अपने बाजार, कस्बे, गली, मोहल्ले मे घुमते हुए आप की नजर उन तमाम चलंत, छोटे, बड़े दुकानों (खाने -पीने ) यंहा तक रेस्तराँ के मुल्य तालिका के उपर लिखे जुमले पर जाती ही होगी जिसमें किसी क्षेत्र विशेष के विशिष्ठ पकवान का जिक्र उसी क्षेत्र के विशिष्ठ प्रादेशिक शब्दों का काॅपी - पेस्ट कर कुछ यूँ काया जाता है " मारवाड आइसक्रीम ", " आगरे का पेठा", बनारसी पान, " कोलकतार रसगुल्ला और ना जाने कितने । कुछ विशेष सहरों से जुड़े ये वो कुछ विशेष चुनिंदा व्यंजन हैं जिसके नाम से भी लोगों के दिलो - दिमाग में स्वाद की एक मीठी खुशबू की लहर सी दौड़ पड़ती है, भले ही क्यों ना उन सभी व्यंजनों को बनाने में सम्मील्लीत लोग, प्रयुक्त सामग्री, बनाने की विधि और यहाँ तक की जायका भी वहीं का होता है, असल में जहाँ उसे बनाया जा रहा होता है, कई दफा स्वादिष्ट, कई दफा बहुत स्वादिष्ट और कई दफा बिलकुल नया जो अपने वास्तविक स्वरुप, रूप , रंग और जायके से बिलकुल भिन्न होता है ।
गर लोगों के बीच व्यजनों के नामकरण की काॅपी - पेस्ट वाली अवधारणा समाप्त होकर, क्षेत्रीय नामकरण की परीपाटी शूरु हो जाय तो यकीन मानीए कई राज्यों की कई ऐसी चीजें मसहूर हो जाऐंगी जिसे खाकर आप भी तृप्त महसूस करेंगे ।।
गुरुवार, 19 नवंबर 2015
चलंत दुकानें
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