बुधवार, 29 मई 2019

रटे हुए खिलाड़ियों के नाम और उनके खेल

2003-04 में प्रतियोगिता दर्पण पत्रिका 22 रुपये में और सामान्य ज्ञान दर्पण 18 रुपये में उपलब्ध हो जाती थी । 

साल के चार ग्रैंड स्लैम के विजेताओं के नाम मैं इसलिए रट लिया करता था ताकि परीक्षा में पूछे जाने पर उसका जवाब दिया जा सके ।

अमूमन ये होता है कि जिस खेल के खिलाड़ियों के नाम आपको याद रहते हों वो खेल आपको धीरे-धीरे प्रिय लगने लगता है ।

वो दौर फ़ेडरर का था, 237 सप्ताह तक शीर्ष पर बने रहने के दौर, वीनस बहनों का पराक्रम तब भी था पर किम क्लस्टर्स और शारापोवा के आने के बाद इस खेल में रंगत और भी आ गई थी ।अन्ना कुर्निकोवा का जो जलवा था उसका अपना अलग ही लेवल था।

अब नडाल आ चुके थे और ये दौर नडाल और उनके क्ले कोर्ट पर बिखरते हुए जलवे का दौर था । फ़ेडरर साल में होने वाले बाकी तीन ग्रेंड स्लैम तो जित लेते थे लेकिन क्ले कोर्ट अब अबूझ पहेली थी उनके लिए । घास के मैदान का अजेय योद्धा फ़ेडरर (8 विम्बलडन ), मिट्टी के मैदान पर कहीं टिक नही पा रहे थे । अब नडाल, फ़ेडरर के स्पीड ब्रेकर थे  ।

समय के साथ जीत के रफ़्तार पर इनके शारिरिक चोट हावी होते रहे और क्रमशः इनकी रफ़्तार भी कमती रही ।

20 ग्रेंड स्लैम के साथ फ़ेडरर इस खेल में अपना कृतिमान स्थापित करने में सफल तो रहे लेकिन नडाल ने उन्हें क्ले कोर्ट में हमेशा परेशान किया ।  नडाल के 17 ग्रैंड स्लैम में से एक आध ग्रैंड स्लैम (फ्रेंच ओपन) भी अगर फ़ेडरर के झोले में आते तो फ़ेडरर की विजयी पताका को ये ग्रैंड स्लैम स्वर्ण जड़ित रत्नों सा सुशोभित करता।

खैर! अब ये दौर जोकोविच का है । इस दौर को जोकोविच ने अपने रंग में ढालने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ा है । 15 ग्रैंड स्लैम का विजयी जोकोविच अपनी विजय पताका लिए अग्रसर है और शायद कई सालों बाद जोकोविच ऐसा खिलाड़ी बन जाए जिसने दो बार साल के चारों ग्रैंड स्लैम जीता हो।

सरेना के बारे में फ़िर कभी।

:- रामकृपाल 

शनिवार, 25 मई 2019

चुनाव, परिणाम और आत्ममंथन

चुनाव परिणाम आ गए हैं और हारी हुई पार्टियों में आत्ममंथन का दौर शुरू है । ये चुनाव कई पक्षों के बीच लड़े जाने के बावजूद भी अन्ततः दो पक्षों की लड़ाई बन गई थी । दूसरे शब्दों में भाजपा इसे "सभी दल बनाम बीजेपी " की लड़ाई भी कह रही है ।

पिछले पाँच सालों में लागू किए गए योजनाओं और उन्हें धरातल पर लाने में सफल, सत्तासीन बीजेपी जीत की आकांक्षा लिए मजबूत दावेदार के रूप में चुनावी समर में उतरी ।

बीजेपी का सफल मैनेजमेंट, प्रधानमंत्री पद के दावेदार, प्रमुख नेताओं और बेजेपी के मीडिया सेल ने इस पार्टी द्वारा किए गए कार्यों की उपलब्धि और विपक्षी पार्टियों की कमियों को देश मे रहने वाले अंतिम पायदान के लोगों तक पहुंचाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ा।

