शुक्रवार, 29 मार्च 2024

शेनवार्न वाज ❤️

मुझे क्रिकेट से परिचय कपिलदेव की उपलब्धियों ने कराया था। क्रिकेट के प्रति प्रेम सचिन ने जगाया, लेकिन क्रिकेट का सम्मोहन शेनवार्न को खेलते देखकर जकड़ने लगा था। यूँ तो वो स्थूल रूप में अब क्रिकेट को नहीं खलते हैं लेकिन शुक्ष्म रूप से वो क्रिकेट की दुनियाँ में हमेशा विद्यमान रहेंगें। यह लेख पिछले साल लिखा था, आज याद आया तो यहाँ भी लगा दिया ताकि यह यहाँ स्थायी भाव से वार्न की याद दिलाता रहे। 

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क्रिकेट तिलिस्म की दुनियाँ है। अगले ही गेंद पर यहाँ क्या कहानी बन जाय यह कह पाना तिलिस्मी दरवाजे के चाभी को खोज लाने जैसा ही है।बावजूद इसके इस तिलिस्म के मायाजाल को तोड़ने के लिए यहाँ कई जादूगर आये जिन्होंने अपने सम्मोहन की माया से अगली ही गेंद पर खेल की दशा और दिशा को अपने हिसाब से तोड़ा और मरोड़ा। शेनवॉर्न क्रिकेट के वही जादूगर थे जिनके जादू के तिलिस्म की कहानियां आने वाली पीढ़ियों को पढाया और सुनाया जाता रहेगा। 

शुरुआत किस ठौर से करूँ यह ठीक से निर्धारित नहीं कर पा रहा हूँ  लेकिन यह सर्वविदित सत्य है कि ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट टीम जब विश्वविजय के अश्वमेध घोड़े पर सवार होकर सरपट दौड़ा करता था, उस कालखंड का अगर मूल्यांकन हो तो, ऐडम गिलक्रिस्ट, मैथ्यू हैडन, रिकी पोंटिंग,एंड्रयू सायमंड्स, माइकल क्लार्क, ब्रेट ली,गिलेस्पी, ग्लैन मेग्रा और शेन वार्न इस सुनहरे कालखण्ड के वो कोहिनूर थे जिन्होंने दुनियाँ के हर क्रिकेटरों को चकित होने पर विवस किया था। 

बात विषयांतर ना हों इसलिए पुनः वहीं लौटते हैं। उजले जर्सी, उजले बाल, कलाई पर उजले पट्टे और होठों पर अक्सरहां ही उजले क्रीम को पोत कर मैदान में उतरने वाले शेन वॉर्न के हांथों में जब लाल रंग की गेंद आती तो दर्शकों की आंखें विस्मयतापूर्वक उनके अगले गेंद के परिणाम की प्रतीक्षा में व्यग्रता पूर्वक टकटकी लगाए रहती।  

अम्पायर के पीछे से हल्के दौड़ लगाते वॉर्न की दैहिक भाषा जितनी रहस्यकारी थी उससे कहीं अधिक रहस्यकारी, गेंद की सिलाई पर टिकी हुई उनकी उंगलियां रहतीं। उनके सधे हुए हाँथों का संतुलन और गेंद को छोड़ने के पहले सेकेंड के दसवें हिस्से में सरपट दौड़ता हुआ उनका दिमाग रहता जो बल्लेबाजों के नजरों को पढ़ कर उनके अनुमान के ठीक विपरीत किस्म की गेंदबाजी में निपुण था। उनकी घूमती हुई गेंद के मुड़ने की रफ्तार, दिशा और कौण के प्रमेय में उलझकर बल्लेबाज वापस पैवेलियन लौटते रहते।

1992 में भारत के खिलाफ डेब्यू करने वाले वॉर्न ने अपने खराब फॉर्म को अगले ही साल पीछे छोड़ कर जब "बॉल ऑफ सेंचुरी" फेंका और उसी साल अंतरास्ट्रीय क्रिकेट में 73 विकेट लिया तब से वॉर्न ने अपने कैरियर को कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। वॉर्न के प्रतिभा का सूर्य उगता रहा और उनके तेजोमय दीप्त के सम्मुख क्रिकेट जगत निरुत्तर होता रहा। अपने खेलते रहने तक वो सर्वाधिक टेस्ट विकेट हासिल करने वाले गेंदबाज बने रहे। बिना शतक लगाए सर्वाधिक टेस्ट रन उन्होंने अपने नाम किया। एक दिवसीय और टेस्ट मैचों को जोड़कर उन्होंने एक हजार से ज्यादा विकेट लिया। 

वक्त यूटर्न जरूर लेता है...

