चारागाहों की कमी और नित्य होते गोधनों पर जंगली पशुओं के हमले से रक्षा के लिए आभीरभानु वंश, नए गोकुल की तालाश में विन्दावन आ गए थे। स्त्रीत्व के सभी रूप,भाव-विभाव और गुणों की दीक्षा देने वाली श्रीकृष्ण की पहली महिला गुरु राधा से श्रीकृष्ण की मुलाकात यहीं हुई।
राधा-कृष्ण की निश्चल मैत्री पर भावमुग्ध होकर सम्पूर्ण वृंदावन के अरण्य, जीव-जंतु, गोप-सखा अपनी सुधि खोकर एकटक उनके अलौकिक वार्तालापों को स्तब्ध होकर सुनते रहते। राधा श्रीकृष्ण के लिए कभी सुंदर वनपुष्पों की माला लातीं तो कभी अरण्यों की वन लताओं से बना मुकुट। श्रीकृष्ण जब उस मुकुट को पहनते तो वहीं अरण्य में गिरे मोरपंखों में से एक सुंदर मोरपंख को उठा वह उस मुकुट पर लगा देतीं और अपनी सुधि खोकर एकटक कृष्ण को देखती रहती।
यह शरद पूर्णिमा की रुपहली रात्रि का दिवस था। वृंदावन की भावपूर्ण प्रथा के अनुरूप आज रास का आयोजन किया गया था। सम्पूर्ण वृंदावन, मधुवन में एकत्रित हो गया था। हर दिन की भांति राधा आज भी श्रीकृष्ण के लिए कुछ उपहार लायी थी।
राधा ने कृष्ण के हांथों को पकड़ कर अपने आद्र होते कंठ से कहा। कृष्ण! तुम मेरे आराध्य तो नहीं लेकिन मेरे सबसे प्रिय सखा हो। उसी सखा प्रेम के वसीभूत में तुम्हें नित्य ही कुछ अर्पण करती रहती हूं। लेकिन आज जो उपहार मैं तुम्हें अर्पित कर रही हूँ उसे तुम कभी स्वम् से दूर मत करना। मेरे प्रेम से अभिसिक्त यह माला तुम नित्य ही धारण करना। यह तुम्हें मेरी याद दिलाती रहेगी। राधा की भावमुग्ध नेत्र सजल हो गए थे।अपने हांथों से उस शुभ्र-धवल सुगन्धित पुष्प माला को कृष्ण के गले मे डालते हुए राधा धीमे स्वर में बोली, यह पुष्प माला मेरी वैजन्तीमाला है।भले ही भविष्य में तुम्हें अनेक रत्न प्राप्त होंगे पर यह माला उन सभी रत्नों को शोभित करती रहेंगीं।
दिन आगे बढ़े।अत्याचारी कंश से त्रस्त होती धरा को उसके पापों से मुक्त करने श्रीकृष्ण मथुरा की और निकल पड़े। रास्ते मे प्रतीक्षारत राधा मिलीं। श्रीकृष्ण ने कहा। मैं जा रहा हूँ राधा।लेकिन तुम्हारी वैजन्तीमाला जीवन के व्यूह को भेदने में अपनी शीतल उपस्थित से मुझे सदैव शिक्त रखेगी। मैं जब भी कभी विचलित हो जाऊंगा इस माला में सूक्ष्म रूप से विराजित तुम्हारी ज्ञानगंगा मुझे विजय का मार्ग प्रदर्शित करती रहेगी। यह वैजयंतीमाला मेरे लिए विजय की माला होगी।
कालचक्र का पहिया आगे बढ़ता गया गुरुकुल की शिक्षा प्राप कर लौटते हुए श्रीकृष्ण सभी आभूषणों को दान कर देते हैं और प्रश्ननवदन होकर वैजयंतीमाला पहन मथुरा लौटते हैं। जरासन्ध वध के लिए भीम को संकेत के रूप में वैजयंतीमाला पर हाँथ फेरते हैं। पांडवों द्वारा आयोजित राजसूय यज्ञ के लिए यज्ञवेता श्रीकृष्ण सुसज्जित होकर अपने अंतिम श्रृंगार में वैजयंतीमाला पहनते हैं। शिशुपाल के निन्यानबे अपशब्दों को वैजयंतीमाला के शीतल स्पर्श से आत्मसात करते रहते हैं।
इन सबों के बीच श्रीकृष्ण जब कभी भी आंखें मूंद ध्यानस्थ होते हैं तो उन्हें यह वचन याद आता रहता है। "मैं तुम्हारे इस भाव उपहार को कभी नही भूलूंगा। एक गोप मुखिया के पुत्र के नाते, एक गोपाल के नाते, मुरली बजाने वाले मुरलीधर के नाते, यशोदा माता के पुत्र के नाते, कन्हैया के नाते....." आँखें खोलते हैं और वैजयंतीमाला को स्पर्श कर मन्द मुस्कुराते रहते हैं...