वहीं विपक्ष के लिए एकत्र हुई पार्टियां, पिछले पाँच सालों से सत्ता में रही बीजेपी के कार्यों की त्रुटि को खोजने और उससे उपजे असंतोष को लोगों तक पहुंचाने में असमर्थ रहीं । 

जहाँ बीजेपी राष्ट्रवाद, गरीब और गरीबी से लड़ने वाली योजनाएं,  सबका साथ और सबका विकास ,विदेशनीति, भ्रष्टाचार मुक्त शासन और देशहित के मुद्दे को लोगों के दिलोदिमाग में भरने में सफल रही, वहीं विपक्षी पार्टियां चुनावी मेनिफेस्टो के कवर पेज के डिजाईन और "चौकीदार चोर है" के नारे लगवाने  में लोगों के भरोसे को खोती रही ।

इस बीच आर्थिक नीति और किसानों की समस्यओं के मुद्दे को भी लोगों ने बाकी और योजनाओं के कारण  दरकिनार कर दिया ।

विपक्षी दलों द्वरा चुनावी सभाओं में बड़े नेताओं के मीडिया ट्रायल से इमेज मेकिंग की कोशिश को नेताओं के गिरते भाषा के स्तर ने  सफल नहीं होने दिया ।

अंततः बीजेपी गरीबी से लड़ने के मुद्दे, भ्रष्टाचार मुक्त शासन, विदेश नीति और राष्ट्रवाद के मुद्दे को लोगों तक कनेक्ट करने में सफल रही और प्रचण्ड बहुमत से विजयी हुई ।

कुल मिलाकर ये चुनाव विकास के मुद्दे और तुस्टीकरण की राजनीति से दूर जाकर लड़ी और जीती गई ।

वहीं वीपक्षी पार्टियों ने सरकार की कमियों को गिनाने के बजाय नरेंद्र मोदी को हराने पर अपना ध्यान केंद्रित रखा और जनता के सरोकार के मुद्दे को उनतक पहुंचाने में असफल रही  ।

मंगलवार, 16 अप्रैल 2019

Drinking Water Scarcity of Madhupur

Madhupur is a very small town /sub-division in Deoghar district of Jharkhand . The town is srounded by neutral resources. (rivers, forest & small hills) .

Inspite of having all these  natural resources, the people of Madhupur are facing acute shortage of drinking water .

The residents of Nayabazar & Patharchapti Mohallas are terribly affected from scarcity of drinking water .

All wells including borewells  in these areas  gets dried in the month of December every year.

The pepoles (females, old aged man & women, pregnant ladies and school going children) are compelled to bring water from very far places to survive their lives .

Supply water system is not working in these Mohallas from last two months.

All possible efforts have already been taken place to continue water supply in these area . All responsible authorities have already been requested . Every needy people have strolled from pillor to the post but the situation still remains such as.

Therefore it is requested to look in to the matter  and necessary direction may please be passed to the concerned authority at the earliest . People of these mohallas are living in the hope that their hope will not be deprived.

बुधवार, 14 नवंबर 2018

अइले अइले झारखण्ड अब खहियौ शकरकंद

१८ साल, ०९ सरकार , ०२ राष्ट्रपति शासन (अधिकतम २.५ साल और न्यूनतम 11 दिन, मौजूदा सरकार को छोड़ कर) के स्वर्णिम इतिहास के साथ झारखण्ड अपने विकास के ३४वें पायदान पर मुँह बिचकाए खड़ा है ।

वर्तमान सरकार के कार्यकाल को अगर छोड़ दिया जाए तो ये आँकड़े और भयानक लगते हैं । इसे राजनीतिक त्रासदी ही कहा जा सकता है लेकिन यहाँ राजनीति करने वालों के लिए यह सुनहरा अवसर साबित हुआ है ।

