मंगलवार, 21 अगस्त 2018

वृद्धाश्रम

दादी और पोती की वृद्धाआश्रम वाली तस्वीर सुबह से ट्रेंड ही पर है औऱ भावुक करने वाली भी ।

शहर और शहरी संस्कृति में रमे लोगों के लिए अब ये आम बात हो गई है । अमूमन शहरों की औसत साक्षरता दर अधिक होती है । जब लोग ज्यादा पढ़ लिख लेते हैं तो उन्हें अपने सभ्य होने का एहसास होने लग जाता है । और जब लोग सभ्य हो जाते हैं तो उनके सोचने का दायरा बढ़ जाता है । उनकी पहली प्राथमिकता खुलेपन की होती है । (मैं यहाँ अभद्र नहीं होना चाहूंगा) ।

समय के साथ परिवार बढ़ता है लेकिन जो नहीं बढ़ता है वो रहने का स्थान (स्क्वायर फीट में )और घर की चारदिवारियाँ । पहले स्थान पर विराजमान खुलापन और स्वछंदता अपने और अपने लोगों की आहुति मांगती है और आहुति दे दी जाती है ।

और फ़िर मर जाते हैं ऐसे अनमोल रिश्ते जो बेमोल हैं । शुक्रिया इन सब बातों से गावँ-घर के लोगों को कोई सरोकार नहीं है । गावँ आज भी बचा हुआ है इस प्राणघातक महामारी से ।

सोमवार, 8 जनवरी 2018

मेरा मधुपुर

इक दोपहर का क़िस्सा है जब शहर वो हमने छोड़ा था ,
उसके बाद कुछ ऐसी बीती शाम शराबों के थे हम ।

जौन एलिया के इस शेर को पढ़ते पढ़ते आज फ़िर से अपना मधुपुर सामने है ।

छोटा शहर, बड़े शहरों के आगे  मजबूर होता है या यूँ कहें कि वह बड़े शहरों का गुलाम होता है । ठीक वैसे ही जैसे  इतिहास में छोटे प्रान्त बड़े प्रान्तों  के सम्मुख लगभग हर मामले में मजबूर हुआ करता था । छोटे शहर को ना चाह कर भी बड़े शहरों की जी हुजूरी करनी ही पड़ती है । कारण यह है कि छोटा शहर अपने क्षेत्र में आने वाले सभी जनसंख्या को भरपेट भोजन , आवास और रोजगार की सुविधा उपलब्ध  करा ही नहीं सकता है ।

आज से तकरीबन  11 साल पहले मेरे भी छोटे से शहर ने मेरे सामने भी अपनी मजबूरी रुंधे गले से गिड़गिड़ाते हुए मुझे बोल दिया था और बिना मेरे पक्ष को सुने हुए उसने एक तरफ़ा आदेश पारित कर दिया था । मुझे शहर निकाला हुआ था ।

मैं बाध्य था ,मेंरे पास कोई ऑप्शन नहीं बचा था, क्योंकि बिहारी आदमी नॉक़री नहीं करेगा तो खायेगा क्या ?(खास करके सरकारी नॉकरी क्योंकि इसकी तैयारी में नाममात्र के पैसे खर्च होते हैं) ।  ये यक्ष प्रश्न आज भी यथास्थान विराजित है ।

घूमते भटकते आज वहाँ पहुँच गया हूँ जहाँ भीड़ ही भीड़ है । इतना कि कोई हिसाब किताब नहीं है । इस बड़े से शहर ने देश के लगभग सभी छोटे शहरों के मजबूरी को समझा तो है पर खुद बर्बाद हो गया है । सांस लेने में सांस अटक सी जाती है । मुझे किराए से ख़रीदी हुई हर चीज से नफ़रत है जिसके जिक्र फ़िर कभी ।

फिलहाल , 10 मिनट मैंने अपनी आँखों को  बंद किया था और  घूम आया था तुम्हारी गलियों में और याद आया कि :

