बुधवार, 11 जनवरी 2023

गर याद रहे....


इस दुनियाँ को विस्मृत कर देने का राजरोग है। आँख बंद हुआ नहीं कि लोग हाँथ झाड़ कर मुँह फेर लेते है। माइकल शुमाकर ऐसे ही नाम हैं जिन्हें इस मतलबी दुनियाँ ने लगभग भुला दिया है। बावजूद इसके रफ़्तार की बात जब-जब चलेगी शुमाकर का मुस्कुराता हुआ चेहरा तब-तब सामने आकर यह बताता रहेगा कि लोग आते रहेगें-जाते रहेंगे, रिकॉर्ड भी बनेगें लेकिन जिस हिसाब से उसने रफ्तार की सीमाओं को लगातार लांघा है उसकी बराबरी कर पाना लगभग असम्भव सा रहेगा। 

सात विश्वकप चैम्पियन और सर्वाधिक ग्रांड प्रिक्स जीत के साथ खड़े शुमाकर ने जब अपने पिता द्वारा गिफ्ट किये गए मोटरसाइकिल से रफ़्तार का सफर शुरू किया था तब उन्होंने यह कल्पना तक नहीं किया होगा कि जब वो अपने खेल के सर्वोच्च पायदान पर खड़े रहेंगें तब नियति उनके साथ खेल कर जाएगी और भूल जाने की बीमारी से ग्रस्त यह दुनियाँ उनके जीते-जी ही उन्हें उपेक्षा के किनारों पर धकेल कर घुटते हुए मरने छोड़ जाएगी।

यह साल 2013 का था जब स्केटिंग के दौरान उन्हें गम्भीर चोट लगी और वायु की गति को भी चुनोती देने वाले शुमाकर का रफ्तार लगभग थम सा गया। वो दो साल तक कोमा में रहे और तब के बाद वे कहीं सार्वजनिक तौर पर आज तक नहीं दिखे। यदा कदा उनके मैनेजर उनके स्वास्थ्य की खबरें जारी करते रहे। कोमा से उबरने के बाद वो दो साल तक और होस्पिटलाइज रहे। बाद में उन्हें हार्ट की समस्याओं का भी सामना करना पड़ा। मात्र 53 साल के शुमाकर लगभग दस सालों से बीमार हैं और शायद आज भी कहीं अस्पताल में ही भर्ती हों! वक्त कभी कभी बहुत क्रूर हो जाता है....

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