ये वो प्रदेश है जहाँ दो धुर विरोधी राजनीतिक पार्टियाँ अपनी स्वार्थसिद्धि और गद्दी के लोलुपता के लिए हाथ मिला कर सत्ता का नंगा नाच किया करती हैं ।

एक और वो धुरंधर राजनेता नेता है जो सत्ता के लालच में आकर अपने आइडियोलॉजी के पोथी में डोर बांध कर उस नवसिखुआ से ही हाथ मिला लेता है जिनके हाथों ही कभी उनकी अपमानजनक पराजय हुई थी ।

दूसरी और एक अकेला निर्दलीय विधायक है जो मुख्यमंत्री तक बन जाता है और हजारों करोड़ का कोल स्कैम कर अपना पेट फूला कर डकार तक नहीं निकालता है।

और तीसरी और वो नेता है जिसने मुख्यमंत्री की कुर्सी चले जाने पर अपनी नई पार्टी ही बना लिया । राजनीतिक स्वार्थसिद्धि के लिए यहाँ पार्टियाँ बनती गई और बनाती गई ।

मुख्यमंत्री बनने की रोचक कहानियों की लिस्ट में झारखण्ड को अग्रणी रखा जाना चाहिए ।

#झारखण्ड_१८

मंगलवार, 21 अगस्त 2018

वृद्धाश्रम

दादी और पोती की वृद्धाआश्रम वाली तस्वीर सुबह से ट्रेंड ही पर है औऱ भावुक करने वाली भी ।

शहर और शहरी संस्कृति में रमे लोगों के लिए अब ये आम बात हो गई है । अमूमन शहरों की औसत साक्षरता दर अधिक होती है । जब लोग ज्यादा पढ़ लिख लेते हैं तो उन्हें अपने सभ्य होने का एहसास होने लग जाता है । और जब लोग सभ्य हो जाते हैं तो उनके सोचने का दायरा बढ़ जाता है । उनकी पहली प्राथमिकता खुलेपन की होती है । (मैं यहाँ अभद्र नहीं होना चाहूंगा) ।

समय के साथ परिवार बढ़ता है लेकिन जो नहीं बढ़ता है वो रहने का स्थान (स्क्वायर फीट में )और घर की चारदिवारियाँ । पहले स्थान पर विराजमान खुलापन और स्वछंदता अपने और अपने लोगों की आहुति मांगती है और आहुति दे दी जाती है ।

और फ़िर मर जाते हैं ऐसे अनमोल रिश्ते जो बेमोल हैं । शुक्रिया इन सब बातों से गावँ-घर के लोगों को कोई सरोकार नहीं है । गावँ आज भी बचा हुआ है इस प्राणघातक महामारी से ।

सोमवार, 8 जनवरी 2018

मेरा मधुपुर

इक दोपहर का क़िस्सा है जब शहर वो हमने छोड़ा था ,
उसके बाद कुछ ऐसी बीती शाम शराबों के थे हम ।

जौन एलिया के इस शेर को पढ़ते पढ़ते आज फ़िर से अपना मधुपुर सामने है ।

छोटा शहर, बड़े शहरों के आगे  मजबूर होता है या यूँ कहें कि वह बड़े शहरों का गुलाम होता है । ठीक वैसे ही जैसे  इतिहास में छोटे प्रान्त बड़े प्रान्तों  के सम्मुख लगभग हर मामले में मजबूर हुआ करता था । छोटे शहर को ना चाह कर भी बड़े शहरों की जी हुजूरी करनी ही पड़ती है । कारण यह है कि छोटा शहर अपने क्षेत्र में आने वाले सभी जनसंख्या को भरपेट भोजन , आवास और रोजगार की सुविधा उपलब्ध  करा ही नहीं सकता है ।

आज से तकरीबन  11 साल पहले मेरे भी छोटे से शहर ने मेरे सामने भी अपनी मजबूरी रुंधे गले से गिड़गिड़ाते हुए मुझे बोल दिया था और बिना मेरे पक्ष को सुने हुए उसने एक तरफ़ा आदेश पारित कर दिया था । मुझे शहर निकाला हुआ था ।