बेक़रारी सी बेक़रारी है ,
वस्ल है और फ़िराक तारी है ।

शौक की इक उमीदवारी है ,
वरना किसको ख़बर हमारी है ।

जो गुज़ारी न जा सकी हमसे ,
हमने वो ज़िन्दगी गुज़ारी है ।

बिन तुम्हारे कभी नहीं आई,
क्या मेरी नींद भी तुम्हारी है ।

मंगलवार, 28 फ़रवरी 2017

क्या कहूँ

एक प्रश्न है , सडा - पचा है ,आप इसे यक्ष प्रश्न भी कह सकते हैं , की क्या,देश के सारे बुद्धिजीवी छात्र  कुछ चुनिंदा विश्वविद्यालयों में ही पड़ते हैं ? की क्या सारे ब्यूरोक्रेट्स यहीं से पास आउट होते है ?की क्या सारे इंडस्लिट्रीयलिस्ट यहीं की डिग्री ले के देश की अर्थव्यवस्था में रीढ़ की हड्डी के रूप में स्थापित होते हैं । सारे डॉक्टर, इंजीनयर , चार्टेड अकाउंटेंट , शिक्षक फार्मासिस्ट, मैनेजमेंट कर्ता   सब के सब यहीं से पासआउट हुवे होते हैं क्या ?

नहीं ना !

ये ठीक है की यहाँ शिक्षा का स्तर देश के अन्य विश्वविद्यालयों की तुलना में कहीं ज़्यादा मजबूत और सुदृढ़ है , तुम सब जो यहाँ पढ़ते हो सामान्य से ज़्यादा मेधावी हो , और कुछ विशेष गुणसंपन्न भी हो , जिन्हें अपने वर्तमान और अपने भविष्य की चिंता छोड़ अपने कौम और अपने मज़हब की चिंता ज्यादा होती है । जिन्हें अपने अभिव्यक्ति के आज़ादी की चिंता ज्यादा होती है , जिन्हें "बोल की लब आज़ाद हैं तेरे " वाला जुमला ज्यादा पसंद होता है ।
पर इसका कहीं से ये मतलब नहीं निकलता है की देश के बाकि बचे विश्वविद्यालयों में भूसगोल छात्र ही पड़ते हैं , यहाँ के ख़ान से भी   वो सारे हिरे निकलते हैं जिनकी देश को ज़रूरत होती है , ऐसा नहीं है की पढ़ाई के दौरान उन्हें अपने वर्तमान और भविष्य की चिंता नहीं रहती है । ऐसा नहीं है की उन्हें अपने अभिव्यक्ति  की आज़ादी के प्रति सवेंदनशीलता नगण्य होती है , ऐसा नहीं है की छोटे मोटे  झगड़े यहाँ नहीं होते है ,होता है सब कुछ होता है ,  पर यहाँ तुम्हारे तरह का ज़ाहिलपना नहीं होता है , यहाँ के छात्र को आज भी अपने गार्जन के पास अपनी शिकायत चले जाने का डर रहता है ,  और असल बात ये है की ये सभी अपने आप को उतने शिक्षित नहीं मानते हैं की अपने अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए अपने देश और राष्ट्र के प्रति ही अपना स्वर मुखर कर ले ।

हाँ एक बडी समस्या ये ज़रूर हो रही है की तुम्हारे इस निराधार विरोध के ज़हर की तपिस अब कुछ छोटे मोठे और शांत से रहने वाले विश्वविद्यालयों में भी देखि जाने लगी है जो निश्चित ही चिंताजनक स्थिति है ।

तुम एलीट टाइप के छात्र से तो कोई अनुरोध भी मात्र बेवकूफ़ी ही है , हाँ उन छोटे तामाम विश्विद्यालयों के छात्रों से तो सरकार को वार्तालाप ज़ारी रखनी चाहिए जिन्हें वास्तविक रूप से इस देश के प्रति सम्मान है , जो वास्तविक रूप से देश के निर्माण में अपनी महवत्पूर्ण भूमिका निभाने वाले है , और जिन्हें आज भी अपने देश के प्रति अपने राज्य के प्रति , अपने परिवार के प्रति सम्मान है और जो इन घनघोर रूप से राष्ट्रविरोधीयों के नज़र में पहले निवाले के रूप में देखे जा रहे हैं !!

