शुक्रवार, 29 मार्च 2024

प्रज्ञ माने प्रज्ञानानंद..

यह लेख पिछले साल लिखा था आज यहाँ लगा रहा हूँ...
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प्रज्ञ माने प्रज्ञानानंद... 

कल हुए क्रिप्टो कप के आखरी मैच के दौरान प्रज्ञानानंद ने विश्वजयी मैग्नस कार्लसन को एक बार पुनः परास्त कर दिया। यह मैग्नस कार्लसन का प्रज्ञ के हाँथों इस साल की तीसरी हार है। पिछले कई वर्षों के दौरान शतरंज में कार्लसन ने अपने जादुई खेल और तिलस्मी चाल से जीत का जो अभेद्य किला बना रखा था अब वो धीरे-धीरे दरकने लगा है।

जो प्रज्ञानानंद के खेल को देखते आएं हैं उनके लिए यह जीत हर्षदायक है, सुखदायक है। इसी वर्ष के शुरुआती दिनों में जब प्रज्ञानानंद ने मैग्नस को पहली बार हराया तब वह महज सोलह के थे और किसी विश्वविजेता को इतने कम उम्र के खिलाड़ी द्वारा पराजित करने वाले वो एकमात्र खिलाड़ी बने थे। 

प्रज्ञानानंद का स्थिर धनी स्वभाव, विपक्षी खिलाड़ियों से विनम्रतापूर्वक खेल की गलतियों पर विमर्श और कम उम्र में ही प्राप्त दैवीय एकग्रता उन्हें शीघ्र ही विचलित कर देने वाले इस खेल के अन्य खिलाड़ियों से सर्वथा पृथक करती हैं। (इस संदर्भ का एक वीडियो कॉमेंट बॉक्स में है)

यह प्रज्ञानानंद की सहजता ही है जब जीत के बाद उन्होंने इंटरव्यू के दौरान यह कहा था कि मेरी यह अभिलाषा थी की मैं विश्वनाथन आनन्द और मैग्नस कार्लसन के साथ एक फोटो खिंचा सकूं। आज उनके साथ खेलता हूँ तो अच्छा लगता है। 

महज दस के उम्र में इंटरनेशनल मास्टर की उपाधि अर्जित करने वाले एक मात्र खिलाड़ी और मात्र बारह की उम्र में ग्रैंडमास्टर की उपाधि अर्जित करने वाले दुनियाँ के दूसरे खिलाड़ी बनने वाले प्रज्ञानानंद की सत्यनिष्ठ एकग्रता उन्हें विश्वविजेता बनाये इसी उम्मीद में उनके कई प्रसंसक बैठे हुए हैं। 

मैग्नस का परिचय यहाँ बस इतना कि वो पाँच बार के विश्व चैंपियन हैं।तीन बार के वर्ल्ड रेपिड चैंपियन हैं। पाँच बार के वर्ल्ड ब्लिट्ज चैंपियन हैं और एक जुलाई 2011 से शतरंज की दुनियाँ के प्रथम स्थान पर विराजित हैं।

इति!

सोमनाथ की कहानी भाग-१

सोमनाथ...

सोमनाथ महालय के निर्माण में उत्तर और दक्षिण दोनों ही स्थापत्यकला अपनी पराकष्ठा से उत्कीर्ण की गई थी। महालय के मंडप के विशाल खम्भों पर हीरा, मानिक, नीलम आदि रत्नों की पिचच्चीकरी ऐसी भौतिकी के सूत्रों की गई थी जो अपने ऊपर पड़ने वाले दियों के प्रकाश को मंडप के सम्पूर्ण दिशाओं में बिखेरता रहता था। एक साथ दस हजार से भी ज्यादा लोगों के खड़े होने की क्षमता वाले इस मंडप में ऐसे छह सौ से भी अधिक रत्नजड़ित खम्भे थे।  

सभामण्डप के द्वार के दोनों पार्श्व में दो विशाल दीप्तस्तम्भ थे जिनपर प्रतिदिन सहस्त्र दिप जलते थे। इन स्तम्भों से निकलने वाली प्रकाश राशि के सहारे समुद्रयात्री दिशाओं का अनुमान लगाते रहते। इन स्तम्भों के दक्षिण में एक चन्द्रकुण्ड था जिसके विषय मे यह कहा जाता है कि इसमें स्नान मात्र से सर्वरोग मुक्ति का अभय आशीर्वाद प्राप्त हो जाता था। 

सभामण्डप से होकर गर्भगृह का द्वार था। इसी गर्भगृह में अलोकिक सोमनाथ का विश्वविख्यात ज्योतिर्लिंग था। गर्भगृह के ऊपर एक विशालकाय शिखर था जिसका ऊपरी आवरण स्वर्ण जड़ित और भीतर रत्नजड़ित। सूर्य की सतेज किरणों की चमक में यह शिखर चकमकाता हुआ दूसरा सूर्य प्रतीत होता था और भीतर के रत्न, सहस्त्र दीपों के प्रकाश से चमकते हुए गर्भगृह की शोभा को अलोकिक दिब्यता से परिपूर्ण करता था।

सभा मंडप के सामने पूर्वाभिमुख नन्दी की विशालकाय चांदी की प्रतिमा विराजमान थी। मंदिर में प्रदीप्त दीपकों से जलकर उठते हुए घृत धूम्र, हवन कुंडों के समिधा में प्रयुक्त चन्दन- केसर- कस्तूरी से उठते धूम्र महालय के आस पास दो योजन पृथ्वी को सुंगन्धित कर स्वर्गीय अनुभूति प्रदान करती थी।

