मंगलवार, 24 नवंबर 2015

चतुर्थी का चँद्रमा

रात के 12:30 बज चुके  हैं , नींद बेमानी  के मुड़  में  है । कहते  हैं  :-

नींद आधी मौत है ,
और
मौत मुक्कमल़ नींद है ।

पर यहाॅ न तो नींद आ रही है और
खैर दुसरे के बारे में कौन सोचना चाहता है ।

बालकनी में  बैठे  प्रकृती के नयनाभिराम दृश्य का अवलोकन  शाश्वत  शांति  की अथाह अनुभूति प्रदान कर रही  है ।

चतुर्थी  का चँद्रमा इस रात की पूरी  जवानी  पर अपनी  चाँदनी का साथ मस्त  है । कल आने वाले पुर्णीमा का इंतजार,  जिसमें उसे पुर्ण स्वरूप की प्राप्ती होगी और जिसे  पाने के लिए  उसने ना जाने  कितने ही घनघोर काली  रातों  का हलाहल सहर्ष स्वीकार किया  होगा, उसे बेसब्री से बेसब्र किया  जा रहा है ।
गुलाबी  सर्द सही मायनों  में  गुलाबी  होती  है इस बात  का प्रमाण गुलाब  की गुलाबी  खुशबू  दे रही है जिसे  आँगन के दूसरे  छोर से आती गेंदे की मीठी  खुशबू  लगातार  चुनौती  दिये जा रही  है ।

सागोन के दो ऊँचे  दरख्त जिसकी  छंटाइ हाल ही में  हुई  है अपना  गर्दन उठाये समाज में  अपनी  समुचित  उपस्थिति  सामने  खड़े  कदम्ब के  दो वयस्क  वृक्षों को चुनौती  पुर्ण तरीके  से दे रहा है ।

तुलसी  पिण्ड की तुलसी  अपनी  महिमा  का बखान  करते हुए  हमें  आस्तीक बने रहने  के लिए  प्रेरीत कर रही  है ।

धरा श्वेत  चाँदनी से जगमगा रही है,  ओश की छोटी -छोटी  बुन्दें जो अब दुब घास पर  अपना  आकार ले चुकी  है मोतीयों की चमक बिखरे  रही है ।

जिव,  जन्तु, पेड़, पोधे,  पुष्प, कलियाँ, सजीव और निर्जिव, ममता स्वरूपी धरा सभी को अपने  आँचल में  समेटे,    शांति  के आगोस में  लीन हुए  जा रही है । शांति .......  शाश्वत  शांति ....... ।

और मैं अपने  बालकॅनी से बैठे  हुए  प्रकृती की इस अनुपम  सुंदररता को निहारते हुए  अविभुत होता जा रहा हूँ  ।

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