बुधवार, 11 जनवरी 2023

संतुराम...

लौटना सबसे आसान क्रिया है, बचपन की बातों की और लौटना तो सबसे आसान! मैट्रीयलिस्टिक होती हुई इस दुनीयाँ में घटते हुए भावनाओं के स्पेस को ढूढने, थोड़ा पीछे लौट आया हूँ। गाँव के दिनों की और!

खेती बाड़ी सम्भालने के लिए संतुराम मेरे घर मे सहायक के तौर पर रहा करते थे। नाम के अनुरूप ही व्यवहार से सन्तोषी और आचरण में भद्र। काम करने की ऐसी दुर्धर्ष और श्रमसाध्य संयम मैंने किसी और में नहीं देखा। चाहे सावन की धुरझार बरसात हो,जेठ की तप्त धरती हो या असाढ़ की तेज आंधी, खेत ने संतुराम को जब भी बुलाया वो कुदाल और हल लिए खेत के पास पहुंच जाते। 

कुदाल चलाते हुए संतुराम का लय, उनके कुदाल से निकली हुई मिट्टी के पानी मे गिरने से उपजे छप्प-छप्प की ध्वनि के साथ मिलकर एक मधुर गीत को जन्म देता और खेत पर जलपान पहुंचाने गया मैं, इस ध्वनि को देर तक चुप बैठ हुए सुनता रहता। वो मुझसे कहा करते की इसका आनन्द तो पानी में उतर कर ही लिया जा सकता है, दूर बैठे वहाँ से नहीं। उन्हें पता रहता था कि मुझे जोंक से डर लगता है इसलिए भी वो मुझे और चिढाते रहते। 

खेती के अंतिम दिन अन्य मजदूरों के साथ मिलकर घर पर जब भोज का प्रबंध होता तो इसका सम्पूर्ण देख रेख संतुराम खुद करते। वो उस दिन के प्रमुख संचालक रहते और इस बात के लिए वो मुझ पर धौंस भी जमाते रहते। खेती खत्म होने के बाद साल के कुछ महीने वो ईंट के भट्ठों पर काम करने पक्षिम बंगाल चले जाया करते थे लेकिन जब वह घर लौटते तो साथ में मेरे लिए बंगाल से आम जरूर लाते। उन आमों में उनकी आत्मीयता घुलकर जो स्वाद आता वो फिर कहीं अन्यंत्र प्राप्त नहीं हुआ। बदले में, मैं सालों भर अपने हिस्से आने वाले चीजों को उनसे साझा करता और हम दोनों साथ मिलकर आनन्द लिया करते।

हमलोग अब गाँव से शहर शिफ्ट होने वाले थे। शिफ्ट होने का समय जैसे-जैसे नजदीक आ रहा था मुझे उनसे और अधिक भावनात्मक जुड़ाव महसूस होने लगा था। ख़ैर!हमलोग शहर आ गए और मुझे नॉकरी के लिए किसी दूसरे शहर के लिए निकलना पड़ा। माँ-बाबूजी से उनकी मुलाकातें होती रहती लेकिन मैं अब उनसे ज्यादा समय के लिए नहीं मिल पाता था बमुश्किल साल में तीन चार बार ही। खेत और खलिहान वाली बातें अब बातों में रह गया था। 

अब वो इस दुनियाँ में नहीं हैं लेकिन उनसे जुड़ी हुई अनेक भावनात्मक और आत्मियपूर्ण यादें हैं। उनका निश्चल प्रेम है जो मतलबी होते हुए इस दुनियाँ के बीच मे भी गाहे बगाहे खुशी देती हैं।

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