एक पाठक यह चाहता रहता है कि उसके अच्छे किताबों के खोज की मृगतृष्णा हमेशा पूरी होते रहे। उसकी यह अभिलाषा भी रहती है की उसके चुकाए हुए मूल्यों के एवज में लेखक अपनी लिखी हुई बातों से उनमें नई ऊर्जा का संचार करे। नई बातों को जानने का माध्यम बने और भुलाये हुए बातों को स्मृत करने का जरिया बने। कम से कम तब तक तो जरूर ही जब तक एक पाठक किसी किताब को पढ़ता रहा हो।
सस्ते प्रसिद्धि को प्राप्त करने की कामुकता में गद्य बोलकर पद्य लिख देना, यात्रा वृतांत बोलकर संस्मरण लिख देना ,लघु कथा बोलकर कबाड़ लिख देने की जो आत्ममुग्धता वाली कोढ़ नए और बाजरू लेखकों को लगी है, उस कोढ़ में उठते खाज़ से एक पाठक हमेशा त्रस्त होता रहता है। लघु कथाओं,सूक्ष्म कथाओं और अति सूक्ष्म कथाओं की अपनी ही त्रासदी है। किताबों वाली सेल्फी की विभिषिका जो है उसकी लीला तो बलिहारी है ही।
एक पाठक को लेखक से कोई निजी राब्ता नहीं होता है। वह लेखक द्वारा लिखे किताबों को पढ़ कर उससे जुड़ता जाता है। लेखकों को सार्वजनिक रूप से अपनी लिखे हुए किताब को पढ़ने का आग्रह, किताबों की सेल्फी के साथ पोस्ट शेयर करने का आग्रह उसकी प्रसांगिकता पर ग्रहण लगाता है। लेखकों को गालियाँ सुनने का अभ्यस्त रहना चाहिए। और पाठकों को स्वस्थ गालियाँ देने को निर्भीक! आखिर क्यों ना? जब पाठक खर्च कर किताबें खरीदे और लेखक उसे निरास करे, फिर गालियाँ क्यों ना पड़े भला..
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