शनिवार, 5 दिसंबर 2015

सोसल मीडिया

कितना  कुछ  अच्छा  भी हुआ  है ना सोशल  मीडिया  के पदार्पण  से !

जिन्दगी  की भागमदौड में  भागते  हुए  थक कर जब कभी  आप चैन की साँस  लेते  हुए  कुछ  सुकून  भरे  पल  बिताते  हैं  और आपकी  स्मृतिपटल  की कुछ   सुनहरी , स्वर्णिम  और रुहानी  स्मृतियाँ  ,जिसे आपने  रत्न  जडित चँन्द्रहार की भांती  संजो के रखना चाहा होगा आपके  दृष्टिपटल पर चलचीत्र की भांती  सिलसिलेवार तरीके  से दृष्टिगोचर होने  लगती है तो फिर  क्या कहने  ।

हर तरफ गीत - संगीत  का जलसा  कुछ यूँ चल पड़ता है ।

"हाले दिल को सुकूँ चाहिए ,  दूरी  की आरजु चाहिए  ।
जैसे पहले  कभी कुछ  चाहा नहीं  ,
दिल को तेरी  मौजूदगी  का एहसास यूँ  चाहिए  ।।

परदे  पर बदलते  मँजर के साथ  - साथ  आपके  उमंगों का तरंग पूर्ण  विक्षोभ के साथ  आपको  मस्त  करता  जाता  है ।
हंलाकी यादों  के रुहानी सफर से आप वापस  नही लौटना  चाहते  होंगे  लेकिन  वक्त  का हंसी सितम  भी तो देखीए , लौटना  ही  पड़ता  है । सुनहरी  यादें , डायरी  के  पन्नों  में  सिमटकर फिर  से बंद  हो जाती  है । जिन्दगी चल पड़ती  है  अपने  रफ्तार  पर ,अपने  रूप  में  ,अपने  रंग  में  •••• फिर  से भागमदौड भरे  सफर पर ।

कुछ  निश्चित अंतराल  पर सोसल मीडिया  (फेसबुक )आपके  व्यस्त्तम जिवन में  दखल देते हुए अपनी और ध्यान  खींच  कर   ( today you hav memory with ........  ) फिर  से वही सुनहरी  यादों  को सामने  लाता  है  और  फिर......  वही कर्तराल ...... वही राग ......वही  संगीत......। भागती हुई  जिन्दगी  में  थमे  हुए  आप ।

महाभारत  कालीन  धृतराष्ट्र - संजय  प्रसंग   की यादें  उस समय  और भी ताजा हो जाती  है , जब कुछ  विशेष  आयोजन  में  आपकी  उपस्थिति  अनिवार्य  रहती  है और आपके  उपस्थित रहने  के  इच्छा  के विरुद्ध  आप  चाह कर भी  हाजिर   नहीं  हो पाते हैं  , महाभारत  कालीन  संजय का अभिनय  भी सोसल मीडिया दूर बैठे  हुए  सारे  आख्यानों को सचित्र सूनाया करता  है ।

मंगलवार, 24 नवंबर 2015

चतुर्थी का चँद्रमा

रात के 12:30 बज चुके  हैं , नींद बेमानी  के मुड़  में  है । कहते  हैं  :-

नींद आधी मौत है ,
और
मौत मुक्कमल़ नींद है ।

पर यहाॅ न तो नींद आ रही है और
खैर दुसरे के बारे में कौन सोचना चाहता है ।

बालकनी में  बैठे  प्रकृती के नयनाभिराम दृश्य का अवलोकन  शाश्वत  शांति  की अथाह अनुभूति प्रदान कर रही  है ।

चतुर्थी  का चँद्रमा इस रात की पूरी  जवानी  पर अपनी  चाँदनी का साथ मस्त  है । कल आने वाले पुर्णीमा का इंतजार,  जिसमें उसे पुर्ण स्वरूप की प्राप्ती होगी और जिसे  पाने के लिए  उसने ना जाने  कितने ही घनघोर काली  रातों  का हलाहल सहर्ष स्वीकार किया  होगा, उसे बेसब्री से बेसब्र किया  जा रहा है ।
गुलाबी  सर्द सही मायनों  में  गुलाबी  होती  है इस बात  का प्रमाण गुलाब  की गुलाबी  खुशबू  दे रही है जिसे  आँगन के दूसरे  छोर से आती गेंदे की मीठी  खुशबू  लगातार  चुनौती  दिये जा रही  है ।