रविवार, 26 फ़रवरी 2017

डर बनाम मज़बूरी

डर बनाम मज़बूरी
(चेचरि पूल)

जब आपका गला सुखने लगता है , छाती भारी होने लगता है ,  हिम्मत एक क़दम आगे चल कर दो क़दम पीछे सरका लेता है , ज़मीन  आगे चलने लगती है और आप पीछे खिसकने लगते हैं । आप  हिम्मत की पीठ को हल्के हाथों से थप-थपाते हैं और कहते हैं तुम कर सकते हैं। 

अबे ! नहीं  होगा मुझसे यार ! हिम्मत आपके हाथ को झिड़कते हुवे जवाब देता है ।

देखो  बाकि लोग भी कर रहे हैं , तुमसे दुबले , तुमसे छोटे , तुमसे मोटे  , औरत और बच्चे भी ! 

अनपढ़ हैं सब के सब गँवार हैं  , कोई अपना दिमाग़ नहीं लगा रहा है  , जान जोखिम में डालना कोई हिम्मत का काम है ! देखो तो  पैर कैसे फ़िसल रहा है , गिरे तो गए । मरना तय है ।

अबे देख यार वो 8 महीने की गर्भवती महिला अपने तिन साल के लड़के को गोद में उठा के अपना संतुलन बनाये इतने आत्मविश्वास के साथ आगे बढे हुवे आ रही है , फ़िर तुम तो फिट फोर हो ।

हिम्मत मुँह चिढाता है  , उसके मर्दाने अहम के गालों पर यह ज़ोरदार चाटा  था । अपनी सारी हिम्मत बटोर कर हिम्मत आगे बढ़ता है ।

"चेचरि पूल " पर उसके पड़ते हुवे क़दम से उठते आवाज़ और पूल में उठे कंम्पन्न को नजरअंदाज करते हुवे अब वह बीचो- बिच था , पानी की तेज़ बहाव पर नजरें गयी  । वह सन्न सा रह गया , डर विकराल जाल लिए उसे चारों ओर से घेरने लगा था , पैरों में फ़िसलन ज़्यादा महशूस होने लगी थी । चार फ़िट का एकतरफ़ा रास्ता जिसका वज़ूद नदी के तेज़ बहाव के बिच बांस के बल्लियों के सहारे टिका हुवा था मरात्तक भय को जन्म दे रहा था । वह किमकर्त्तव्य विमूढ़ सा था , पीछे वह लोट नहीं सकता था और आगे जाने की हिम्मत उसमे बची नहीं थी ।
पूल में एकाएक कम्पन्न तेज उठने  लगी थी ।  पीछे क़रीब दस और लोग आ गए थे । जान बचानी थी तो आगे बढ़ना था । अब कोई स्पेस बचा नहीं था स्केप करने के लिए । टाईम था  डर पर हिम्मत के हावी होने का , और फिर कुछ वैसा ही हुवा , डर भागते हुवे भूत  की तरह  पीछे छूटता जा रहा था , जूते की फ़िसलन ग़ायब थी पूल स्थिर हो गया था । थोड़ी देर में उसके पैरों के निचे स्थिर ज़मीन थी ।

जीत डर के स्थाई हार पर अट्टहास करने लगा था । पीछे मुड़ कर चेचरि पूल पर लोगों को आते जाते गौर से देखा , हर चेहरा डर पर स्थाई जित की गवाही दे रहा था ।

फ़िर कुछ देर और विचार किया गया कहीं यह मज़बूरी तो नहीं ?
कौन आपने जीवन को जोखिम में डालता है , हिम्मत ने प्रचंड आवाज़ से उत्तर दिया !

