शुक्रवार, 29 मार्च 2024

शकुनि-१

वैसे तो महाभारत ने पथ प्रदर्शक के रूप में अनेक महापुरुषों का परिचय समाज से करवाया लेकिन गांधार नरेश  "सुबाल" के पुत्र शकुनि का चरित्र अनमयस्क ही सबको अपनी और खींचता है। 

शकुनि मतलब गिद्ध। शकुनि मतलब कालकूट हलाहल को समेटा हुआ सर्प। शकुनि मतलब हितों के छद्म आवरण को ओढ़कर सर्वनास की आकांक्षा में प्रतीक्षारत एक दुष्ट। लेकिन शकुनि ऐसा क्यों था? हम सबों के बीच का शकुनि ऐसा क्यों होता है?

गंगा पुत्र भीष्म ने गंधार नरेश सुबाल के सामने धृतराष्ट्र के साथ गांधारी के विवाह हेतु प्रस्ताव रखा था। गंधार नरेश अपनी सुंदर पुत्री का विवाह नेत्रहीन धृतराष्ट्र के साथ नहीं करना चाहते थे लेकिन हस्तिनापुर की अपराजेय सेना के सम्मुख विवस होकर उन्होंने भारी मन से भीष्म के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया था।

भीष्म यह नहीं जानते थे कि गांधारी मांगलिक लग्न की कन्या थी और परम्परा के हिसाब से गांधारी का सांकेतिक विवाह पहले ही किसी बकरे से करा दिया गया था। ख़ैर! धृतराष्ट्र और गांधारी का विवाह संपन्न हुआ। कालांतर में भीष्म को जब यह बात ज्ञात हुआ तो गांधार नरेश को उनके छल के लिए उनके सभी पुत्रों के साथ बन्दी बना लिया गया। 

धृतराष्ट्र अपने प्रतिशोध का बदला लेने के लिए गांधार के सभी बन्दियों को खाने के लिए बहुत ही कम भोजन देता था जिसके कारण गांधार नरेश के कई पुत्र मृत्य को प्राप्त होने लगे। एक दिन सभी बन्दियों ने यह निर्णय लिया कि इतने कम भोजन में सभी के मरने से बेहतर यह होगा कि कोई एक व्यक्ति जीवित रहे जो इस अपराध का बदला कौरवों का नाश कर अर्जित कर सके। सभी ने शकुनि को इस कार्य के लिए उपयुक्त चुना और अंततः कंधार के सभी राजकुमार भूख की पीड़ा से मृत्यु को प्राप्त हुए। 

एक दिन जब गांधार नरेश सुबाल को यह लगने लगा कि भूख की पीड़ा से उनकी मृत्यु भी निकट आ गई है तब उन्होंने शकुनि को अपने पास बुलाया और अपने प्राणों की सम्पूर्ण ऊर्जा को समेट कर शकुनि के घुटने पर प्रचण्ड वेग से अपनी लात मार दी। शकुनि दर्द से कराह कर भुसायी हो गया और कातर दृष्टि से अपने पिता की और देखते हुए पूछा! ऐसा क्यों पिताजी? 

गांधार नरेश सुबाल ने सजल नेत्रों से शकुनि की और देखते हुए कहा। देखो शकुनि मैं यह जानता थ कि जब तुम यहाँ से बाहर निकलोगे तब पुनः पूर्व की भांति ही अपनी सम्पूर्ण ऊर्जा और समय मद्यपान और द्युत क्रीड़ा में गंवाने लगोगे और अपने भाइयों के प्राणों की आहुति को भी तुम सहजता से भूल जाओगे। लेकिन अब जब भी तुम इसे लंगड़े पैर के दर्द को आत्मसात करते हुए चलोगे तब-तब तम्हें तुम्हारे भाइयों के बलिदान और कौरवों के सर्वनाश का प्रण याद आता रहेगा। और सुनो मुझे यह भी पता है कि तुम द्युत क्रीड़ा में ही निपुण हो तो मेरी मृत्यु के उपरांत मेरी अस्तियों का द्युत में प्रयोग होने वाला पास बना लेना जो तुम्हें तुम्हारे जीवन के लक्ष्य को हासिल करने में सफलता प्रदान कराएगी। ऐसा कहकर गांधार नरेश ने अपने प्राण त्याग दिए!

क्रमशः....
(फोटो सांकेतिक)

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