महर्षि शुक्राचार्य ने कठोर तपोबल से संजीवनी विद्या अर्जित कर लिया था । दानव दलों के कानों में देवताओं पर जीत के विजयनादों की गूँज अब धीरे-धीरे बढ़ने लगी थी ।
संजीवनी के अलौकिक विद्या के सामर्थ्य से, देवताओं का दानवों के हाथों पराभूत होने के पूर्वाभास से महर्षि अंगिरस ने इस महासमर को रोकने के लिए शांति यज्ञ का अनुष्ठान, आहूत किया था ।
देवऋषि बृहस्पतिपुत्र 'कच' को शांतियज्ञ के प्रमुख ऋत्विक बनने के लिए आमंत्रण भेजा गया था । ऋषिपुत्र कच उम्र में तो छोटा था लेकिन उन्होंने एकनिष्ठ समर्पण से शिष्य परम्परा के सर्वोच्च प्रतिमान को छू कर सभी ब्रम्हविद्याओं को उपार्जित किया था ।
महर्षि अंगिरस और कच के सम्पूर्ण समर्पण से शांतियज्ञ निर्विघ्न सम्पन्न तो हो गया था बावजूद इसके भी देवासुर
संग्राम को टाला नहीं जा सका ।
दानव, देवताओं के हाँथों मारे जाते लेकिन शुक्राचार्य संजीवनी विद्या से उन्हें पुर्नजीवित कर देते । शुक्राचार्य के पास जब तक संजीवनी विद्या थी तब तक देवताओं का पराभव निश्चित था ।
शांतियज्ञ के अभीष्ठ परिणाम प्राप्त नहीं होने के कारण ऋषिपुत्र कच ने शुक्राचार्य के सानिध्य में जाकर संजीवनी विद्या को प्राप्त करने का दुरूह निर्णय कर लिया । राक्षसों के राज में, राक्षसों से घिरे, राक्षसों के गुरु का, ऋषिपुत्र द्वारा अपने गुरु बनाने की प्रर्थना, मृत्यु को आमंत्रण था लेकिन कच अपनी आत्मा की उद्गार को सुनता था । "आत्मा वा अरे मंतव्यः श्रोतवयः निदिध्या- सितव्य !"
अपने तेजस्वी और सुविचारी अनुशासन के प्रभुत्व से कच ने शुक्राचार्य के सबसे प्रिय शिष्य की पदवी प्राप्त कर ली थी । गुरुपुत्री "देवयानी" भी कच के आचरणों से प्रसन्न रहती थीं । लेकिन एक ऋषिकुमार की प्रशंसायुक्त ख्याति से हतप्रभ राक्षसों ने एक दिन कच का वध कर उसके शरीर के टुकडों में विभक्त कर भेड़ियों के सम्मुख फेंक दिया था । शुक्राचार्य की दृष्टि मृत कच के कटे हुए मस्तक पर गई तो उन्होंने अपनी संजीवनी से कच को पुनः जीवित कर दिया ।
समय बीतता गया । कच का देवयानी(गुरुपुत्री), शर्मिष्ठा(राक्षसराज पुत्री) और गुरु शुक्राचार्य से सम्बंध अत्यंत घनिष्ठ होते गए ।
राक्षसों ने पुनः षड्यंत्र रचा, कच को जिंदा जला कर उसके चिताभस्म को मदिरा में मिलाकर शुक्राचार्य को पिला दिया गया । लेकिन जब उन्हें यह ज्ञात हुआ तो क्रोधित शुक्राचार्य ने अपने प्रचंड तपोबल के प्रभाव से कच को पुनः जीवित कर दिया । लेकिन कच अब संजीवनी विद्या को प्राप्त कर चुका था । उसने राक्षस गुरु के देह के अंदर रहते हुए उनसे ये विद्या स्वतः ग्रहण कर लिया था ।
कच अब देवताओं के पक्ष में था । असुरों ने देवताओं से भयभीत होकर देवासुर संग्राम की संधि कर ली थी । शुक्राचार्य की संजीवनी विद्या का अब नाश हो चुका था । पृथ्वी पर शांति थी ।
आशय :-
आत्मा वा अरे मंतव्यः श्रोतवयः निदिध्या- सितव्य :-
आत्मा के स्वरूप का चिंतन करें, आत्मा की पुकार सुनें और आत्मज्ञान को ही अपना लक्ष्य बनाएं ।
लिखते रहिए हमारा ज्ञान बढ़ाते रहिए ❤️❤️
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