अब आगे बढ़ने का समय था ।

शनिवार, 26 नवंबर 2016

जमीन बेची जा सकती है

कुत्ते को लड़ते कभी ना कभी तो देखा ही होगा आपने ,  थोडा सोचिये तो कैसे चेहरा बनाता है , दाँत बाहर मुँह खुला, जीभ बाहर ,  हल्ला करते हुए एक दसरे पर हावी होने की भरजोर कोशिश। कई मुहावरे भी बने इनके लड़ाई पर , सोचने से हँसी तो आती है  की कुत्ते की तरह क्यों हल्ला कर रहे हैं । खेर हल्ला से ध्यान आया  दो तीन दिन पहले झारखंड विधान सभा में  CNT- SPT संशोधन विधेयक पर मचे शोर-शराबै , हो -हंगामे , कुर्सी फैंक परफॉर्मेन्स पर । वही स्थिति  थी , मुँह खुला ,  दाँत बाहर , जीभ बाहर ,   हल्ला करते हुए एक दूसरे पर हावी होने की भरपूर कोशिश ! अंग्रेज़ो ने यह नियम बनाया था की छोटानागपुर और संथाल परगना के आदिवासियों के जमीन को ना तो खरीदा जा सकता है और ना ही  बेचा जा  सकता है।  समय बदला नियम बदले , संशोधन हुए और आज भी संशोधन जारी है । समय बदला लोग बदले पर एक चीज जो नहीं बदली वो ये की जमीन पहले भी बेचे जाते थे, आज भी बेचे जा रहे हैं और आगे भी बेचे जाते रहेंगे । बस अंतर ये हो गया है की आम बोलचाल की भाषा में  जमीन की क़िस्म दो तरह की हो गयी है । सेलेबल और नोनसेलेबल।  (नोंनसेलबेल जमीन खरीददार को  90 सालों के लिए लीज़ पर दिया जाता है और बाद में यह फिर से उसके असल मालिकाना हक रखने वाले के पास आ जाता है । यह एक वैधानिक नियम है पर असल में प्रयोग होता नहीं है )। अधिकांश छोटे  जिले, अनुमण्डल,  कस्बे  का बड़ा हिस्सा  नोंनसेलेबल जमीन पर बसा हुआ है या बसने की तैयारी कर रहा  है । गांव से पलायन जारी है , शहरीकरण जारी है , सेलेबल जमीन घट रहे हैं तो लोग जाये तो कहा जाये , फिर चाहे जमीन संथाल की हो या किसी और की । एक बात और की इसमे हर्ज़ कहाँ है और किस हिसाब से है, की लोग कुर्सी फैकने और मारने मारने पर आमादा हो गए हैं।

जब सेलेबल जमीन के मालिकाना हक रखने वाले उसे अपनी जरूरत के हिसाब से बेच सकते हैं तो फिर नोंनसेलबेल वाले क्यों नहीं ?? एक महत्वपूर्ण बात ये  की जमीन अगर नॉनसेलेबल हुई तो कीमत सीधे आधी  भले ही वह बाजार के कितने ही पास क्यों न हो अगर बेचने वाले की जरुरत भी हो तब भी उसे ठीक दाम नहीं मिल पता है , और हाँ जो लोग हल्ला - चिल्ला कर रहे थे ना' यकीं मानिये उनके पास भी जमीन है वो भी नोंसेलबेल वाली जिनका मालिकाना हक किसी दूसरे के पास ही है  । खेर संशोधन जरुरी है और जारी रहना चाइये यह अच्छा है खरीदने वाले के लिए और बेचने वाले के लिए भी !