मैं बाध्य था ,मेंरे पास कोई ऑप्शन नहीं बचा था, क्योंकि बिहारी आदमी नॉक़री नहीं करेगा तो खायेगा क्या ?(खास करके सरकारी नॉकरी क्योंकि इसकी तैयारी में नाममात्र के पैसे खर्च होते हैं) ।  ये यक्ष प्रश्न आज भी यथास्थान विराजित है ।

घूमते भटकते आज वहाँ पहुँच गया हूँ जहाँ भीड़ ही भीड़ है । इतना कि कोई हिसाब किताब नहीं है । इस बड़े से शहर ने देश के लगभग सभी छोटे शहरों के मजबूरी को समझा तो है पर खुद बर्बाद हो गया है । सांस लेने में सांस अटक सी जाती है । मुझे किराए से ख़रीदी हुई हर चीज से नफ़रत है जिसके जिक्र फ़िर कभी ।

फिलहाल , 10 मिनट मैंने अपनी आँखों को  बंद किया था और  घूम आया था तुम्हारी गलियों में और याद आया कि :

बेक़रारी सी बेक़रारी है ,
वस्ल है और फ़िराक तारी है ।

शौक की इक उमीदवारी है ,
वरना किसको ख़बर हमारी है ।

जो गुज़ारी न जा सकी हमसे ,
हमने वो ज़िन्दगी गुज़ारी है ।

बिन तुम्हारे कभी नहीं आई,
क्या मेरी नींद भी तुम्हारी है ।

मंगलवार, 28 फ़रवरी 2017

क्या कहूँ

एक प्रश्न है , सडा - पचा है ,आप इसे यक्ष प्रश्न भी कह सकते हैं , की क्या,देश के सारे बुद्धिजीवी छात्र  कुछ चुनिंदा विश्वविद्यालयों में ही पड़ते हैं ? की क्या सारे ब्यूरोक्रेट्स यहीं से पास आउट होते है ?की क्या सारे इंडस्लिट्रीयलिस्ट यहीं की डिग्री ले के देश की अर्थव्यवस्था में रीढ़ की हड्डी के रूप में स्थापित होते हैं । सारे डॉक्टर, इंजीनयर , चार्टेड अकाउंटेंट , शिक्षक फार्मासिस्ट, मैनेजमेंट कर्ता   सब के सब यहीं से पासआउट हुवे होते हैं क्या ?

नहीं ना !

ये ठीक है की यहाँ शिक्षा का स्तर देश के अन्य विश्वविद्यालयों की तुलना में कहीं ज़्यादा मजबूत और सुदृढ़ है , तुम सब जो यहाँ पढ़ते हो सामान्य से ज़्यादा मेधावी हो , और कुछ विशेष गुणसंपन्न भी हो , जिन्हें अपने वर्तमान और अपने भविष्य की चिंता छोड़ अपने कौम और अपने मज़हब की चिंता ज्यादा होती है । जिन्हें अपने अभिव्यक्ति के आज़ादी की चिंता ज्यादा होती है , जिन्हें "बोल की लब आज़ाद हैं तेरे " वाला जुमला ज्यादा पसंद होता है ।
पर इसका कहीं से ये मतलब नहीं निकलता है की देश के बाकि बचे विश्वविद्यालयों में भूसगोल छात्र ही पड़ते हैं , यहाँ के ख़ान से भी   वो सारे हिरे निकलते हैं जिनकी देश को ज़रूरत होती है , ऐसा नहीं है की पढ़ाई के दौरान उन्हें अपने वर्तमान और भविष्य की चिंता नहीं रहती है । ऐसा नहीं है की उन्हें अपने अभिव्यक्ति  की आज़ादी के प्रति सवेंदनशीलता नगण्य होती है , ऐसा नहीं है की छोटे मोटे  झगड़े यहाँ नहीं होते है ,होता है सब कुछ होता है ,  पर यहाँ तुम्हारे तरह का ज़ाहिलपना नहीं होता है , यहाँ के छात्र को आज भी अपने गार्जन के पास अपनी शिकायत चले जाने का डर रहता है ,  और असल बात ये है की ये सभी अपने आप को उतने शिक्षित नहीं मानते हैं की अपने अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए अपने देश और राष्ट्र के प्रति ही अपना स्वर मुखर कर ले ।

