यह लेख पिछले साल लिखा था आज यहाँ लगा रहा हूँ...
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प्रज्ञ माने प्रज्ञानानंद...
कल हुए क्रिप्टो कप के आखरी मैच के दौरान प्रज्ञानानंद ने विश्वजयी मैग्नस कार्लसन को एक बार पुनः परास्त कर दिया। यह मैग्नस कार्लसन का प्रज्ञ के हाँथों इस साल की तीसरी हार है। पिछले कई वर्षों के दौरान शतरंज में कार्लसन ने अपने जादुई खेल और तिलस्मी चाल से जीत का जो अभेद्य किला बना रखा था अब वो धीरे-धीरे दरकने लगा है।
जो प्रज्ञानानंद के खेल को देखते आएं हैं उनके लिए यह जीत हर्षदायक है, सुखदायक है। इसी वर्ष के शुरुआती दिनों में जब प्रज्ञानानंद ने मैग्नस को पहली बार हराया तब वह महज सोलह के थे और किसी विश्वविजेता को इतने कम उम्र के खिलाड़ी द्वारा पराजित करने वाले वो एकमात्र खिलाड़ी बने थे।
प्रज्ञानानंद का स्थिर धनी स्वभाव, विपक्षी खिलाड़ियों से विनम्रतापूर्वक खेल की गलतियों पर विमर्श और कम उम्र में ही प्राप्त दैवीय एकग्रता उन्हें शीघ्र ही विचलित कर देने वाले इस खेल के अन्य खिलाड़ियों से सर्वथा पृथक करती हैं। (इस संदर्भ का एक वीडियो कॉमेंट बॉक्स में है)
यह प्रज्ञानानंद की सहजता ही है जब जीत के बाद उन्होंने इंटरव्यू के दौरान यह कहा था कि मेरी यह अभिलाषा थी की मैं विश्वनाथन आनन्द और मैग्नस कार्लसन के साथ एक फोटो खिंचा सकूं। आज उनके साथ खेलता हूँ तो अच्छा लगता है।
महज दस के उम्र में इंटरनेशनल मास्टर की उपाधि अर्जित करने वाले एक मात्र खिलाड़ी और मात्र बारह की उम्र में ग्रैंडमास्टर की उपाधि अर्जित करने वाले दुनियाँ के दूसरे खिलाड़ी बनने वाले प्रज्ञानानंद की सत्यनिष्ठ एकग्रता उन्हें विश्वविजेता बनाये इसी उम्मीद में उनके कई प्रसंसक बैठे हुए हैं।
मैग्नस का परिचय यहाँ बस इतना कि वो पाँच बार के विश्व चैंपियन हैं।तीन बार के वर्ल्ड रेपिड चैंपियन हैं। पाँच बार के वर्ल्ड ब्लिट्ज चैंपियन हैं और एक जुलाई 2011 से शतरंज की दुनियाँ के प्रथम स्थान पर विराजित हैं।
इति!
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