मंगलवार, 22 नवंबर 2016

नोकरी उर्फ नोकर

यह ठीक है की  कफ़न में जेब नहीं होता है और कोई  कितना ही क्यों न कमा - धमा ले कोई लाद बोज के साथ तो  ले जाता नहीं ।   सब कुछ यही छुट जाता है , सब के अलावे  केस, फरियाद, मुकदमा, झगड़ा, झमेला , भी । कुछ  दुआ और इज्जत  ले जाते हैं  और बाकि बचे  बोरी भर कर गालि और गलौज ( लोगों का बस चले तो जूतम -पेल भी साथ में भेज दें) । कुछ थोड़े लोग बहुतो के लिए बहुत कुछ छोड़ जाते है जिसे लेकर लोग, समुदाय , गाँव, क़स्बा ,शहर, राज्य और देश आगे बढ़ता रहता है , ये अलग बात है की सोनिया पप्पू को छोड़ रही है और अमेरिका ट्रम्प को ! खैर इस भिष्ण गूढ़ ब्रम्ह ज्ञान का आभास होते हुए भी, और इस चिंता को दरकिनार करते हुए की लोग मेरे जाने के बाद मेरे साथ में क्या दे के भेजेंगे ,  "घर" और बुजुर्ग होते माता पिता को  छोड़ कर नोकरी पर जाने के अलावे कोई और दूसरा विकल्प नहीं बचता है । पिछले 10 सालों के दौरान जब -जब नोकरी के लिए घर को छोड़ता हूँ ,कसम से (आप चाहे जो भी कसम खिला लें हम खा लेंगें) मन भारी हो जाता है , लगता है घर, घर नही रहा मायका हो गया है । एक बात जो दिल और दिमाग को हमेसा चुटकी काटते रहती है वो ये की बेटा ये नहीं करोगे तो खाओगे क्या और खिलाओगे क्या ???? तुम्हारे पास इसके अलावे है  क्या ???? यक्ष प्रश्न सामने  !! जवाब ढूँढने की कोसिस होती है , उत्तर आता है :- पापा की  नोकरी ; ना वो उनकी है , खेती ; वो तो भगवान भरोसे है अगर थोडा बहुत हो भी जाता है तो थोडा ही है !   बाकि कुछ बचता नहीं है । दिमागी युधिस्ठिर शांत , निःशब्द और मौन रह जाता है । यक्ष जीत जाता  है ।  दिमाग दिल के भावनावों को रौंदते हुए ममता के बंधन को क्षत -वीक्षत करते हुए यह एकल आदेस पारित करता है की मोह मोह के धागे को तोड़ो और अपनी लुटिया समेटो । 

बचपन से ही दिमाग में एक चीज भर दी जाती है अपने यहाँ  बड़े हो के नोकरी करना  पड़ेगा , बहार रहना होगा , सब तरह से तैयारी करना है, नहीं तो भूखे मारोगे , कोई दूसरा उपाय नहीं है । बस वही किये जा रहा हूँ ।  जी रहा हूँ बस जिए जा रहा हूँ ।

शनिवार, 5 दिसंबर 2015

सोसल मीडिया

कितना  कुछ  अच्छा  भी हुआ  है ना सोशल  मीडिया  के पदार्पण  से !

जिन्दगी  की भागमदौड में  भागते  हुए  थक कर जब कभी  आप चैन की साँस  लेते  हुए  कुछ  सुकून  भरे  पल  बिताते  हैं  और आपकी  स्मृतिपटल  की कुछ   सुनहरी , स्वर्णिम  और रुहानी  स्मृतियाँ  ,जिसे आपने  रत्न  जडित चँन्द्रहार की भांती  संजो के रखना चाहा होगा आपके  दृष्टिपटल पर चलचीत्र की भांती  सिलसिलेवार तरीके  से दृष्टिगोचर होने  लगती है तो फिर  क्या कहने  ।

हर तरफ गीत - संगीत  का जलसा  कुछ यूँ चल पड़ता है ।

"हाले दिल को सुकूँ चाहिए ,  दूरी  की आरजु चाहिए  ।
जैसे पहले  कभी कुछ  चाहा नहीं  ,
दिल को तेरी  मौजूदगी  का एहसास यूँ  चाहिए  ।।

परदे  पर बदलते  मँजर के साथ  - साथ  आपके  उमंगों का तरंग पूर्ण  विक्षोभ के साथ  आपको  मस्त  करता  जाता  है ।
हंलाकी यादों  के रुहानी सफर से आप वापस  नही लौटना  चाहते  होंगे  लेकिन  वक्त  का हंसी सितम  भी तो देखीए , लौटना  ही  पड़ता  है । सुनहरी  यादें , डायरी  के  पन्नों  में  सिमटकर फिर  से बंद  हो जाती  है । जिन्दगी चल पड़ती  है  अपने  रफ्तार  पर ,अपने  रूप  में  ,अपने  रंग  में  •••• फिर  से भागमदौड भरे  सफर पर ।