यह तस्वीर मुझे हर बार गुजरे हुए वक्त की याद दिलाता रहता है। तस्वीर में एक रास्ता है जिसपर चलते लोगों की तरह वक्त भी सरपट भागता रहता है,आदमी पीछे खड़ा वहीं देखता रहता है और सब कुछ एक झटके में बीत जाता है। पहला और अंतिम सवार साइकिल पर हैं और बीच के लोग मोटरसाइकिल पर। जीवन के वक्त की रफ्तार भी तो कुछ इसी तरह होती है। लेकिन इस तस्वीर में जो एक चीज नहीं है वो रास्ते का यूटर्न है। 

वक्त अक्सरहां लौट कर आता है और अपना हिसाब क्रूर तरीके से करता है। वक्त के हिसाब में कोई दयाभाव नहीं होता है। जो आप देते हैं वक्त वही लौटाता है। जो आप बोते हैं वक्त आपको वही काटने पर विवस करता है। अच्छे को अच्छा और बुरे को बुरा। बिल्कुल समानुपातिक!

बिता हुआ वक्त विनती, मिन्नत, फरियाद, दया, क्षमा जैसे शब्दों से अपरिचित दिखाई पड़ता है। और हाँ, वक्त अक्सरहां यूटर्न लेता है....

(फोटो मेरे शहर मधुपुर की है)

शकुनि-२

पिता सुबाल के मृत्यु उपरांत धृतराष्ट्र ने शकुनि को कारावास से मुक्त कर उसे राजभवन के छोटे कार्यों को करने के लिए नियुक्त कर दिया था। शकुनि अपने सौपें कार्यों को कुशलता पूर्वक निष्पादित करता और शेष समय भांजे दुर्योधन से अपने सम्बन्धों को प्रगाढ़ करने में, उसे रिझाने में खपाता रहता। 

शकुनि के जीवन का अब अंतिम और एकमात्र ध्येय जो शेष बचा था वो समस्त कुरु वंश का समूल सर्वनाश था। जिसमें समस्त पांडव, गंगा पुत्र भीष्म,जामाता धृतराष्ट्र,और भांजा दुर्योधन भी शामिल था। शकुनि ने अपने लिए उन्हें भी अपना शत्रु मानना प्रारम्भ कर लिया था जो कुरु वंश के प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से साथ थे। गुरु द्रोण, कर्ण और भगवान कृष्ण को शकुनि इस कारण ही अपना शत्रु मानने लगा था। शकुनि का आशय भी तो यही है।उसके लिए कहाँ कोई अपना और कहाँ कोई पराया!

दुर्योधन के साथ खेलते,उसकी चाकरी करते जब भी वह अपने टूटे टांगों के कारण गिरता और असाध्य दर्द की वेदना के मध्य से गुजरता, तब-तब उसे अपने पिता को दिए गए वचन याद आते (सन्दर्भ:-पिछला पोस्ट) और भलमानस के छद्म आवरण को ओढ़े हुए शकुनि के अंदर की ईर्ष्या की अग्नि कौरवों को भष्मीभूत करने को धधक उठती।

धीरे-धीरे अपने कपट और तार्किक विश्लेषक बुद्धि के कारण वह दुर्योधन का छद्म हितैसी बनता रहा एवं दुर्योधन उसके कपट के वशीभूत होकर स्वयं,समस्त कौरवों और अपने हितेषियों को विनाश के और भी समीप ले जाता रहा। अंततः शकुनि स्वयं काल का ग्रास बना लेकिन Abey दुर्बुद्धि समस्त कौरवों के सर्वनाश का कारण बना। पांडवों को भी शकुनि ने अत्यंत ही पीड़ा पहुँचाया, उनके मान-सम्मान को कलंकित किया, उन्हें जिंदा जलाने की कोशिश की,चौदह वर्षों तक जंगलों में रहने को विवश किया लेकिन धर्म और भगवान श्रीकृष्ण के शरणागत पाण्डवों पर शकुनि की वक्र दृष्टि विजय को प्राप्त नहीं कर पाई। 

सम्पूर्ण महाभारत में बुद्धि और विवेक की चर्चा के कारण दो लोग आपको अपनी आकर्षित करते हों तो वो दो में एक भगवान श्रीकृष्ण हैं और दूसरा कपटी शकुनि। लेकिन धर्म और भगवान के सामने उसकी कपटी बुद्धि इसलिए निस्तेज रही क्योंकि शकुनि किसी का हितैसी नहीं था....

(सांकेतिक फोटो)

शकुनि-१

वैसे तो महाभारत ने पथ प्रदर्शक के रूप में अनेक महापुरुषों का परिचय समाज से करवाया लेकिन गांधार नरेश  "सुबाल" के पुत्र शकुनि का चरित्र अनमयस्क ही सबको अपनी और खींचता है। 

शकुनि मतलब गिद्ध। शकुनि मतलब कालकूट हलाहल को समेटा हुआ सर्प। शकुनि मतलब हितों के छद्म आवरण को ओढ़कर सर्वनास की आकांक्षा में प्रतीक्षारत एक दुष्ट। लेकिन शकुनि ऐसा क्यों था? हम सबों के बीच का शकुनि ऐसा क्यों होता है?

