मुझे क्रिकेट से परिचय कपिलदेव की उपलब्धियों ने कराया था। क्रिकेट के प्रति प्रेम सचिन ने जगाया, लेकिन क्रिकेट का सम्मोहन शेनवार्न को खेलते देखकर जकड़ने लगा था। यूँ तो वो स्थूल रूप में अब क्रिकेट को नहीं खलते हैं लेकिन शुक्ष्म रूप से वो क्रिकेट की दुनियाँ में हमेशा विद्यमान रहेंगें। यह लेख पिछले साल लिखा था, आज याद आया तो यहाँ भी लगा दिया ताकि यह यहाँ स्थायी भाव से वार्न की याद दिलाता रहे।
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क्रिकेट तिलिस्म की दुनियाँ है। अगले ही गेंद पर यहाँ क्या कहानी बन जाय यह कह पाना तिलिस्मी दरवाजे के चाभी को खोज लाने जैसा ही है।बावजूद इसके इस तिलिस्म के मायाजाल को तोड़ने के लिए यहाँ कई जादूगर आये जिन्होंने अपने सम्मोहन की माया से अगली ही गेंद पर खेल की दशा और दिशा को अपने हिसाब से तोड़ा और मरोड़ा। शेनवॉर्न क्रिकेट के वही जादूगर थे जिनके जादू के तिलिस्म की कहानियां आने वाली पीढ़ियों को पढाया और सुनाया जाता रहेगा।
शुरुआत किस ठौर से करूँ यह ठीक से निर्धारित नहीं कर पा रहा हूँ लेकिन यह सर्वविदित सत्य है कि ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट टीम जब विश्वविजय के अश्वमेध घोड़े पर सवार होकर सरपट दौड़ा करता था, उस कालखंड का अगर मूल्यांकन हो तो, ऐडम गिलक्रिस्ट, मैथ्यू हैडन, रिकी पोंटिंग,एंड्रयू सायमंड्स, माइकल क्लार्क, ब्रेट ली,गिलेस्पी, ग्लैन मेग्रा और शेन वार्न इस सुनहरे कालखण्ड के वो कोहिनूर थे जिन्होंने दुनियाँ के हर क्रिकेटरों को चकित होने पर विवस किया था।
बात विषयांतर ना हों इसलिए पुनः वहीं लौटते हैं। उजले जर्सी, उजले बाल, कलाई पर उजले पट्टे और होठों पर अक्सरहां ही उजले क्रीम को पोत कर मैदान में उतरने वाले शेन वॉर्न के हांथों में जब लाल रंग की गेंद आती तो दर्शकों की आंखें विस्मयतापूर्वक उनके अगले गेंद के परिणाम की प्रतीक्षा में व्यग्रता पूर्वक टकटकी लगाए रहती।
अम्पायर के पीछे से हल्के दौड़ लगाते वॉर्न की दैहिक भाषा जितनी रहस्यकारी थी उससे कहीं अधिक रहस्यकारी, गेंद की सिलाई पर टिकी हुई उनकी उंगलियां रहतीं। उनके सधे हुए हाँथों का संतुलन और गेंद को छोड़ने के पहले सेकेंड के दसवें हिस्से में सरपट दौड़ता हुआ उनका दिमाग रहता जो बल्लेबाजों के नजरों को पढ़ कर उनके अनुमान के ठीक विपरीत किस्म की गेंदबाजी में निपुण था। उनकी घूमती हुई गेंद के मुड़ने की रफ्तार, दिशा और कौण के प्रमेय में उलझकर बल्लेबाज वापस पैवेलियन लौटते रहते।
1992 में भारत के खिलाफ डेब्यू करने वाले वॉर्न ने अपने खराब फॉर्म को अगले ही साल पीछे छोड़ कर जब "बॉल ऑफ सेंचुरी" फेंका और उसी साल अंतरास्ट्रीय क्रिकेट में 73 विकेट लिया तब से वॉर्न ने अपने कैरियर को कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। वॉर्न के प्रतिभा का सूर्य उगता रहा और उनके तेजोमय दीप्त के सम्मुख क्रिकेट जगत निरुत्तर होता रहा। अपने खेलते रहने तक वो सर्वाधिक टेस्ट विकेट हासिल करने वाले गेंदबाज बने रहे। बिना शतक लगाए सर्वाधिक टेस्ट रन उन्होंने अपने नाम किया। एक दिवसीय और टेस्ट मैचों को जोड़कर उन्होंने एक हजार से ज्यादा विकेट लिया।
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