सागोन के दो ऊँचे  दरख्त जिसकी  छंटाइ हाल ही में  हुई  है अपना  गर्दन उठाये समाज में  अपनी  समुचित  उपस्थिति  सामने  खड़े  कदम्ब के  दो वयस्क  वृक्षों को चुनौती  पुर्ण तरीके  से दे रहा है ।

तुलसी  पिण्ड की तुलसी  अपनी  महिमा  का बखान  करते हुए  हमें  आस्तीक बने रहने  के लिए  प्रेरीत कर रही  है ।

धरा श्वेत  चाँदनी से जगमगा रही है,  ओश की छोटी -छोटी  बुन्दें जो अब दुब घास पर  अपना  आकार ले चुकी  है मोतीयों की चमक बिखरे  रही है ।

जिव,  जन्तु, पेड़, पोधे,  पुष्प, कलियाँ, सजीव और निर्जिव, ममता स्वरूपी धरा सभी को अपने  आँचल में  समेटे,    शांति  के आगोस में  लीन हुए  जा रही है । शांति .......  शाश्वत  शांति ....... ।

और मैं अपने  बालकॅनी से बैठे  हुए  प्रकृती की इस अनुपम  सुंदररता को निहारते हुए  अविभुत होता जा रहा हूँ  ।

गुरुवार, 19 नवंबर 2015

चलंत दुकानें

अपने  बाजार, कस्बे,  गली,  मोहल्ले  मे घुमते   हुए आप की नजर उन तमाम  चलंत,  छोटे,  बड़े   दुकानों (खाने -पीने )  यंहा तक रेस्तराँ के मुल्य तालिका   के उपर लिखे  जुमले पर जाती  ही होगी  जिसमें  किसी  क्षेत्र विशेष  के विशिष्ठ पकवान का जिक्र  उसी  क्षेत्र  के विशिष्ठ प्रादेशिक शब्दों  का काॅपी - पेस्ट  कर कुछ  यूँ   काया जाता है  " मारवाड आइसक्रीम  ",  " आगरे का पेठा",  बनारसी पान,  " कोलकतार रसगुल्ला  और ना जाने कितने । कुछ विशेष  सहरों से जुड़े  ये वो कुछ विशेष   चुनिंदा व्यंजन हैं   जिसके नाम से भी  लोगों  के  दिलो -  दिमाग में  स्वाद की एक मीठी   खुशबू  की लहर सी दौड़  पड़ती है, भले  ही  क्यों ना उन सभी  व्यंजनों को बनाने  में  सम्मील्लीत लोग,  प्रयुक्त  सामग्री,  बनाने  की विधि  और यहाँ  तक की जायका भी वहीं  का होता है, असल में  जहाँ  उसे बनाया  जा रहा होता है,  कई  दफा स्वादिष्ट,  कई दफा बहुत  स्वादिष्ट और  कई दफा  बिलकुल  नया जो अपने वास्तविक  स्वरुप,  रूप ,  रंग और जायके से बिलकुल  भिन्न होता  है ।

गर  लोगों के बीच व्यजनों  के  नामकरण  की काॅपी - पेस्ट  वाली  अवधारणा  समाप्त  होकर,   क्षेत्रीय नामकरण की  परीपाटी शूरु हो जाय तो यकीन  मानीए  कई  राज्यों की कई ऐसी  चीजें  मसहूर  हो जाऐंगी जिसे  खाकर  आप भी तृप्त महसूस  करेंगे  ।।

बुधवार, 18 नवंबर 2015

बचपन

प्रेरनादायी है यह बचपन ।।

वह उठता  है, चलता है, चलने  की कोशिश  में  गिरता  है, गिरते  हुए  फिर  उठता  है और तब तक शतत् प्रयासरत रहता  है,  जब तक वह निर्बाध रूप  से दौड़ने  नहीं  लगता  है । अपने  लक्ष को पाने  की उत्कट इच्छाशक्ति नींद  में  भी उसके नन्हें पैरों को चलाते  रहने  के लिए  आदेशीत करता रहता है ।