गंगा पुत्र भीष्म ने गंधार नरेश सुबाल के सामने धृतराष्ट्र के साथ गांधारी के विवाह हेतु प्रस्ताव रखा था। गंधार नरेश अपनी सुंदर पुत्री का विवाह नेत्रहीन धृतराष्ट्र के साथ नहीं करना चाहते थे लेकिन हस्तिनापुर की अपराजेय सेना के सम्मुख विवस होकर उन्होंने भारी मन से भीष्म के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया था।

भीष्म यह नहीं जानते थे कि गांधारी मांगलिक लग्न की कन्या थी और परम्परा के हिसाब से गांधारी का सांकेतिक विवाह पहले ही किसी बकरे से करा दिया गया था। ख़ैर! धृतराष्ट्र और गांधारी का विवाह संपन्न हुआ। कालांतर में भीष्म को जब यह बात ज्ञात हुआ तो गांधार नरेश को उनके छल के लिए उनके सभी पुत्रों के साथ बन्दी बना लिया गया। 

धृतराष्ट्र अपने प्रतिशोध का बदला लेने के लिए गांधार के सभी बन्दियों को खाने के लिए बहुत ही कम भोजन देता था जिसके कारण गांधार नरेश के कई पुत्र मृत्य को प्राप्त होने लगे। एक दिन सभी बन्दियों ने यह निर्णय लिया कि इतने कम भोजन में सभी के मरने से बेहतर यह होगा कि कोई एक व्यक्ति जीवित रहे जो इस अपराध का बदला कौरवों का नाश कर अर्जित कर सके। सभी ने शकुनि को इस कार्य के लिए उपयुक्त चुना और अंततः कंधार के सभी राजकुमार भूख की पीड़ा से मृत्यु को प्राप्त हुए। 

एक दिन जब गांधार नरेश सुबाल को यह लगने लगा कि भूख की पीड़ा से उनकी मृत्यु भी निकट आ गई है तब उन्होंने शकुनि को अपने पास बुलाया और अपने प्राणों की सम्पूर्ण ऊर्जा को समेट कर शकुनि के घुटने पर प्रचण्ड वेग से अपनी लात मार दी। शकुनि दर्द से कराह कर भुसायी हो गया और कातर दृष्टि से अपने पिता की और देखते हुए पूछा! ऐसा क्यों पिताजी? 

गांधार नरेश सुबाल ने सजल नेत्रों से शकुनि की और देखते हुए कहा। देखो शकुनि मैं यह जानता थ कि जब तुम यहाँ से बाहर निकलोगे तब पुनः पूर्व की भांति ही अपनी सम्पूर्ण ऊर्जा और समय मद्यपान और द्युत क्रीड़ा में गंवाने लगोगे और अपने भाइयों के प्राणों की आहुति को भी तुम सहजता से भूल जाओगे। लेकिन अब जब भी तुम इसे लंगड़े पैर के दर्द को आत्मसात करते हुए चलोगे तब-तब तम्हें तुम्हारे भाइयों के बलिदान और कौरवों के सर्वनाश का प्रण याद आता रहेगा। और सुनो मुझे यह भी पता है कि तुम द्युत क्रीड़ा में ही निपुण हो तो मेरी मृत्यु के उपरांत मेरी अस्तियों का द्युत में प्रयोग होने वाला पास बना लेना जो तुम्हें तुम्हारे जीवन के लक्ष्य को हासिल करने में सफलता प्रदान कराएगी। ऐसा कहकर गांधार नरेश ने अपने प्राण त्याग दिए!

क्रमशः....
(फोटो सांकेतिक)
एक पाठक यह चाहता रहता है कि उसके अच्छे किताबों के खोज की मृगतृष्णा हमेशा पूरी होते रहे। उसकी यह अभिलाषा भी रहती है की उसके चुकाए हुए मूल्यों के एवज में लेखक अपनी लिखी हुई बातों से उनमें नई ऊर्जा का संचार करे। नई बातों को जानने का माध्यम बने और भुलाये हुए बातों को स्मृत करने का जरिया बने। कम से कम तब तक तो जरूर ही जब तक एक पाठक किसी किताब को पढ़ता रहा हो। 

सस्ते प्रसिद्धि को प्राप्त करने की कामुकता में गद्य बोलकर पद्य लिख देना, यात्रा वृतांत बोलकर संस्मरण लिख देना ,लघु कथा बोलकर कबाड़ लिख देने की जो आत्ममुग्धता वाली कोढ़ नए और बाजरू लेखकों को लगी है, उस कोढ़ में उठते खाज़ से एक पाठक हमेशा त्रस्त होता रहता है। लघु कथाओं,सूक्ष्म कथाओं और अति सूक्ष्म कथाओं की अपनी ही त्रासदी है। किताबों वाली सेल्फी की विभिषिका जो है उसकी लीला तो बलिहारी है ही। 

