चुनाव परिणाम आ गए हैं और हारी हुई पार्टियों में आत्ममंथन का दौर शुरू है । ये चुनाव कई पक्षों के बीच लड़े जाने के बावजूद भी अन्ततः दो पक्षों की लड़ाई बन गई थी । दूसरे शब्दों में भाजपा इसे "सभी दल बनाम बीजेपी " की लड़ाई भी कह रही है ।
पिछले पाँच सालों में लागू किए गए योजनाओं और उन्हें धरातल पर लाने में सफल, सत्तासीन बीजेपी जीत की आकांक्षा लिए मजबूत दावेदार के रूप में चुनावी समर में उतरी ।
बीजेपी का सफल मैनेजमेंट, प्रधानमंत्री पद के दावेदार, प्रमुख नेताओं और बेजेपी के मीडिया सेल ने इस पार्टी द्वारा किए गए कार्यों की उपलब्धि और विपक्षी पार्टियों की कमियों को देश मे रहने वाले अंतिम पायदान के लोगों तक पहुंचाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ा।
वहीं विपक्ष के लिए एकत्र हुई पार्टियां, पिछले पाँच सालों से सत्ता में रही बीजेपी के कार्यों की त्रुटि को खोजने और उससे उपजे असंतोष को लोगों तक पहुंचाने में असमर्थ रहीं ।
जहाँ बीजेपी राष्ट्रवाद, गरीब और गरीबी से लड़ने वाली योजनाएं, सबका साथ और सबका विकास ,विदेशनीति, भ्रष्टाचार मुक्त शासन और देशहित के मुद्दे को लोगों के दिलोदिमाग में भरने में सफल रही, वहीं विपक्षी पार्टियां चुनावी मेनिफेस्टो के कवर पेज के डिजाईन और "चौकीदार चोर है" के नारे लगवाने में लोगों के भरोसे को खोती रही ।
इस बीच आर्थिक नीति और किसानों की समस्यओं के मुद्दे को भी लोगों ने बाकी और योजनाओं के कारण दरकिनार कर दिया ।
विपक्षी दलों द्वरा चुनावी सभाओं में बड़े नेताओं के मीडिया ट्रायल से इमेज मेकिंग की कोशिश को नेताओं के गिरते भाषा के स्तर ने सफल नहीं होने दिया ।
अंततः बीजेपी गरीबी से लड़ने के मुद्दे, भ्रष्टाचार मुक्त शासन, विदेश नीति और राष्ट्रवाद के मुद्दे को लोगों तक कनेक्ट करने में सफल रही और प्रचण्ड बहुमत से विजयी हुई ।
कुल मिलाकर ये चुनाव विकास के मुद्दे और तुस्टीकरण की राजनीति से दूर जाकर लड़ी और जीती गई ।
वहीं वीपक्षी पार्टियों ने सरकार की कमियों को गिनाने के बजाय नरेंद्र मोदी को हराने पर अपना ध्यान केंद्रित रखा और जनता के सरोकार के मुद्दे को उनतक पहुंचाने में असफल रही ।
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