मंगलवार, 27 दिसंबर 2022

भगवान श्रीकृष्ण द्वारा हेतुतः सोलह सहस्त्र स्त्रियों का वरण।

भगवान श्रीकृष्ण द्वारा हेतुतः सोलह सहस्त्र स्त्रियों का वरण।
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अपनी अमोघ शक्ति को लहरों में सीमित कर दिन भर लपलपाता हुआ समुद्र रात में उन्हीं लहरों से लयबद्ध और गुडरम्य गर्जन करता है। रात में सागर की यह भाषा श्रीकृष्ण को और सुहाती थी। द्वारिका के निर्माण का एक कारक यह भी तो था। 

लेकिन श्रीकृष्ण के चक्रवर्ती जीवन को स्थैर्य रास कहाँ आता था भला। उनके दरबार का एकमात्र धेय्य ही दीन-दुखियों के कष्टों का निवारण मात्र था। कामरूप के राजनगर प्राग्ज्योतिषपुर के राजा "नरकासुर" के अत्याचार से त्रस्त होकर वहाँ से भागी हुई कुछ स्त्रियाँ आज श्रीकृष्ण के सम्मुख गुहार लगाने आयीं थी। 

अपने नाम के अनुरूप ही कुकृत्य करने वाले अत्याचारी "नरकासुर" ने अपने कारागृह में सोलह सहस्त्र स्त्रियों को बन्दी बनाकर उनके जीवन को नर्क की यातनाओं में धकेल रखा था। उस नर्क का वही राजा था और वही यमराज। भूख और उस अत्याचारी की यातना सहते हुए कई स्त्रियां उस कैद में ही कालकवलित होती जा रहीं थी। 

क्या उन निष्पाप सहस्त्रों नारियों का इस विराट आर्यावर्त में कोई त्राता नहीं है महाराज? दोनों हांथों को ऊपर उठा कर जीवन संकट से लड़ती हुई स्त्रियों ने कृष्ण के सम्मुख हृदयभेदी चीत्कार किया। 

भगवान श्रीकृष्ण के मुखमंडल का तेज कुछ क्षण के लिए मलिन सा हो गया। मानो उन स्त्रियों के दुःखों के काले बादल उनके चमकते हुए चेहरे के तेज को ढांपने आ गए हों। सहसा श्रीकृष्ण उठे और बोल पड़े। नारायणी सेना प्राग्ज्योतिषपुर जाएगी। कामरूप की कलंकित होती धरा नरकासुर के पापों से मुक्त होगी।

यह कार्तिक चतुर्दशी का दिन था। नारायणी सेना और नरकासुर की सेनाएं के बीच, लोहित गंगा (ब्रम्हपुत्र नदी) के किनारे, प्राग्ज्योतिषपुर की समरभूमि में रोमहर्षक युद्ध हुआ। नरकासुर नारायण के हाथों मारा गया। कामरूप की युद्धभूमि का सूखा तृण राक्षसों के लहू से रक्तस्नात हो गया। सभी बन्दी स्त्रियों को नरकासुर के नर्क से मुक्ति दिलाई गई और उन्हें उनके घर के लिए विदा किया गया।

लेकिन शाम होते होते वो सभी स्त्रियां पुनः वापस लौटने लगी। उनके स्वजनों ने उन्हें अस्वीकृत कर आश्रय देने से मना कर दिया था। श्रीकृष्ण द्वारा प्राप्त मुक्तिदान अब उन स्त्रियों के लिए अभिशाप बनकर काले नाग की भांति फन काढ़े हुए निर्भीक खड़ा था। 

भगवान श्रीकृष्ण का मुखमण्डल पहले की भांति मलिन नहीं हुआ। वे थोड़ा रुके और सहसा मुस्कुराते हुए राजमहल से बाहर निकले जहाँ सभी स्त्रियाँ अपने घरों से असहाय लौट कर खड़ी थीं। अपने ग्रीवा को गगन गामी करते हुए भगवान श्रीकृष्ण ने सभी स्त्रियों को सम्बोधित किया। 

