शनिवार, 24 दिसंबर 2022

सनातन संस्कृति में शुभ कामनाओं की पूर्ति का प्रतीक स्वस्तिक और पश्चिमी देशों की कुंठाएं....

सनातन संस्कृति में शुभ कामनाओं की पूर्ति का प्रतीक स्वस्तिक और पश्चिमी देशों की कुंठाएं....
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सभ्यता के विकास के क्रमानुक्रम में  मानव ने अपनी भावनाओं को सम्प्रेषित करने के लिए नए मार्ग का सृजन कर लिया था। लोग अपने दैनिक जीवन से जुड़े क्रियाकलापों को चित्रों के माध्यम से गुफा की दीवारों पर अंकित करने लगे थे।इतिहासकारों के अथक प्रयासों के बावजूद भी इन चित्रों और संकेतों के समूहों में से कुछ ही संकेत ऐसे थे जिनके रहस्यों की जानकारी को ढूंढने में सफलता प्राप्त हो सकी।

मानव जीवन मे शुभ संकेतों के वाहक का प्रतीक "स्वस्तिक" का रहस्य भी ऐसा ही है जिसके अस्तित्व का प्रमाण ईसा से दस हजार साल पूर्व तब का माना जाता है जब इतिहास अपने पासाण काल मे था। हालांकि, स्वस्तिक के रहस्यों के लिखित इतिहास की चर्चा अगल-अलग जगहों और अलग-अलग समयों पर होता रहा है। पर्सियनों के धर्म ग्रन्थों में स्वस्तिक को अनन्त और सतत सृजनात्मकता का प्रतीक माना गया है। सिंधु घाटी सभ्यता में इसका प्रयोग शुभ कार्य हेतु लिखित और सांकेतिक रूप से होने के प्रमाण प्राप्त हुए हैं। भारतीय इतिहास में स्वस्तिक के नाम का पहला लिखित साक्ष्य पाणिनि के अष्टाध्यायी (6 ईसा पूर्व) में मिलता है जहाँ इस स्वस्तिक के चित्र का नामकरण "स्वस्तिक" के रूप में वर्णित है। अपितु इतिहासकार यह मानते हैं कि स्वस्तिक का प्रयोग वैदिक और उत्तर वैदिक कालों में भी अनुष्ठानों के सम्पादन हेतु किया जाता रहा है।

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सनातन संस्कृति में बैकुंठ को आत्मा की अनन्त यात्रा का अंतिम पड़ाव माना गया है और ऐसी मान्यता है कि बैकुंठ, ध्रुव तारे के उस पास की दुनियाँ है जिसकी परिक्रमा सप्तऋषियों का समूह वर्ष भर करते रहते हैं। सप्तऋषियों की इस परिक्रमा के फलस्वरूप जो आकृति बनती है वो स्वस्तिक कहलाती है। एक वैदिक मान्यता यह भी है कि स्वस्तिक के चारों फलकें चार वेदों का प्रतीक हैं। ये चार पुरुषार्थ, चार आश्रम, चार लोक और चार देवों का भी प्रतीक है। बौद्ध और जैन ग्रन्थों में भी इसे शुभ प्रतीक के रूप में माना गया है।  

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बाद के वर्षों में स्वस्तिक की महिमा से मुग्ध होकर दुनियाँ ने इसकी प्रसंसा मुक्त कण्ठ से चारों दिशाओं में किया। अमेरिका के इन्फेंट्री डिवीजन से लेकर फिनलैंड की वायुसेना तक ने स्वस्तिक के प्रतीक चिन्हों का उपयोग अपने झंडे के लिए किया। हलांकि पश्चिम के लोगों को दूसरों की संस्कृति से चिढ़ने का एक दीर्घकालिक इतिहास रहा है सो उन्होंने इस बार भी ऐसा ही किया। हिटलर द्वारा उपयोग किये जाने वाले  "हेकेनक्रेज" या "हुक्ड क्रॉस" को उन्होंने स्वस्तिक के समान ही मान लिया।अब चुकी हिटलर द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला हेकेनक्रेज को विनाश का प्रतीक माना जाने लगा था और इसके इस्तेमाल पर हर तरफ प्रतिबन्ध था इसलिए स्वस्तिक के इस्तेमाल पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया। 

उन्हें इस बात से कोई राब्ता नहीं कि मानव सभ्यता के दीर्घकालिक इतिहास को समेटे हुए स्वस्तिक का प्रतीक सनातन धर्म के आधार स्तम्भों में से एक आधार है जिसकी उत्तपत्ति ही शुभ कार्यों हेतु हुई है....

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