शुक्रवार, 29 मार्च 2024

सोमनाथ की कहानी भाग-१

सोमनाथ...

सोमनाथ महालय के निर्माण में उत्तर और दक्षिण दोनों ही स्थापत्यकला अपनी पराकष्ठा से उत्कीर्ण की गई थी। महालय के मंडप के विशाल खम्भों पर हीरा, मानिक, नीलम आदि रत्नों की पिचच्चीकरी ऐसी भौतिकी के सूत्रों की गई थी जो अपने ऊपर पड़ने वाले दियों के प्रकाश को मंडप के सम्पूर्ण दिशाओं में बिखेरता रहता था। एक साथ दस हजार से भी ज्यादा लोगों के खड़े होने की क्षमता वाले इस मंडप में ऐसे छह सौ से भी अधिक रत्नजड़ित खम्भे थे।  

सभामण्डप के द्वार के दोनों पार्श्व में दो विशाल दीप्तस्तम्भ थे जिनपर प्रतिदिन सहस्त्र दिप जलते थे। इन स्तम्भों से निकलने वाली प्रकाश राशि के सहारे समुद्रयात्री दिशाओं का अनुमान लगाते रहते। इन स्तम्भों के दक्षिण में एक चन्द्रकुण्ड था जिसके विषय मे यह कहा जाता है कि इसमें स्नान मात्र से सर्वरोग मुक्ति का अभय आशीर्वाद प्राप्त हो जाता था। 

सभामण्डप से होकर गर्भगृह का द्वार था। इसी गर्भगृह में अलोकिक सोमनाथ का विश्वविख्यात ज्योतिर्लिंग था। गर्भगृह के ऊपर एक विशालकाय शिखर था जिसका ऊपरी आवरण स्वर्ण जड़ित और भीतर रत्नजड़ित। सूर्य की सतेज किरणों की चमक में यह शिखर चकमकाता हुआ दूसरा सूर्य प्रतीत होता था और भीतर के रत्न, सहस्त्र दीपों के प्रकाश से चमकते हुए गर्भगृह की शोभा को अलोकिक दिब्यता से परिपूर्ण करता था।

सभा मंडप के सामने पूर्वाभिमुख नन्दी की विशालकाय चांदी की प्रतिमा विराजमान थी। मंदिर में प्रदीप्त दीपकों से जलकर उठते हुए घृत धूम्र, हवन कुंडों के समिधा में प्रयुक्त चन्दन- केसर- कस्तूरी से उठते धूम्र महालय के आस पास दो योजन पृथ्वी को सुंगन्धित कर स्वर्गीय अनुभूति प्रदान करती थी।

मंडप में दो सौ मन की ठोस श्रृंखला में लटका हुआ स्वर्ण महाघण्ट था जिसकी वज्रगर्जना मिलों तक सुनी जा सकती थी। आरती के शंखनाद,चोघड़ियाँ और घण्टों आदि का जो महाघोष होता उसे महालय से चार योजन दूर तक सुना जाता था।

राजा-महाराज ने दस हजार से अधिक गाँवों को सोमनाथ प्रभु को अर्पण किया था जिससे महालय का अक्षय कोस कभी भी कम नहीं होता था। महालय के गगनचुंबी शिखर पर एक विशाल स्वर्णकलश स्थापित था जिसके मध्य में भगवे रंग की ध्वजा फहराती थी जो दूर देशों के यात्रियों का मन बारम्बार अपनी और खींच लेता था....

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