"मैं द्वारिका के महाराज वसुदेव का पुत्र श्रीकृष्ण अपने कुलदेवी "इडादेवी" को स्मरण करते हुए आप सभी स्त्रियों को अभयदान करने की घोषणा करता हूँ। हे समाज की बहिष्कृत नारियों मैं तुम्हें पत्नी के रूप में स्वीकार करता हूँ। मेरे नाम का मंगलसूत्र धारण कर समस्त आर्यावर्त में कहीं भी और किसी से भी तुम अधिकारपूर्वक कह सकती हो कि मैं द्वारिकाधीश श्रीकृष्ण की पत्नी हूँ। आज से तुम सब द्वारिका की हो। तुम्हारे सम्मान की रक्षा करना मेरा प्रथम कर्तब्य होगा।"

सम्पूर्ण राजमहल श्रीकृष्ण के जयजयकारों से गूंज उठी। सेनाएं वापस लौटने लगी। द्वारिका उन सभी स्त्रियों के सम्मान की प्रतीक्षा में जगमगाने लगा...

शनिवार, 24 दिसंबर 2022

सनातन संस्कृति में शुभ कामनाओं की पूर्ति का प्रतीक स्वस्तिक और पश्चिमी देशों की कुंठाएं....

सनातन संस्कृति में शुभ कामनाओं की पूर्ति का प्रतीक स्वस्तिक और पश्चिमी देशों की कुंठाएं....
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सभ्यता के विकास के क्रमानुक्रम में  मानव ने अपनी भावनाओं को सम्प्रेषित करने के लिए नए मार्ग का सृजन कर लिया था। लोग अपने दैनिक जीवन से जुड़े क्रियाकलापों को चित्रों के माध्यम से गुफा की दीवारों पर अंकित करने लगे थे।इतिहासकारों के अथक प्रयासों के बावजूद भी इन चित्रों और संकेतों के समूहों में से कुछ ही संकेत ऐसे थे जिनके रहस्यों की जानकारी को ढूंढने में सफलता प्राप्त हो सकी।

मानव जीवन मे शुभ संकेतों के वाहक का प्रतीक "स्वस्तिक" का रहस्य भी ऐसा ही है जिसके अस्तित्व का प्रमाण ईसा से दस हजार साल पूर्व तब का माना जाता है जब इतिहास अपने पासाण काल मे था। हालांकि, स्वस्तिक के रहस्यों के लिखित इतिहास की चर्चा अगल-अलग जगहों और अलग-अलग समयों पर होता रहा है। पर्सियनों के धर्म ग्रन्थों में स्वस्तिक को अनन्त और सतत सृजनात्मकता का प्रतीक माना गया है। सिंधु घाटी सभ्यता में इसका प्रयोग शुभ कार्य हेतु लिखित और सांकेतिक रूप से होने के प्रमाण प्राप्त हुए हैं। भारतीय इतिहास में स्वस्तिक के नाम का पहला लिखित साक्ष्य पाणिनि के अष्टाध्यायी (6 ईसा पूर्व) में मिलता है जहाँ इस स्वस्तिक के चित्र का नामकरण "स्वस्तिक" के रूप में वर्णित है। अपितु इतिहासकार यह मानते हैं कि स्वस्तिक का प्रयोग वैदिक और उत्तर वैदिक कालों में भी अनुष्ठानों के सम्पादन हेतु किया जाता रहा है।

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सनातन संस्कृति में बैकुंठ को आत्मा की अनन्त यात्रा का अंतिम पड़ाव माना गया है और ऐसी मान्यता है कि बैकुंठ, ध्रुव तारे के उस पास की दुनियाँ है जिसकी परिक्रमा सप्तऋषियों का समूह वर्ष भर करते रहते हैं। सप्तऋषियों की इस परिक्रमा के फलस्वरूप जो आकृति बनती है वो स्वस्तिक कहलाती है। एक वैदिक मान्यता यह भी है कि स्वस्तिक के चारों फलकें चार वेदों का प्रतीक हैं। ये चार पुरुषार्थ, चार आश्रम, चार लोक और चार देवों का भी प्रतीक है। बौद्ध और जैन ग्रन्थों में भी इसे शुभ प्रतीक के रूप में माना गया है।  

