रविवार, 18 अक्टूबर 2015

डायरी के पन्नों से (किसान )

किसान  ।।

बस यूँ  ही

फिर  एक पुरानी कहावत लगातार  याद आ रहीहै ! 

"गरीबैं नै करीयै गरब !
जैहै दिन  दाल भात सैहे दिन  परब !  "
(शाब्दिक अर्थ :- गरीब को घमंण्ड नहीं  हो सकता 
                         जिस दिन  दाल - चावल नसीब हो जाए
                         वो दिन ही त्योहार समान हो जाता  है )

गरीबों के संद॔भ में ये  बातें  आज  के अत्याधुनिक डिजिटल इंडिया  में भी उतनी ही सटीक और सत्यपरक मालूम  पडती  है जितना  की आज से 15-20 साल पहले  ।
गरीबों के यंहा दाल और थाल में  मानो आपसी  रक्त - रंजीस छिड़ी हुई  है !   प्याज  मुँह  फुलाये हुए  बैठा हुआ है । बड़े  ही मान - मन्नौवल्ल   से किसी - किसी   दिन  इन सबों मै आपसी सहमति  बनती भी है तो यह सहमति छनिक ही होती है । 

केवल यही नहीं  यकीन  मानिए हम - आप में  से बहुतों  घरों  में  प्याज - दाल  के उपयोग  पर कुछ  ना कुछ  नियंत्रण लगा ही है ।

डिजिटल  इंडिया से याद आया पिछले  दिनों   जुकरब॔ग साहब के बेजोड प्रयोग ने,  (चाहे उनका  इरादा   किसी  कम्पनी का विज्ञापन करना ही क्यों ना रहा हो,  और  हंलाकी  जिसे बाद में  हटा ही क्यों ना लिया  गया हो)    हम आप सभी नें उनके इस अनुपम प्रयोग को  धव्नीमत से  अपनाया ही नहीं  बल्कि  जोरदार और  धुआँधार  तरिके से  इसका प्रचार -प्रसार भी किया । चाहे  आपने इसे  श्वैक्षीक अभिव्यक्ति  के पक्षधर के रूप में   या किसी पुर्वाग्रह  से ग्रसित होकर ही क्यों ना किया हो ।  खैर इसका सम॔थन होना ही चाहिए  क्योकी डिजीटल इंडिया अभियान आज के दौर का  महत्वपुण॔  ही नहीं  अपितु  आवश्यक अभियान  भी है ।

एक चिर सत्य यह भी है की  भारत गाँवों का देश है और सहर की संपूर्ण आबादी  अनाज के मामले में  गाँवों पर ही निर्भर रहती  है । और अनाज  की उपज निर्भर  रहती  है किसानों पर  अगर हम अपनी   थोडी सी सहभागिता, ध्यान,रुझान  किसान  और  किसानी  की  और भी  दें  जिससे    सरकार का ध्यान किसानों  पर बना रहे  और पैदावार की विकट  समस्या से  निपटने  का समुचित  समाधान  निकाला  जा सके तो गरीब  भी थाल और दाल के झगड़े  से मुक्ति  पा सकेंगे !   और फिर  बड़े   आराम  से कहेंगे  ! 
"दाल रोटी  खाएंगें और  प्रभू के गुन गाएंगें " ।
- रामकृपाल

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