- 

मैं ना रहूँगा, तुम ना रहोगे,
फिर भी रहेंगीं ये निशानियां ...

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2020

सचिन.... सचिन.... सचिन...

सचिन... सचिन.....सचिन....

क्रिकेट ने कई महानायकों को जना है, लेकिन सचिन जैसा कोई दूसरा नहीं । नब्बे के दशक में जब क्रिकेट की लोकप्रियता भारत में लगातार कम हो रही थी तब एक नए सूर्य के साथ क्रिकेट का एक नया सवेरा आया, नाम था सचिन रमेश तेंदुलकर ।

अपने डेब्यू मैच में ही सोलह साल के सचिन ने विरोधी टीम के खिलाड़ियों को यह संदेश प्रेषित कर दिया था कि वह केवल क्रिकेट खेलने नहीं आया है, वो यहाँ क्रिकेट रचने आया है जिसे शताब्दियों तक पढा जाएगा । 

बिना मूँछ के इस बल्लेबाज ने जब मुस्ताक अहमद के एक ही ओवर में दो छक्के जड़े थे तो मोहम्मद कादिर ने यह कहा था कि "बच्चे को मार कर क्या दिखाना चाह रहे हो मेरे गेंद को छू कर तो देखो" और अगले ही ओवर में जब उस मूढ़ गेंदबाज को लगातार तीन छक्के जड़ दिए गए तो यह प्रमाणित हुआ था कि क्रिकेट में मूँछों का होना या नहीं होना मायने नही रखा जाता है । 

सचिन का सूर्य अभी ठीक से दीप्तमान हुआ भी नहीं था कि अजेय रहने वाले ऑस्ट्रेलियन टीम और उनके खिलाड़ियों के सपने में सचिन के रहस्यमय शॉट्स और उससे निजात पाने के सपने आने लगे । 

सचिन के शानदार शॉट्स का जादुई तिलस्म अब धीरे धीरे अभेद्य हो रहा था । कवर ड्राइव, स्ट्रेट ड्राइव, पुल, हुक, फ्लिप का प्रमेय विरोधियों के लिए अनसुलझा सवाल बनता जा रहा था । 

समय बढ़ता गया रिकॉर्ड बनते गए । खेल-खेल में सचिन के बल्ले से रिकॉर्ड की इतनी कहानियाँ बन गई है कि क्या याद रखा जाए और किसे भुला जाए है ये याद नहीं आता है ।

इन सब के बीच याद आता है की शोएब के तेज गेंद पर पॉइंट के ऊपर जब सचिन ने छक्का मार दिया था तो सोएब केवल रोया नहीं था, बस!

याद आता है कि शैन वार्न रोते रोते यह स्वीकर कर लेता है कि उसके फिरकी के जादुई तिलिस्म को इस दुर्धष खिलाड़ी ने तोड़ मरोड़ कर रख दिया है । 

याद आता है कि वर्ल्ड कप के फ़ाइनल में जब भारत, ऑस्ट्रेलिया से हार गया था और सचिन को मैन ऑफ द सीरीज घोषित किया गया था लेकिन सचिन को जैसे उस ट्रॉफी प्राप्त करने की कोई खुशी ही नहीं हुई थी । 

याद आता है कि खेल के अंतिम पड़ाव पर खड़े इस महान खिलाड़ी का जब इसका सपना साकार हुआ और इसने विश्व कप के विजयी ट्रॉफी को अपने छाती से लगा कर इस तरह फफक फफक कर रोया था जैसे बिछड़े हुए बेटे से मिलकर माँ गले लगा कर रोती हैं । 

कितना कुछ कहा जाए ! कहने को इतना कुछ है कि आपलोग पढेंगें ही नहीं । 

ख़ैर ! कहना बस इतना है कि सचिन ने क्रिकेट और क्रिकेट प्रेमियों को बस दिया है । बेहिसाब, बेहिचक,बेशर्त । लिटिल मास्टर सचिन को जन्मदिन की ढेरों शुभकामनाएं । आपकी कृति अजेय और अविस्मृत रहे । 

जिंदाबाद ...