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बाद के वर्षों में स्वस्तिक की महिमा से मुग्ध होकर दुनियाँ ने इसकी प्रसंसा मुक्त कण्ठ से चारों दिशाओं में किया। अमेरिका के इन्फेंट्री डिवीजन से लेकर फिनलैंड की वायुसेना तक ने स्वस्तिक के प्रतीक चिन्हों का उपयोग अपने झंडे के लिए किया। हलांकि पश्चिम के लोगों को दूसरों की संस्कृति से चिढ़ने का एक दीर्घकालिक इतिहास रहा है सो उन्होंने इस बार भी ऐसा ही किया। हिटलर द्वारा उपयोग किये जाने वाले  "हेकेनक्रेज" या "हुक्ड क्रॉस" को उन्होंने स्वस्तिक के समान ही मान लिया।अब चुकी हिटलर द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला हेकेनक्रेज को विनाश का प्रतीक माना जाने लगा था और इसके इस्तेमाल पर हर तरफ प्रतिबन्ध था इसलिए स्वस्तिक के इस्तेमाल पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया। 

उन्हें इस बात से कोई राब्ता नहीं कि मानव सभ्यता के दीर्घकालिक इतिहास को समेटे हुए स्वस्तिक का प्रतीक सनातन धर्म के आधार स्तम्भों में से एक आधार है जिसकी उत्तपत्ति ही शुभ कार्यों हेतु हुई है....

मंगलवार, 20 दिसंबर 2022

जादूगर मैसी

कर्मण्येवाधिकारस्ते सर्वभौम है, लेकिन ऐसा अक्सर ही होता है कि जब सभी परिस्थियां, सभी नक्षत्र, सभी हितैषी एक सीध में आपके पक्ष में खड़े हों तब किसी अभीष्ट कामना की पूर्ति होती है। छत्तीस वर्षों के अंतहीन प्रतीक्षा में व्यग्रता से खड़ा अर्जेंटीना के लिए आज का दिन ऐसा ही रहा। 

उत्साह,अनुशासन और जीत की भूख को समेट कर, अपने निर्धारित समय से ढेड़ गुने अधिक समय तक चलता हुआ यह खेल शुरुआती 60 मिनट तक मैसी के सम्मोहन में वशीभूत होकर उसी के इर्द गिर्द फुटबॉल की तरह घूमता रहा। 

एक जादूगर जैसे जैसे बूढा होता जाता है उसके सम्मोहन की माया का मायाजाल उतना ही व्यापक और सघन होता जाता है। मैसी के ड्रीब्लिंग,पास,और गोल पोस्ट पर दागे जा रहे शॉट्स के आकर्षण का मायाजाल आज दर्शकों पर ठीक वैसा ही काम कर रहा था और मंत्रमोहित होते दर्शकों का समूह ड्रम बजाते हुए खुशी से रोते जा रहे थे। अर्जेंटीना का राष्ट्रध्वज हर तरफ उन्मत्त होकर लहरा रहा था। 

खेल के 60 वें मिनट के बाद अर्जेन्टीना सुस्त हो चली थी। अघाई बिल्ली की तरह। खिलाड़ियों के पास की तरम्यता अब टूटने लगी थी। शुरुआती पेनाल्टी किक और एंजेल डी मारिया के दूसरे गोल के बदौलत जीत के प्रति आस्वस्त अर्जेंटीना का जादू खेल के 74वें में जैसे बिफर सा गया। समर्थकों के नाद और करतल स्वर की ध्वनियाँ जैसे स्तब्ध सी हो गई।  इस विश्वकप के सनसनी माने जा रहे ऐमबापे ने एक के बाद एक, दो लगातार गोल दागकर अर्जेंटीना के पैरों तले जमीन को अपनी और खींच लिया। 

2014 के विश्वकप के गोल्डन बॉल के विजेता रहे मैसी के जादू का तिलिस्म जैसे दरकता हुआ दिखाई पड़ने लगा। खेल 90 मिनट तक पहुँच कर 2-2 की बराबरी पर आकर वहीं रुक गया था जहाँ से इसकी शुरुआत हुई थी। बीच मे जो कुछ भी होता रहा,अब सब कहने सुनने की बातें मात्र थी। अगले 15 मिनट के अतिरिक्त समय मे फ्रांस का आक्रमण तेज तो हुआ लेकिन नतीजा वहीं का वहीं खड़ा रहा। शून्य पर। 