हाँ एक बडी समस्या ये ज़रूर हो रही है की तुम्हारे इस निराधार विरोध के ज़हर की तपिस अब कुछ छोटे मोठे और शांत से रहने वाले विश्वविद्यालयों में भी देखि जाने लगी है जो निश्चित ही चिंताजनक स्थिति है ।

तुम एलीट टाइप के छात्र से तो कोई अनुरोध भी मात्र बेवकूफ़ी ही है , हाँ उन छोटे तामाम विश्विद्यालयों के छात्रों से तो सरकार को वार्तालाप ज़ारी रखनी चाहिए जिन्हें वास्तविक रूप से इस देश के प्रति सम्मान है , जो वास्तविक रूप से देश के निर्माण में अपनी महवत्पूर्ण भूमिका निभाने वाले है , और जिन्हें आज भी अपने देश के प्रति अपने राज्य के प्रति , अपने परिवार के प्रति सम्मान है और जो इन घनघोर रूप से राष्ट्रविरोधीयों के नज़र में पहले निवाले के रूप में देखे जा रहे हैं !!

रविवार, 26 फ़रवरी 2017

डर बनाम मज़बूरी

डर बनाम मज़बूरी
(चेचरि पूल)

जब आपका गला सुखने लगता है , छाती भारी होने लगता है ,  हिम्मत एक क़दम आगे चल कर दो क़दम पीछे सरका लेता है , ज़मीन  आगे चलने लगती है और आप पीछे खिसकने लगते हैं । आप  हिम्मत की पीठ को हल्के हाथों से थप-थपाते हैं और कहते हैं तुम कर सकते हैं। 

अबे ! नहीं  होगा मुझसे यार ! हिम्मत आपके हाथ को झिड़कते हुवे जवाब देता है ।

देखो  बाकि लोग भी कर रहे हैं , तुमसे दुबले , तुमसे छोटे , तुमसे मोटे  , औरत और बच्चे भी ! 

अनपढ़ हैं सब के सब गँवार हैं  , कोई अपना दिमाग़ नहीं लगा रहा है  , जान जोखिम में डालना कोई हिम्मत का काम है ! देखो तो  पैर कैसे फ़िसल रहा है , गिरे तो गए । मरना तय है ।

अबे देख यार वो 8 महीने की गर्भवती महिला अपने तिन साल के लड़के को गोद में उठा के अपना संतुलन बनाये इतने आत्मविश्वास के साथ आगे बढे हुवे आ रही है , फ़िर तुम तो फिट फोर हो ।

हिम्मत मुँह चिढाता है  , उसके मर्दाने अहम के गालों पर यह ज़ोरदार चाटा  था । अपनी सारी हिम्मत बटोर कर हिम्मत आगे बढ़ता है ।