शुक्रवार, 23 अगस्त 2019

शुभ जन्माष्टमी

शुभ जन्माष्टमी

आज जन्माष्टमी है । भगवान श्री कृष्ण का जन्मदिन । एक हिन्दू होने के नाते श्री कृष्ण मेरे आराध्य हैं और मैं इनका अनन्य उपासक हूँ ।

यह एक महज मान्यता ही नहीं है की भगवान श्री कृष्ण का जन्म आज की ही तिथि में हुआ था अपितु ये विश्वास है कि भगवान श्री कृष्ण की उपस्थिति ब्रम्हाण्ड के रज से लेकर कण तक है और सृष्टि के अनन्त काल तक रहेगी ।

यह विश्वास वैसा ही है जैसे रात के बाद भोर हो जाने को होता है । सूर्य का उदय पूर्व दिशा में ही होने को होता है और जैसे अमावस के बाद चंद्र का पूर्ण हो जाने को होता है।

मानवीय जनभावनाओं, आस्था,विश्वास और कण-कण में  विराजित श्री कृष्ण के ही रूप हैं राम। भगवान श्री राम ।

भगवान श्री राम के अस्तित्व के होने या ना होने का प्रश्न ठीक वैसे ही विद्वेष और कलुषपूर्ण है जैसे  जल विहीन धरती में सृष्टि के सृजन की कल्पना कर जाना है । जैसे सूर्य के प्रकाश बिना धरती पर जीव के बचे रहने की कल्पना कर जाना है।

लेकिन विडम्बना यह है कि  इस  चराचर जगत के अंतःकरण में स्थापित भगवान श्री राम के अस्तित्व के विद्यमान होने को प्रमाण की आवश्यकता है ।

क्या मानव शरीर में प्राण के विद्यमान होने और ना होने का भी प्रमाण मांगा जाता है ?

क्या धरती के रिक्त स्थानों में वायु के होने या न होने का भी प्रमाण मांगा जाता है ?

एक भक्त द्वारा आप सबों को शुभ जन्माष्टमी 🙏

बुधवार, 29 मई 2019

रटे हुए खिलाड़ियों के नाम और उनके खेल

2003-04 में प्रतियोगिता दर्पण पत्रिका 22 रुपये में और सामान्य ज्ञान दर्पण 18 रुपये में उपलब्ध हो जाती थी । 

साल के चार ग्रैंड स्लैम के विजेताओं के नाम मैं इसलिए रट लिया करता था ताकि परीक्षा में पूछे जाने पर उसका जवाब दिया जा सके ।

अमूमन ये होता है कि जिस खेल के खिलाड़ियों के नाम आपको याद रहते हों वो खेल आपको धीरे-धीरे प्रिय लगने लगता है ।

वो दौर फ़ेडरर का था, 237 सप्ताह तक शीर्ष पर बने रहने के दौर, वीनस बहनों का पराक्रम तब भी था पर किम क्लस्टर्स और शारापोवा के आने के बाद इस खेल में रंगत और भी आ गई थी ।अन्ना कुर्निकोवा का जो जलवा था उसका अपना अलग ही लेवल था।

अब नडाल आ चुके थे और ये दौर नडाल और उनके क्ले कोर्ट पर बिखरते हुए जलवे का दौर था । फ़ेडरर साल में होने वाले बाकी तीन ग्रेंड स्लैम तो जित लेते थे लेकिन क्ले कोर्ट अब अबूझ पहेली थी उनके लिए । घास के मैदान का अजेय योद्धा फ़ेडरर (8 विम्बलडन ), मिट्टी के मैदान पर कहीं टिक नही पा रहे थे । अब नडाल, फ़ेडरर के स्पीड ब्रेकर थे  ।

समय के साथ जीत के रफ़्तार पर इनके शारिरिक चोट हावी होते रहे और क्रमशः इनकी रफ़्तार भी कमती रही ।