बोर्ड पर 15 अतिरिक्त मिनट का और समय जोड़ा गया। थकावट और दबाव के बीच चलते हुए खेल में मैसी के ड्रीब्लिंग का जादू एक बार फिर से चला, अर्जेंटीना को पुनःबढ़त मिली लेकिन ऐमबापे द्वारा दागे जा रहे अकाट्य पेनाल्टी शूटआउट ने खेल को फिर से बराबरी पर खड़ा किया। मैच पेनाल्टी शूटआउट तक पहुँची और परिणाम सबके सामने है। 

मैसी के 2006 से चली आ रही अंतहीन प्रतीक्षा को जैसे अपनी मंजिल प्राप्त हुई। उसे फिर से गोल्डन बॉल की उपाधि का हकदार घोषित किया गया और विश्वकप की ट्रॉफी का भी। गोल्डन बॉल की ट्रॉफी लेते हुए उसने विश्वकप की ट्रॉफी को ऐसे चूमा जैसे एक माता प्रसूति गृह से निकलने पर अपने नवजात को चूमती है।जैसे एक प्रमी सालों प्रतीक्षा के बाद एक दूसरे से मिलने पर चूमते हैं। जैसे एक युद्धबन्दी अपने घर लौटने पर अपने बच्चों को चूमता है...

अंत मे यह कि लोग आते हैं चले जाते रहगें। मेस्सी जैसा ना पहले कोई था ना दूसरा कोई होगा। एको अहं, द्वितीयो नास्ति, न भूतो न भविष्यति....

मंगलवार, 14 सितंबर 2021

आत्ममुग्ध जोकोविच की मलिन होती कृति

जोकोविच की व्यग्रता उनकी अर्जित ख्यातियों को मलिन करती रहती हैं। लय में खेलते आत्ममुग्ध जोकोविच दर्शकदीर्घा में बैठे लोगों को रोमांच की सर्वश्रेष्ठ ऊँचाई पर पहुँचा कर उन्हें चकित तो करते रहते हैं लेकिन जोकोविच अपने प्रदर्शन के ढलान पर जब रहते हैं तब अक्सर ही अपनी अर्जित ख्यातियों को धूमिल करते रहते हैं। पराभूत होते हुए जोकोविच कभी नेट अम्पायर से उलझते हुए गालियां बकते हैं, लाइन अंपायर की तरफ गेंद को उछालते हैं और अमूमन रैकेट तोड़ते हुए अपने प्रशंसकों के दिलों को दुखाते रहते हैं।

निःसन्देह जोकोविच वर्तमान ऐरा के दुर्जेय टैनिस प्लेयर हैं। लेकिन उनका अक्खड़ स्वभाव, जिसके दम पर जोकोविच ने टेनिस जगत में धुरंधरों के बीच अपने नाम का खूँटा गाड़ा है, वही स्वभाव ही उनके कीर्ति को निस्तेज करता रहता है। 

यह हो भी क्यों नहीं? क्या एक क्रिकेट प्रसंसक के चित्त को यह कभी स्वीकार्य होगा कि सचिन/धोनी/विराट शून्य पर आउट होने के बाद, आवेग में बल्ले को हवा में उछाले या जमीन पर दे मारे? क्या एक फुटबॉल प्रेमी का अंतर्मन इस बात की स्वीकृति प्रदान करेगा कि मैसी/नेमार/रोनाल्डो पैनल्टी शूट आउट के दौरान गोल से चूक जाने पर फुटबॉल को दांतों से काटने लगे या दर्शकों की तरफ पूरे आवेग से किक दे मारे? क्या इस बात की कल्पना की जा सकती है कि आसफा पावेल/ जस्टिन गैटलिन/ उसेन बोल्ट दौड़ की प्रतियोगिता में हार जाने पर आवेग में अपने जूते को दर्शकों की तरफ उछाल दे? 

जोकोविच ने जिस परिपाटी को शुरू किया है यह अब नए खिलाड़ियों में भी देखने को अमूमन मिलता है। जोकोविच टेनिस के  प्रतिष्ठित नाम हैं और प्रतिष्ठित लोगों का अनुकरण नए लोग अक्सरहां करते रहते हैं। एक दर्शक, एक प्रसंसक अपने पसंदीदा खिलाड़ी से ऐसी अपेक्षा कतई नहीं रखता है...