"चेचरि पूल " पर उसके पड़ते हुवे क़दम से उठते आवाज़ और पूल में उठे कंम्पन्न को नजरअंदाज करते हुवे अब वह बीचो- बिच था , पानी की तेज़ बहाव पर नजरें गयी  । वह सन्न सा रह गया , डर विकराल जाल लिए उसे चारों ओर से घेरने लगा था , पैरों में फ़िसलन ज़्यादा महशूस होने लगी थी । चार फ़िट का एकतरफ़ा रास्ता जिसका वज़ूद नदी के तेज़ बहाव के बिच बांस के बल्लियों के सहारे टिका हुवा था मरात्तक भय को जन्म दे रहा था । वह किमकर्त्तव्य विमूढ़ सा था , पीछे वह लोट नहीं सकता था और आगे जाने की हिम्मत उसमे बची नहीं थी ।
पूल में एकाएक कम्पन्न तेज उठने  लगी थी ।  पीछे क़रीब दस और लोग आ गए थे । जान बचानी थी तो आगे बढ़ना था । अब कोई स्पेस बचा नहीं था स्केप करने के लिए । टाईम था  डर पर हिम्मत के हावी होने का , और फिर कुछ वैसा ही हुवा , डर भागते हुवे भूत  की तरह  पीछे छूटता जा रहा था , जूते की फ़िसलन ग़ायब थी पूल स्थिर हो गया था । थोड़ी देर में उसके पैरों के निचे स्थिर ज़मीन थी ।

जीत डर के स्थाई हार पर अट्टहास करने लगा था । पीछे मुड़ कर चेचरि पूल पर लोगों को आते जाते गौर से देखा , हर चेहरा डर पर स्थाई जित की गवाही दे रहा था ।

फ़िर कुछ देर और विचार किया गया कहीं यह मज़बूरी तो नहीं ?
कौन आपने जीवन को जोखिम में डालता है , हिम्मत ने प्रचंड आवाज़ से उत्तर दिया !

अब आगे बढ़ने का समय था ।

शनिवार, 26 नवंबर 2016

जमीन बेची जा सकती है

कुत्ते को लड़ते कभी ना कभी तो देखा ही होगा आपने ,  थोडा सोचिये तो कैसे चेहरा बनाता है , दाँत बाहर मुँह खुला, जीभ बाहर ,  हल्ला करते हुए एक दसरे पर हावी होने की भरजोर कोशिश। कई मुहावरे भी बने इनके लड़ाई पर , सोचने से हँसी तो आती है  की कुत्ते की तरह क्यों हल्ला कर रहे हैं । खेर हल्ला से ध्यान आया  दो तीन दिन पहले झारखंड विधान सभा में  CNT- SPT संशोधन विधेयक पर मचे शोर-शराबै , हो -हंगामे , कुर्सी फैंक परफॉर्मेन्स पर । वही स्थिति  थी , मुँह खुला ,  दाँत बाहर , जीभ बाहर ,   हल्ला करते हुए एक दूसरे पर हावी होने की भरपूर कोशिश ! अंग्रेज़ो ने यह नियम बनाया था की छोटानागपुर और संथाल परगना के आदिवासियों के जमीन को ना तो खरीदा जा सकता है और ना ही  बेचा जा  सकता है।  समय बदला नियम बदले , संशोधन हुए और आज भी संशोधन जारी है । समय बदला लोग बदले पर एक चीज जो नहीं बदली वो ये की जमीन पहले भी बेचे जाते थे, आज भी बेचे जा रहे हैं और आगे भी बेचे जाते रहेंगे । बस अंतर ये हो गया है की आम बोलचाल की भाषा में  जमीन की क़िस्म दो तरह की हो गयी है । सेलेबल और नोनसेलेबल।  (नोंनसेलबेल जमीन खरीददार को  90 सालों के लिए लीज़ पर दिया जाता है और बाद में यह फिर से उसके असल मालिकाना हक रखने वाले के पास आ जाता है । यह एक वैधानिक नियम है पर असल में प्रयोग होता नहीं है )। अधिकांश छोटे  जिले, अनुमण्डल,  कस्बे  का बड़ा हिस्सा  नोंनसेलेबल जमीन पर बसा हुआ है या बसने की तैयारी कर रहा  है । गांव से पलायन जारी है , शहरीकरण जारी है , सेलेबल जमीन घट रहे हैं तो लोग जाये तो कहा जाये , फिर चाहे जमीन संथाल की हो या किसी और की । एक बात और की इसमे हर्ज़ कहाँ है और किस हिसाब से है, की लोग कुर्सी फैकने और मारने मारने पर आमादा हो गए हैं।