कुछ  निश्चित अंतराल  पर सोसल मीडिया  (फेसबुक )आपके  व्यस्त्तम जिवन में  दखल देते हुए अपनी और ध्यान  खींच  कर   ( today you hav memory with ........  ) फिर  से वही सुनहरी  यादों  को सामने  लाता  है  और  फिर......  वही कर्तराल ...... वही राग ......वही  संगीत......। भागती हुई  जिन्दगी  में  थमे  हुए  आप ।

महाभारत  कालीन  धृतराष्ट्र - संजय  प्रसंग   की यादें  उस समय  और भी ताजा हो जाती  है , जब कुछ  विशेष  आयोजन  में  आपकी  उपस्थिति  अनिवार्य  रहती  है और आपके  उपस्थित रहने  के  इच्छा  के विरुद्ध  आप  चाह कर भी  हाजिर   नहीं  हो पाते हैं  , महाभारत  कालीन  संजय का अभिनय  भी सोसल मीडिया दूर बैठे  हुए  सारे  आख्यानों को सचित्र सूनाया करता  है ।

मंगलवार, 24 नवंबर 2015

चतुर्थी का चँद्रमा

रात के 12:30 बज चुके  हैं , नींद बेमानी  के मुड़  में  है । कहते  हैं  :-

नींद आधी मौत है ,
और
मौत मुक्कमल़ नींद है ।

पर यहाॅ न तो नींद आ रही है और
खैर दुसरे के बारे में कौन सोचना चाहता है ।

बालकनी में  बैठे  प्रकृती के नयनाभिराम दृश्य का अवलोकन  शाश्वत  शांति  की अथाह अनुभूति प्रदान कर रही  है ।

चतुर्थी  का चँद्रमा इस रात की पूरी  जवानी  पर अपनी  चाँदनी का साथ मस्त  है । कल आने वाले पुर्णीमा का इंतजार,  जिसमें उसे पुर्ण स्वरूप की प्राप्ती होगी और जिसे  पाने के लिए  उसने ना जाने  कितने ही घनघोर काली  रातों  का हलाहल सहर्ष स्वीकार किया  होगा, उसे बेसब्री से बेसब्र किया  जा रहा है ।
गुलाबी  सर्द सही मायनों  में  गुलाबी  होती  है इस बात  का प्रमाण गुलाब  की गुलाबी  खुशबू  दे रही है जिसे  आँगन के दूसरे  छोर से आती गेंदे की मीठी  खुशबू  लगातार  चुनौती  दिये जा रही  है ।

सागोन के दो ऊँचे  दरख्त जिसकी  छंटाइ हाल ही में  हुई  है अपना  गर्दन उठाये समाज में  अपनी  समुचित  उपस्थिति  सामने  खड़े  कदम्ब के  दो वयस्क  वृक्षों को चुनौती  पुर्ण तरीके  से दे रहा है ।

तुलसी  पिण्ड की तुलसी  अपनी  महिमा  का बखान  करते हुए  हमें  आस्तीक बने रहने  के लिए  प्रेरीत कर रही  है ।

धरा श्वेत  चाँदनी से जगमगा रही है,  ओश की छोटी -छोटी  बुन्दें जो अब दुब घास पर  अपना  आकार ले चुकी  है मोतीयों की चमक बिखरे  रही है ।

जिव,  जन्तु, पेड़, पोधे,  पुष्प, कलियाँ, सजीव और निर्जिव, ममता स्वरूपी धरा सभी को अपने  आँचल में  समेटे,    शांति  के आगोस में  लीन हुए  जा रही है । शांति .......  शाश्वत  शांति ....... ।

और मैं अपने  बालकॅनी से बैठे  हुए  प्रकृती की इस अनुपम  सुंदररता को निहारते हुए  अविभुत होता जा रहा हूँ  ।