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2021

वृंदावन की यात्रा..

पिछले दिनों ठाकुर जी की नगरी मथुरा/वृंदावन जाने की कामना फलीभूत हुई। मेरी वृंदावन की ये दूसरी यात्रा थी। दस साल पहले और अब के मथुरा/वृंदावन में बहुत कुछ बदलाव था। नई दुकाने, नए होटल, सड़कें और भक्तों की भीड़। सब कुछ बदली हुई थी। लेकिन जो नहीं बदला था वो वृंदावन की गलियों में बाँके बिहारी लाल और राधा रानी के प्रेम के उस दिब्य स्वरूप के होने की अनुभूति थी, जिसके स्मरण मात्र से चेतना के समस्त दिशाओं में प्रेम का प्रवाह होता रहता है। इस अमूर्त प्रेम और समर्पण के स्वरूप का आभास आज से दस साल पहले भी मुझे इसी स्वरूप में हुआ था जैसा उस दिन हो रहा था और शायद युगों-युगांतर तक यहाँ आने वाला हरेक व्यक्ति, राधा-कृष्ण के प्रेम के इस स्वरूप को अनुभूत करता रहेगा। 

कृष्ण प्रेमी हैं, कृष्ण प्रेम भी। कृष्ण भक्ति भी हैं, कृष्ण भक्त भी। कृष्ण मनहर हैं, कृष्ण मनस्वी भी।कृष्ण सृष्टा भी हैं, कृष्ण सृष्टि भी।
कृष्ण महापराक्रमी हैं लेकिन कृष्ण अपूर्व प्रेमी भी हैं। कृष्ण के निस्नात प्रेम को वृंदावन की वसुंधरा का कण-कण, राधा नाम जपते हुए इस प्रेम के सम्मान की व्यख्या करती रहती है। गली,चौराहे, चबूतरे,घड़ी-घण्टों,सत्संग स्थानों और आश्रमों से उठते ध्वनियों में राधा नाम के स्मरण की गूंज मात्र इसलिए गूंजती रहती है क्योंकि  राधा नाम में ही कृष्ण समाहित है।  

कृष्ण प्रेमी भी हैं, कृष्ण प्रेम भी। कृष्ण कृष्ण भी हैं, राधा भी....

हमारी वृंदावन की यात्रा इस अनुभूति से समाप्त हुई कि दुनियाँ में प्रेम बना रहे। राधा-कृष्ण लोगों के चेतना में प्रेम का संचार करते रहे। जय श्री कृष्ण...

रविवार, 21 फ़रवरी 2021

हरिद्वार यात्रा...

किंवदंतीयाँ ऐसी है कि जब तक ईश्वर आपको अपने पास बुलाते नहीं है आप उनके दरबार में हाजरी नहीं लगा पाते हैं। पिछला पूरा साल कोरोना के भेंट चढ़ने के कारण साल भर से टलती आ रही हरिद्वार यात्रा का मुहूर्त तय किया गया और अन्ततः शनिवार की सुबह हमलोग पाप नाशनी माँ गंगा में डुबकी लगाने इस विश्वास से निकल पड़े थे कि दुनियाँ के पापों को धोने वाली माँ गंगा अपने निर्मल और पवित्र आँचल से हमलोगों के पापों को धोकर आशीर्वाद से सिक्त करेंगीं ! 
                                   (रास्ते का चाय)
                                      (रास्ते)
अपराह्न में हमलोग हरिद्वार पहुँच चुके थे। विशाल जलराशि को समेट कर शांत भाव से बहने वाली माँ गंगा अपने निर्मल और पवित्र स्वरूप में आंखों के सामने दृष्टिगोचर थी। घाटों में डुबकियां लगाते भक्तों द्वारा माँ गँगा की जयजयकार, मंदिरों के घण्टों से उठती हुई पवित्र प्रतिध्वनि और मंत्रोच्चार से हरकीपौडी का वातावरण हर और हरी के हरिद्वार में विराजने की स्वर्गीय अनुभूति प्रदान कर रहा था।                           (हरिद्वार में माँ गंगा का प्रवेश)
                               (हरकीपौडी)
माँ गंगा के जल को आचमन और आँखों से लगाकर श्रद्धा अर्पित करते हुए हमने माँ गंगा में हमने डुबकी लगाया। कुछ डुबकि अपने नाम और बाकी की डुबकियां माता-पिता और परिवार वालों के नाम से। डुबकी लगाने के बाद महसूस ऐसा हुआ जैसे देह का आधा भार किसी ने कम कर दिया हो। 