वह  क्षमा करता है बेसर्त,  खुशियाँ देता है हर वक्त,   क्षमा मानो उसके स्वभाव में  रचा-बसा है । एक  मुस्कान भी प्रयाप्त सा  है  उसके विरूद्ध हर अपराध  के एवज में  ।  कहते  हें ईश्वर  के बनाए  36 गुणों  में  क्षमा का स्थान सर्वोपरि  है  जिसे  वह अपने  करीब रहने वालों  को ही  प्रदान करता  है ।

वह सबको प्यार देता है बिना किसी  अभिलाषा  के और सबसे  प्यार लेता है बिना  किसी  आकांक्षा  के  ।

हम आप सभी के बीच  रहते  हुए   नन्हा  सा जान जिसे  आप छोटकु,   बाबू,  बेटु और ना जाने  कितने  नामों  से पुकारते हैं,   प्रेरणा का ऐसा  दीपक  है जो अपने  निश्छल,  निर्मल प्रकाष से  आपको  नित -निरंतर प्रकाषित करते हुए ,   सरल,  सहज,  निश्छल,  निष्कपट और मासूम  बने रहते  हुए  लगातार आगे बढ़ने  के लिए   प्रेरित करता है जिसे हम  बढते  उम्र,  धन,  पद और प्रतिष्ठा के  साथ ना जाने क्यों और किसलिये  छोडते जाते हैं  ।

किस बात का है ताना -बाना ।
एक दिन तुझे  तो एक  दिन  मुझे  भी जाना  ।।

रविवार, 18 अक्टूबर 2015

काल्पनिक मित्र


सप्ताहांत होने  के कारण  मित्रों के साथ  छोटे से शहर  के सबसे  बड़े  रेस्तराँ  (बड़े  शहरों  के छोटे  रेस्तराँ  जैसा ) में  रात्रि भोज का आयोजन  था ।
आयोजन  धीमें - धीमे  अपनी रफ्तार  पकड़  रहा  था!  मेरा ध्यान बगल वाली मेज पर बैठे  परिवार ( हम दो हमारे  दो)   जो पहनावे और बातचीत  से उच्च  मध्यम वर्गीय समाज  का हिस्सा जान पड रहे थे, के मुखिया  पर बरबस  ही आकर रुक जा रही थी । 
यूँ  तो कहने को वो चार लोग एक साथ बैठे  हुए  थे पर उन  चारों  के बीच  अप्रतक्ष रुप से  एक पाँचवाॅ भी जुड़ा हुआ  था/ थी,  जिसे  बोलचाल  में  भरचुअल मित्र भी कहते  हें और उनका  सुपुत्र लगातार  उससे  बात (चैट) करने  में  मसगुल था ।

पिता  नें कहा क्या लोगे बेटा? 
बेटे नें चोंकते हुए अपने  समार्ट फोन से ऊॅगलियां हटाया, 
ऊूँ ???

पिता  नें फिर वही  सवाल  दोहराया,  क्या लोगे बेटा? 
आपलोग जो चाहो ! 

पिता  नें अपनी  बेटी  से भी यही सवाल  किया किन्तु   संतोष जनक उत्तर नहीं पा के थोड़े  झल्ला रहे थे !  खैर मीनू  ऑडर कर दिया  गया ।
उनके आपसी बातचीत से यह पता चल रहा था  की बेटे का  किसी अच्छे संस्थान में  पठन -पाठन चल रहा था और अगले  दिन वह घर से  फिर पढ़ाई के लिए  जा रहा है
फोन की बजती लगातार  बीप परिवार  के हंसी-मजाक को हर बार विराम  दिये जा रही थी !  उसे अपने  परिवार के हंसी -मजाक से ज्यादा दिलचस्पी उस भरचुअल मित्र में था जो देश या दुनिया  के किसी  कोने  में  बैठा/बैठी  हुआ /हुई  था/थी ।
उनकी  सुपुत्री का भी कमोबेश यही हाल था ।वह भी जब - तब नजरें बचा के अपने  फौन को देख ही रही थी ।