मंडप में दो सौ मन की ठोस श्रृंखला में लटका हुआ स्वर्ण महाघण्ट था जिसकी वज्रगर्जना मिलों तक सुनी जा सकती थी। आरती के शंखनाद,चोघड़ियाँ और घण्टों आदि का जो महाघोष होता उसे महालय से चार योजन दूर तक सुना जाता था।

राजा-महाराज ने दस हजार से अधिक गाँवों को सोमनाथ प्रभु को अर्पण किया था जिससे महालय का अक्षय कोस कभी भी कम नहीं होता था। महालय के गगनचुंबी शिखर पर एक विशाल स्वर्णकलश स्थापित था जिसके मध्य में भगवे रंग की ध्वजा फहराती थी जो दूर देशों के यात्रियों का मन बारम्बार अपनी और खींच लेता था....

शेनवार्न वाज ❤️

मुझे क्रिकेट से परिचय कपिलदेव की उपलब्धियों ने कराया था। क्रिकेट के प्रति प्रेम सचिन ने जगाया, लेकिन क्रिकेट का सम्मोहन शेनवार्न को खेलते देखकर जकड़ने लगा था। यूँ तो वो स्थूल रूप में अब क्रिकेट को नहीं खलते हैं लेकिन शुक्ष्म रूप से वो क्रिकेट की दुनियाँ में हमेशा विद्यमान रहेंगें। यह लेख पिछले साल लिखा था, आज याद आया तो यहाँ भी लगा दिया ताकि यह यहाँ स्थायी भाव से वार्न की याद दिलाता रहे। 

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क्रिकेट तिलिस्म की दुनियाँ है। अगले ही गेंद पर यहाँ क्या कहानी बन जाय यह कह पाना तिलिस्मी दरवाजे के चाभी को खोज लाने जैसा ही है।बावजूद इसके इस तिलिस्म के मायाजाल को तोड़ने के लिए यहाँ कई जादूगर आये जिन्होंने अपने सम्मोहन की माया से अगली ही गेंद पर खेल की दशा और दिशा को अपने हिसाब से तोड़ा और मरोड़ा। शेनवॉर्न क्रिकेट के वही जादूगर थे जिनके जादू के तिलिस्म की कहानियां आने वाली पीढ़ियों को पढाया और सुनाया जाता रहेगा। 

शुरुआत किस ठौर से करूँ यह ठीक से निर्धारित नहीं कर पा रहा हूँ  लेकिन यह सर्वविदित सत्य है कि ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट टीम जब विश्वविजय के अश्वमेध घोड़े पर सवार होकर सरपट दौड़ा करता था, उस कालखंड का अगर मूल्यांकन हो तो, ऐडम गिलक्रिस्ट, मैथ्यू हैडन, रिकी पोंटिंग,एंड्रयू सायमंड्स, माइकल क्लार्क, ब्रेट ली,गिलेस्पी, ग्लैन मेग्रा और शेन वार्न इस सुनहरे कालखण्ड के वो कोहिनूर थे जिन्होंने दुनियाँ के हर क्रिकेटरों को चकित होने पर विवस किया था। 

बात विषयांतर ना हों इसलिए पुनः वहीं लौटते हैं। उजले जर्सी, उजले बाल, कलाई पर उजले पट्टे और होठों पर अक्सरहां ही उजले क्रीम को पोत कर मैदान में उतरने वाले शेन वॉर्न के हांथों में जब लाल रंग की गेंद आती तो दर्शकों की आंखें विस्मयतापूर्वक उनके अगले गेंद के परिणाम की प्रतीक्षा में व्यग्रता पूर्वक टकटकी लगाए रहती।  

अम्पायर के पीछे से हल्के दौड़ लगाते वॉर्न की दैहिक भाषा जितनी रहस्यकारी थी उससे कहीं अधिक रहस्यकारी, गेंद की सिलाई पर टिकी हुई उनकी उंगलियां रहतीं। उनके सधे हुए हाँथों का संतुलन और गेंद को छोड़ने के पहले सेकेंड के दसवें हिस्से में सरपट दौड़ता हुआ उनका दिमाग रहता जो बल्लेबाजों के नजरों को पढ़ कर उनके अनुमान के ठीक विपरीत किस्म की गेंदबाजी में निपुण था। उनकी घूमती हुई गेंद के मुड़ने की रफ्तार, दिशा और कौण के प्रमेय में उलझकर बल्लेबाज वापस पैवेलियन लौटते रहते।

1992 में भारत के खिलाफ डेब्यू करने वाले वॉर्न ने अपने खराब फॉर्म को अगले ही साल पीछे छोड़ कर जब "बॉल ऑफ सेंचुरी" फेंका और उसी साल अंतरास्ट्रीय क्रिकेट में 73 विकेट लिया तब से वॉर्न ने अपने कैरियर को कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। वॉर्न के प्रतिभा का सूर्य उगता रहा और उनके तेजोमय दीप्त के सम्मुख क्रिकेट जगत निरुत्तर होता रहा। अपने खेलते रहने तक वो सर्वाधिक टेस्ट विकेट हासिल करने वाले गेंदबाज बने रहे। बिना शतक लगाए सर्वाधिक टेस्ट रन उन्होंने अपने नाम किया। एक दिवसीय और टेस्ट मैचों को जोड़कर उन्होंने एक हजार से ज्यादा विकेट लिया।