रिश्ते की डोर जब चटकती है तो उसकी कोई ध्वनि नहीं होती है। इसे उस तरह सुना या देखा नहीं जा सकता है, जैसे मुगफली के चटखने से ध्वनि निकलती है। जैसे शीशे के टूटने से निकली कर्कश आवाज सबको चोंकाती हो।
लेकिन इसके टूटने की आवाज को वैसा महसूस किया जा सकता है जैसे पूस की रात में बहने वाली पछुवा हवा, जो दिखाई नहीं पड़ते हुए भी माँस को चीर हाड़ में धंस जाती है। जैसे अनाथालयों में बीमारी से जूझ रहे किसी असहाय रोगी को सहायता की आशा, जिसकी आशातीत आँखों को हर बार निराशा ही हाँथ लगती है।
सम्बन्धों की गर्माहट पर जब पूस की ठंढक पड़ने लगे तो प्रेम की रजाई ओढ़ाकर उसे पुनः गर्म कर लेना ही जीवन है ।
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लोग मिलते हैं,बात चीत होती है, मेल-जोल होता है, सम्बन्ध बनते हैं,बन कर टूट जाते हैं। विज्ञान कहता है कि टूटना सृजन की पहली अवस्था है, लेकिन मानवीय सम्बन्धों के विज्ञान में संवाद का टूटना सम्बन्ध की अंतिम अवस्था है।
इस भाग दौड़ भरी जीवनशैली में संवाद का खत्म होना रिश्ते के खत्म होने की निशानी माना जा सकता है। ईर्ष्या सम्बन्धों के टूटने के बाद कि पहली अवस्था है जिसकी परिणीति आपसी वैमनष्यता पर खत्म होती है। बेहतर यह हो कि बातिचित जारी रखा जाए। इग्नोरम परमं सुखम का फॉर्मूला भी अपनाया जा सकता है।
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बीतने वाला बीत जाता है। अभी अभी ही देखिये पुराना साल आया और आकर बीत गया। आज सुबह अभी थोड़े देर पहले ही तो हुई थी उसे बीते 3 घण्टे से ज्यादा का समय हो गया। एक जनवरी के बीते भी दो दिन हो गए। समय का क्या है जैसा भी हो बीत ही जाता है। भला हो या बुरा। बीते को बिसारिये नए को अपनाइए।
जय हो... शुभ हो...
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