एक पाठक को लेखक से कोई निजी राब्ता नहीं होता है। वह लेखक द्वारा लिखे किताबों को पढ़ कर उससे जुड़ता जाता है। लेखकों को सार्वजनिक रूप से अपनी लिखे हुए किताब को पढ़ने का आग्रह, किताबों की सेल्फी के साथ पोस्ट शेयर करने का आग्रह उसकी प्रसांगिकता पर ग्रहण लगाता है। लेखकों को गालियाँ सुनने का अभ्यस्त रहना चाहिए। और पाठकों को स्वस्थ गालियाँ देने को निर्भीक! आखिर क्यों ना? जब पाठक खर्च कर किताबें खरीदे और लेखक उसे निरास करे, फिर गालियाँ क्यों ना पड़े भला..
12th फेल फ़िल्म में किरदार का वह हिस्सा उतना स्ट्रगलपूर्ण नहीं है जितना उसे दिखाया गया है। फ़िल्म में असली स्ट्रगलर तो अभिनेता का बड़ा भाई है जिसने अपने छोटे भाई के पढ़ाई के लिए, अपनी सम्पूर्ण ऊर्जा,अपनी सारी इच्छाओं को झोंक कर पूरे परिवार को संभाला। छोटे भाई की सफलता में स्वयं की सफलता को तलाशा। लेकिन फ़िल्म के डायरेक्टर ने उसके स्ट्रगल को पर्दे पर जगह ही नहीं दिया।

ऐसा इसलिए भी हुआ होगा क्योंकि दर्शकों को उसके बड़े भाई द्वारा किये गए स्ट्रगल में शायद रुचि नहीं दिखती। ठीक उसी तरह जैसे गाँव और समाज के बड़े भाइयों के स्ट्रगल में लोगों की कोई रुचि नहीं दिखती है भले ही उसने अपने छोटे भाई के सफल होने हेतु अपना सबकुछ ही क्यों ना झोंप दिया हो....

अस्तित्व को लील जाने की उत्कट मनोरथ लिए हुए दैत्यों के अंतर्मन से भी अपने लिए आशीर्वाद प्राप्त कर लेना ही हनुमान हो जाना है।

अस्तित्व को लील जाने की उत्कट मनोरथ लिए हुए दैत्यों के अंतर्मन से भी अपने लिए आशीर्वाद प्राप्त कर लेना ही हनुमान हो जाना है।

बजरंगबली जब लंका, सिया सुधि लेने निकले तो सबसे पहले उनका सामना सुरसा नामक राक्षसी से हुआ जो हनुमान को निगलने को आतुर थीं। हनुमान जी ने विनती की। नहीं मानने पर उसके दिए गए शर्तों पर ही उसे पराजित किया और आशीर्वाद प्राप्त किया:-

"राम काजु सब करिहहु, तुम बल बुद्धि निधान।
आसिष देइ गई सो हरषि चलेउ हनुमान"

हनुमान जी आगे बढ़े। लंका प्रवेश करने के लिए अति सूक्ष्म रूप धारण करने पर भी उनका सामना लंकिनी नामक राक्षसी से हुआ। लंकिनी हनुमान जी के हाथों  पराजित हुई और आशीर्वाद दिया:-

"प्रबिसि नगर कीजे सब काजा,हृदय राखि कोसलपुर राजा।"

सीता माता की सुधि लेने के लिए बजरंगबली जब पेड़ की छावं में बैठे तब तब त्रिजटा नामक राक्षसी ने हनुमान जी की प्रशंसा करते हुए यह कहा था कि आप चिंता मत कीजिये। मैंने सपने में देखा कि एक विशालकाय बन्दर आया है जो लंका को तहस नहस कर देगा:-

"सपनों बानर लंका जारी , जातुधान सेना सब मारी"

लंकापति रावण अपने अहंकार के वशीभूत बजरंगबली को अंग भंग कर वापस राम के पास भेजना चाहते थे और बजरंगबली के पूँछ को आग भी उसने इसी कारण लगाया  था। लेकिन जब बजरंगबली ने सम्पूर्ण लंका को जला दिया तब रावण यह कहने पर विवस हुआ कि :-

"हम जो कहा यह कपि नहीं होई, बानर रूप धरें सुर कोई"

आपके आस पास भी तो कई हनुमान रहते हैं। जो बजरंगबली तो नहीं लेकिन उनके स्वभाव जैसे होते हैं। उन सभी बजरंगबली को प्रणाम 🙏🙏

क्रमशः....