पूजा अर्चना और माता मनसा के दर्शन के बाद हमलोग घाट पर पुनः वापस आ चुके थे। संध्या आरती प्रारम्भ हो चुकी थी। दक्षिण दिशा में अस्त होते सूर्य की किरणें गंगा की लहरों को छू कर संध्या वंदन किये जा रही थीं। अब चारों दिशाओं से उठते वैदिक मंत्रों की प्रतिध्वनियों का ईश्वरीय सम्मोहन था। माँ के जय जयकार से गंगा आरती सम्पूर्ण हुई। सबने जयजयकारा लगाया। पपनाशनी माँ गंगे की जय-जय...
                              (गंगा आरती)
                          (माँ गंगा की सुंदरता)
हरकीपौडी से गंगा जल साथ लेकर माँ गंगा से यह विनती किया कि अगले बार फिर से अपने पास जल्दी ही बुलान, आगे की यात्रा ऋषिकेश की और बढ़ गई थी।


शनिवार, 7 नवंबर 2020

मधुपुर डायरी - ३

नवम्बर लौटने का महीना है। किसान खेतों में लौट रहे हैं। बाहर मजदूरी करने गए लोग फिर से गाँव लौट रहे हैं। ठंढ भी अब धीरे-धीरे लौटने लगी है। गाँव के बड़े तालाब में साइबेरियन पक्षी फिर से लौटने लगे हैं। टूटे हुए खलिहान को सँवारने, महिलाएं खलिहान लौट रही हैं और लौट रहा है धान का सुनहला रंग।

धान की कटाई अब शुरू हो गई है। कोरोना के संत्रास के बीच किसानों के लिए सुखद यह कि इंद्रदेव की कृपा से इस साल की उपज ठीक होने वाली है।

बिहार चुनाव सम्पन्न हो गए हैं। एक्जिट पोल आने लगे हैं। बैठकों की बतकही में इन मुद्दों ने भी अपना जगह घेर रखा है। लेकिन किसानों को इन सब बातों से कोई सरोकार नहीं है। वो धान की बालियों को देखकर अपने हिसाब से उपज का एक्जिट पोल निकालते हैं और उससे होने वाली कमाई को सोचकर मुस्कुराते हुए फसल पर हंसिया चलाते हैं....

गुरुवार, 29 अक्टूबर 2020

मधुपुर डायरी -२

माता रानी की प्रतिमा के विसर्जन के साथ दुर्गापूजा का समापन हो चुका है। इस साल के दुर्गापूजा का उमंग कोरोना के कारण फीका-फीका सा रहा यहाँ। कोरोना प्रोटोकॉल के तहत प्रसाशन के आदेशानुसार पंडाल नहीं बनाये गए थे, रावण दहन का कार्यक्रम भी आयोजित नहीं किया गया था। सब कुछ सादा-सादा सा ही खत्म हो गया।  
ये अलग बात है कि मधुपुर विधानसभा के निर्वाचित जनप्रतिनिधि के आकस्मिक निधन के कारण, खाली हुए इस विधानसभा में उपचुनाव जल्द ही होने वाले हैं। उस समय रेलियाँ भी होंगीं, सभाएं भी आयोजित की जायेंगीं और भीड़ तो इक्कट्ठा होगा ही। अब चुनाव में कोरोना को भाव देता ही कौन है। बिहार में ही देख लीजिए।
ख़ैर अब जो है सो है। फिलहाल मैं बहन घर से आये हुए बालूशाही का आनन्द लेते हुए यह सोच रहा हूँ की देवघर का पेड़ा ही केवल मशहूर नहीं है। पांडे दुकान का बालूशाही का भी अपना ही स्वाद है....

