मंगलवार, 22 नवंबर 2016

नोकरी उर्फ नोकर

यह ठीक है की  कफ़न में जेब नहीं होता है और कोई  कितना ही क्यों न कमा - धमा ले कोई लाद बोज के साथ तो  ले जाता नहीं ।   सब कुछ यही छुट जाता है , सब के अलावे  केस, फरियाद, मुकदमा, झगड़ा, झमेला , भी । कुछ  दुआ और इज्जत  ले जाते हैं  और बाकि बचे  बोरी भर कर गालि और गलौज ( लोगों का बस चले तो जूतम -पेल भी साथ में भेज दें) । कुछ थोड़े लोग बहुतो के लिए बहुत कुछ छोड़ जाते है जिसे लेकर लोग, समुदाय , गाँव, क़स्बा ,शहर, राज्य और देश आगे बढ़ता रहता है , ये अलग बात है की सोनिया पप्पू को छोड़ रही है और अमेरिका ट्रम्प को ! खैर इस भिष्ण गूढ़ ब्रम्ह ज्ञान का आभास होते हुए भी, और इस चिंता को दरकिनार करते हुए की लोग मेरे जाने के बाद मेरे साथ में क्या दे के भेजेंगे ,  "घर" और बुजुर्ग होते माता पिता को  छोड़ कर नोकरी पर जाने के अलावे कोई और दूसरा विकल्प नहीं बचता है । पिछले 10 सालों के दौरान जब -जब नोकरी के लिए घर को छोड़ता हूँ ,कसम से (आप चाहे जो भी कसम खिला लें हम खा लेंगें) मन भारी हो जाता है , लगता है घर, घर नही रहा मायका हो गया है । एक बात जो दिल और दिमाग को हमेसा चुटकी काटते रहती है वो ये की बेटा ये नहीं करोगे तो खाओगे क्या और खिलाओगे क्या ???? तुम्हारे पास इसके अलावे है  क्या ???? यक्ष प्रश्न सामने  !! जवाब ढूँढने की कोसिस होती है , उत्तर आता है :- पापा की  नोकरी ; ना वो उनकी है , खेती ; वो तो भगवान भरोसे है अगर थोडा बहुत हो भी जाता है तो थोडा ही है !   बाकि कुछ बचता नहीं है । दिमागी युधिस्ठिर शांत , निःशब्द और मौन रह जाता है । यक्ष जीत जाता  है ।  दिमाग दिल के भावनावों को रौंदते हुए ममता के बंधन को क्षत -वीक्षत करते हुए यह एकल आदेस पारित करता है की मोह मोह के धागे को तोड़ो और अपनी लुटिया समेटो । 

बचपन से ही दिमाग में एक चीज भर दी जाती है अपने यहाँ  बड़े हो के नोकरी करना  पड़ेगा , बहार रहना होगा , सब तरह से तैयारी करना है, नहीं तो भूखे मारोगे , कोई दूसरा उपाय नहीं है । बस वही किये जा रहा हूँ ।  जी रहा हूँ बस जिए जा रहा हूँ ।

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