20 ग्रेंड स्लैम के साथ फ़ेडरर इस खेल में अपना कृतिमान स्थापित करने में सफल तो रहे लेकिन नडाल ने उन्हें क्ले कोर्ट में हमेशा परेशान किया ।  नडाल के 17 ग्रैंड स्लैम में से एक आध ग्रैंड स्लैम (फ्रेंच ओपन) भी अगर फ़ेडरर के झोले में आते तो फ़ेडरर की विजयी पताका को ये ग्रैंड स्लैम स्वर्ण जड़ित रत्नों सा सुशोभित करता।

खैर! अब ये दौर जोकोविच का है । इस दौर को जोकोविच ने अपने रंग में ढालने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ा है । 15 ग्रैंड स्लैम का विजयी जोकोविच अपनी विजय पताका लिए अग्रसर है और शायद कई सालों बाद जोकोविच ऐसा खिलाड़ी बन जाए जिसने दो बार साल के चारों ग्रैंड स्लैम जीता हो।

सरेना के बारे में फ़िर कभी।

:- रामकृपाल 

शनिवार, 25 मई 2019

चुनाव, परिणाम और आत्ममंथन

चुनाव परिणाम आ गए हैं और हारी हुई पार्टियों में आत्ममंथन का दौर शुरू है । ये चुनाव कई पक्षों के बीच लड़े जाने के बावजूद भी अन्ततः दो पक्षों की लड़ाई बन गई थी । दूसरे शब्दों में भाजपा इसे "सभी दल बनाम बीजेपी " की लड़ाई भी कह रही है ।

पिछले पाँच सालों में लागू किए गए योजनाओं और उन्हें धरातल पर लाने में सफल, सत्तासीन बीजेपी जीत की आकांक्षा लिए मजबूत दावेदार के रूप में चुनावी समर में उतरी ।

बीजेपी का सफल मैनेजमेंट, प्रधानमंत्री पद के दावेदार, प्रमुख नेताओं और बेजेपी के मीडिया सेल ने इस पार्टी द्वारा किए गए कार्यों की उपलब्धि और विपक्षी पार्टियों की कमियों को देश मे रहने वाले अंतिम पायदान के लोगों तक पहुंचाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ा।

वहीं विपक्ष के लिए एकत्र हुई पार्टियां, पिछले पाँच सालों से सत्ता में रही बीजेपी के कार्यों की त्रुटि को खोजने और उससे उपजे असंतोष को लोगों तक पहुंचाने में असमर्थ रहीं । 

जहाँ बीजेपी राष्ट्रवाद, गरीब और गरीबी से लड़ने वाली योजनाएं,  सबका साथ और सबका विकास ,विदेशनीति, भ्रष्टाचार मुक्त शासन और देशहित के मुद्दे को लोगों के दिलोदिमाग में भरने में सफल रही, वहीं विपक्षी पार्टियां चुनावी मेनिफेस्टो के कवर पेज के डिजाईन और "चौकीदार चोर है" के नारे लगवाने  में लोगों के भरोसे को खोती रही ।

इस बीच आर्थिक नीति और किसानों की समस्यओं के मुद्दे को भी लोगों ने बाकी और योजनाओं के कारण  दरकिनार कर दिया ।

विपक्षी दलों द्वरा चुनावी सभाओं में बड़े नेताओं के मीडिया ट्रायल से इमेज मेकिंग की कोशिश को नेताओं के गिरते भाषा के स्तर ने  सफल नहीं होने दिया ।

अंततः बीजेपी गरीबी से लड़ने के मुद्दे, भ्रष्टाचार मुक्त शासन, विदेश नीति और राष्ट्रवाद के मुद्दे को लोगों तक कनेक्ट करने में सफल रही और प्रचण्ड बहुमत से विजयी हुई ।

कुल मिलाकर ये चुनाव विकास के मुद्दे और तुस्टीकरण की राजनीति से दूर जाकर लड़ी और जीती गई ।

वहीं वीपक्षी पार्टियों ने सरकार की कमियों को गिनाने के बजाय नरेंद्र मोदी को हराने पर अपना ध्यान केंद्रित रखा और जनता के सरोकार के मुद्दे को उनतक पहुंचाने में असफल रही  ।