मंगलवार, 27 अक्टूबर 2020

मधुपुर डायरी-१

ऑक्सीजन की कमी से फड़फड़ाता हुआ फेफड़ा दिल्ली छोड़ जब गाँव में पहुँचता है तो उसे सहजता से यह महसूस होने लगता है कि हवा की भी अपनी मोटाई होती है और वजन तो होता ही है। 

कोरोना का डर अब धीरे-धीरे बड़े शहरों में ही जैसे सिमटने लगा है। यहाँ कम लोग ही मास्क लगा रहे हैं (समाजिक दूरी तो खैर अब कहीं रहा ही नहीं है)। लेकिन इन सबों के बीच सुखद यह कि संक्रमण का दर गाँवों में नहीं के बराबर है। ऐसा शायद इसलिए भी की गाँव की दिनचर्या शहरी लोगों से आज भी काफी बेहतर है। प्रदूषण के बढ़ते स्तर ने शहरी जीवन को किस स्तर तक प्रभावित किया है इसका अंदाजा शहरी संक्रमण दर को देख कर सहजतापूर्वक  ही लगाया जा सकता है। 

इन सब बातों को सोचते हुए घर के बालकॉनी में बैठा हुआ हूँ। कार्तिक महीने के शुक्लपक्ष का चंद्रमा धीरे-धीरे जवान होता जा रहा है। सामने बगीचे में लगे सागौन के पेड़ों की मद्धम हवा चल रही है और मैं अपने फेफड़े में इस ताजी हवा को ठूँस कर उसे फिर से जवान करना चाह रहा हूँ....

रविवार, 16 अगस्त 2020

मैं पल दो पल का शायर हूँ...

धोनी कल रिटायर्ड हो गए। एक छोटे से इंस्टाग्राम वीडियो के मार्फ़त धोनी ने लोगों को बताया कि उन्होंने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के सभी फॉर्मेट से सन्यास ले लिया है। उनके प्रशंसकों कि यह चाह थी की धोनी अपना आख़री मैच मैदान पर खेलने उतरते और सम्भवतः यह भी तमन्ना कि वो विजयी छक्के से अपनी अंतिम पारी को घोषित करते! लेकिन धोनी ने हमेशा सम्भावनाओं से आगे बढ़कर खेल खेला है। रिटायरमेंट का उनका यह मास्टरस्ट्रोक भी शायद उसी खेल का आखरी हिस्सा रहा हो। 

लम्बे बालों वाले हेलीकॉप्टर शॉट के जनक के रूप में प्रसिध्दि प्राप्त करने वाले खिलाड़ी से कैप्टन कूल तक का उनका सफर क्रिकेट प्रशंसकों के लिए हमेशा ही हर्षदायक रहा। बतौर कैप्टन, गाँगुली से प्राप्त भारतीय क्रिकेट टीम की विरासत (द्रविड़ को छोड़ते हैं) को धोनी ने उन सभी क्षेत्रों में इनरीच किया जिसकी कमी से भारतीय टीम जीत के आखरी लम्हों को भुना पाने में असमर्थ रह जाती थी। 

यह सब इतना आसान भी नहीं था। आईसीसी के सभी तीनों ट्रॉफियों को जीतने वाले कैप्टन कुल ने क्रिकेट में कभी निज स्वार्थ के लिए जगह नहीं ढूंढा। जीत को जब भी धोनी की जरूरत पड़ी धोनी ने उसी अनुरूप अपनेआप को वहाँ फिट करने का सफल प्रयास किया। 

खेल के आखरी गेंद तक पराजय की रथ को विजय जुलूस के पथ पर मोड़ देने वाले महेंद्र सिंह हमेशा ही आस पास की परिस्थितियों से सांत्वनाशून्य भाव लिए ही अपने आप को परिचित करवाते रहते थे। फिर वो विश्वकप का विश्वविजयी छक्का हो या पिछले विश्वकप के सेमीफाइनल में रन आउट होकर पेवेलियन लौटता धोनी हो। धोनी जब बहुत गदगद होते थे तब थोड़ी मुस्कान अपने चेहरे पर बिखेरते थे पर दर्शकों की स्मृति में विरले ही ऐसी घटना अंकित हुई हों जब धोनी ने शतक लगा कर भुजाओं को लहराते हुए अपना दम्भ प्रदर्शित किया हो।

कैप्टन कूल का क्रिकेट को छोड़ना एक ऐसा वैक्यूम है जिसे शायद धोनी ही पूरा कर सकते हैं..