पिता  नें झल्लाहट भरे नजरों  से अपनी  पत्नी की तरफ देखा  ! ऑखें सवाल पूछ रही थी !  क्या हो रहा है ये सब?     पत्नी नें भी नजरों  की भाषा  में  ही उत्तर दिया !  शांत  हो जाइए  ये यंग जैनेरेसन है आपकी तरह थोड़े  बुढ्ढे हो गयें हैं  !  पिता  भी अपने  आप को यह समझाते  हुए शांत कर गये जैसे  मानो यही कटु सत्य  हो ।  परंतु  अब माहौल  में  नाराजगी  स्पष्ट रुप से  झलक  रही थी ।

खाना  मेज पर आ चुका  था,  प्लेटें सज चुकी  थी!  बेटा  तुभ भी खाओ,  माँ  ने बेटे  से कहा ।

पिता   ने  गुस्साए नजरों  से पत्नी की और फिर  देखा,  इस  बार पत्नी की ऑखों से कोई  प्रत्युतर नहीं  आया नजरें  केवल यहीं कह रही थी "हम कर भी क्या सकते हैं ????

और मैं  ये सब अपने  टेबल पर बैठे  हुए देख रहा था,  पार्टी का आनंद घटने लगा था!!!!! :- रामकृपाल

डायरी के पन्नों से (किसान )

किसान  ।।

बस यूँ  ही

फिर  एक पुरानी कहावत लगातार  याद आ रहीहै ! 

"गरीबैं नै करीयै गरब !
जैहै दिन  दाल भात सैहे दिन  परब !  "
(शाब्दिक अर्थ :- गरीब को घमंण्ड नहीं  हो सकता 
                         जिस दिन  दाल - चावल नसीब हो जाए
                         वो दिन ही त्योहार समान हो जाता  है )

गरीबों के संद॔भ में ये  बातें  आज  के अत्याधुनिक डिजिटल इंडिया  में भी उतनी ही सटीक और सत्यपरक मालूम  पडती  है जितना  की आज से 15-20 साल पहले  ।
गरीबों के यंहा दाल और थाल में  मानो आपसी  रक्त - रंजीस छिड़ी हुई  है !   प्याज  मुँह  फुलाये हुए  बैठा हुआ है । बड़े  ही मान - मन्नौवल्ल   से किसी - किसी   दिन  इन सबों मै आपसी सहमति  बनती भी है तो यह सहमति छनिक ही होती है । 

केवल यही नहीं  यकीन  मानिए हम - आप में  से बहुतों  घरों  में  प्याज - दाल  के उपयोग  पर कुछ  ना कुछ  नियंत्रण लगा ही है ।

डिजिटल  इंडिया से याद आया पिछले  दिनों   जुकरब॔ग साहब के बेजोड प्रयोग ने,  (चाहे उनका  इरादा   किसी  कम्पनी का विज्ञापन करना ही क्यों ना रहा हो,  और  हंलाकी  जिसे बाद में  हटा ही क्यों ना लिया  गया हो)    हम आप सभी नें उनके इस अनुपम प्रयोग को  धव्नीमत से  अपनाया ही नहीं  बल्कि  जोरदार और  धुआँधार  तरिके से  इसका प्रचार -प्रसार भी किया । चाहे  आपने इसे  श्वैक्षीक अभिव्यक्ति  के पक्षधर के रूप में   या किसी पुर्वाग्रह  से ग्रसित होकर ही क्यों ना किया हो ।  खैर इसका सम॔थन होना ही चाहिए  क्योकी डिजीटल इंडिया अभियान आज के दौर का  महत्वपुण॔  ही नहीं  अपितु  आवश्यक अभियान  भी है ।

एक चिर सत्य यह भी है की  भारत गाँवों का देश है और सहर की संपूर्ण आबादी  अनाज के मामले में  गाँवों पर ही निर्भर रहती  है । और अनाज  की उपज निर्भर  रहती  है किसानों पर  अगर हम अपनी   थोडी सी सहभागिता, ध्यान,रुझान  किसान  और  किसानी  की  और भी  दें  जिससे    सरकार का ध्यान किसानों  पर बना रहे  और पैदावार की विकट  समस्या से  निपटने  का समुचित  समाधान  निकाला  जा सके तो गरीब  भी थाल और दाल के झगड़े  से मुक्ति  पा सकेंगे !   और फिर  बड़े   आराम  से कहेंगे  ! 
"दाल रोटी  खाएंगें और  प्रभू के गुन गाएंगें " ।
- रामकृपाल