गुरुवार, 19 नवंबर 2015

चलंत दुकानें

अपने  बाजार, कस्बे,  गली,  मोहल्ले  मे घुमते   हुए आप की नजर उन तमाम  चलंत,  छोटे,  बड़े   दुकानों (खाने -पीने )  यंहा तक रेस्तराँ के मुल्य तालिका   के उपर लिखे  जुमले पर जाती  ही होगी  जिसमें  किसी  क्षेत्र विशेष  के विशिष्ठ पकवान का जिक्र  उसी  क्षेत्र  के विशिष्ठ प्रादेशिक शब्दों  का काॅपी - पेस्ट  कर कुछ  यूँ   काया जाता है  " मारवाड आइसक्रीम  ",  " आगरे का पेठा",  बनारसी पान,  " कोलकतार रसगुल्ला  और ना जाने कितने । कुछ विशेष  सहरों से जुड़े  ये वो कुछ विशेष   चुनिंदा व्यंजन हैं   जिसके नाम से भी  लोगों  के  दिलो -  दिमाग में  स्वाद की एक मीठी   खुशबू  की लहर सी दौड़  पड़ती है, भले  ही  क्यों ना उन सभी  व्यंजनों को बनाने  में  सम्मील्लीत लोग,  प्रयुक्त  सामग्री,  बनाने  की विधि  और यहाँ  तक की जायका भी वहीं  का होता है, असल में  जहाँ  उसे बनाया  जा रहा होता है,  कई  दफा स्वादिष्ट,  कई दफा बहुत  स्वादिष्ट और  कई दफा  बिलकुल  नया जो अपने वास्तविक  स्वरुप,  रूप ,  रंग और जायके से बिलकुल  भिन्न होता  है ।

गर  लोगों के बीच व्यजनों  के  नामकरण  की काॅपी - पेस्ट  वाली  अवधारणा  समाप्त  होकर,   क्षेत्रीय नामकरण की  परीपाटी शूरु हो जाय तो यकीन  मानीए  कई  राज्यों की कई ऐसी  चीजें  मसहूर  हो जाऐंगी जिसे  खाकर  आप भी तृप्त महसूस  करेंगे  ।।

बुधवार, 18 नवंबर 2015

बचपन

प्रेरनादायी है यह बचपन ।।

वह उठता  है, चलता है, चलने  की कोशिश  में  गिरता  है, गिरते  हुए  फिर  उठता  है और तब तक शतत् प्रयासरत रहता  है,  जब तक वह निर्बाध रूप  से दौड़ने  नहीं  लगता  है । अपने  लक्ष को पाने  की उत्कट इच्छाशक्ति नींद  में  भी उसके नन्हें पैरों को चलाते  रहने  के लिए  आदेशीत करता रहता है ।

वह  क्षमा करता है बेसर्त,  खुशियाँ देता है हर वक्त,   क्षमा मानो उसके स्वभाव में  रचा-बसा है । एक  मुस्कान भी प्रयाप्त सा  है  उसके विरूद्ध हर अपराध  के एवज में  ।  कहते  हें ईश्वर  के बनाए  36 गुणों  में  क्षमा का स्थान सर्वोपरि  है  जिसे  वह अपने  करीब रहने वालों  को ही  प्रदान करता  है ।

वह सबको प्यार देता है बिना किसी  अभिलाषा  के और सबसे  प्यार लेता है बिना  किसी  आकांक्षा  के  ।

हम आप सभी के बीच  रहते  हुए   नन्हा  सा जान जिसे  आप छोटकु,   बाबू,  बेटु और ना जाने  कितने  नामों  से पुकारते हैं,   प्रेरणा का ऐसा  दीपक  है जो अपने  निश्छल,  निर्मल प्रकाष से  आपको  नित -निरंतर प्रकाषित करते हुए ,   सरल,  सहज,  निश्छल,  निष्कपट और मासूम  बने रहते  हुए  लगातार आगे बढ़ने  के लिए   प्रेरित करता है जिसे हम  बढते  उम्र,  धन,  पद और प्रतिष्ठा के  साथ ना जाने क्यों और किसलिये  छोडते जाते हैं  ।

किस बात का है ताना -बाना ।
एक दिन तुझे  तो एक  दिन  मुझे  भी जाना  ।।