जब सेलेबल जमीन के मालिकाना हक रखने वाले उसे अपनी जरूरत के हिसाब से बेच सकते हैं तो फिर नोंनसेलबेल वाले क्यों नहीं ?? एक महत्वपूर्ण बात ये  की जमीन अगर नॉनसेलेबल हुई तो कीमत सीधे आधी  भले ही वह बाजार के कितने ही पास क्यों न हो अगर बेचने वाले की जरुरत भी हो तब भी उसे ठीक दाम नहीं मिल पता है , और हाँ जो लोग हल्ला - चिल्ला कर रहे थे ना' यकीं मानिये उनके पास भी जमीन है वो भी नोंसेलबेल वाली जिनका मालिकाना हक किसी दूसरे के पास ही है  । खेर संशोधन जरुरी है और जारी रहना चाइये यह अच्छा है खरीदने वाले के लिए और बेचने वाले के लिए भी !

मंगलवार, 22 नवंबर 2016

नोकरी उर्फ नोकर

यह ठीक है की  कफ़न में जेब नहीं होता है और कोई  कितना ही क्यों न कमा - धमा ले कोई लाद बोज के साथ तो  ले जाता नहीं ।   सब कुछ यही छुट जाता है , सब के अलावे  केस, फरियाद, मुकदमा, झगड़ा, झमेला , भी । कुछ  दुआ और इज्जत  ले जाते हैं  और बाकि बचे  बोरी भर कर गालि और गलौज ( लोगों का बस चले तो जूतम -पेल भी साथ में भेज दें) । कुछ थोड़े लोग बहुतो के लिए बहुत कुछ छोड़ जाते है जिसे लेकर लोग, समुदाय , गाँव, क़स्बा ,शहर, राज्य और देश आगे बढ़ता रहता है , ये अलग बात है की सोनिया पप्पू को छोड़ रही है और अमेरिका ट्रम्प को ! खैर इस भिष्ण गूढ़ ब्रम्ह ज्ञान का आभास होते हुए भी, और इस चिंता को दरकिनार करते हुए की लोग मेरे जाने के बाद मेरे साथ में क्या दे के भेजेंगे ,  "घर" और बुजुर्ग होते माता पिता को  छोड़ कर नोकरी पर जाने के अलावे कोई और दूसरा विकल्प नहीं बचता है । पिछले 10 सालों के दौरान जब -जब नोकरी के लिए घर को छोड़ता हूँ ,कसम से (आप चाहे जो भी कसम खिला लें हम खा लेंगें) मन भारी हो जाता है , लगता है घर, घर नही रहा मायका हो गया है । एक बात जो दिल और दिमाग को हमेसा चुटकी काटते रहती है वो ये की बेटा ये नहीं करोगे तो खाओगे क्या और खिलाओगे क्या ???? तुम्हारे पास इसके अलावे है  क्या ???? यक्ष प्रश्न सामने  !! जवाब ढूँढने की कोसिस होती है , उत्तर आता है :- पापा की  नोकरी ; ना वो उनकी है , खेती ; वो तो भगवान भरोसे है अगर थोडा बहुत हो भी जाता है तो थोडा ही है !   बाकि कुछ बचता नहीं है । दिमागी युधिस्ठिर शांत , निःशब्द और मौन रह जाता है । यक्ष जीत जाता  है ।  दिमाग दिल के भावनावों को रौंदते हुए ममता के बंधन को क्षत -वीक्षत करते हुए यह एकल आदेस पारित करता है की मोह मोह के धागे को तोड़ो और अपनी लुटिया समेटो । 

बचपन से ही दिमाग में एक चीज भर दी जाती है अपने यहाँ  बड़े हो के नोकरी करना  पड़ेगा , बहार रहना होगा , सब तरह से तैयारी करना है, नहीं तो भूखे मारोगे , कोई दूसरा उपाय नहीं है । बस वही किये जा रहा हूँ ।  जी रहा हूँ बस जिए जा रहा हूँ ।