वोल्ट हँसते हुए कहते हैं कि आप सौ आदमियों को कतार में खड़ा कर बारी-बारी से बास्केटबॉल, फुटबॉल या क्रिकेट के विश्वप्रसिद्ध खिलाड़ियों के नाम को पूछें !
ऐसा करने से इस बात की शत-प्रतिशत सम्भावना बनी रहेगी कि उनकी सहमति किसी एक खिलाड़ी के नाम पर ना बने। लेकिन अगर आप उनसे दुनियाँ के सबसे बेहतरीन धावक का नाम पूछेंगे तो इस बात की भी शत-प्रतिशत सम्भावना रहेगी कि वो एक ही नाम लेंगें "उसेन बोल्ट" !
दरअसल ये उनके मन मे उपजा हुआ विश्वास है जिसे अर्जित करने के लिए समर्पण के इस यज्ञ कुंड में मैंने अपना सर्वस्व आहूत कर दिया था। 6.8 बिलियन जनसंख्या वाली दुनियाँ में, आजतक लगभग 107 बिलियन लोग रह चुके हैं। लेकिन जब आप यह जानते हैं कि आप इन सबों में सबसे तेज हैं तो यह आश्चर्यजनक सा लगता है। "इट डजन्ट गेट ऐनी कूलर देन नोइंग यू आर द फास्टेस्ट देन देम"।
15 साल की उम्र में ही विश्व जूनियर एथिलट चैम्पियनशिप में गोल्ड मैडल जितने वाले बोल्ट ने जब 2004 के एथेंस ऑलम्पिक के ट्रेक पर अपना डेब्यु किया था, तो दर्शकों की करतल ध्वनियाँ बोल्ट के सहर्ष अभिवादन को आतुर थीं। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। कम उम्र में ही मिली सफलता और उससे उपजे उन्माद को पचा पाने में असफल रहे बोल्ट की अनियमित दिनचर्या ने उनके रफ़्तार को असाधारण रूप से छति पहुंचाई थी। बोल्ट को छठे पायदान से ही संतोष करना पड़ा था।
हालांकि ये हार बोल्ट द्वारा साध्य कर पाना कठिन था, अपितु, उनके कैरियर के उत्थान का वास्तविक प्रारूप इस हार ने ही ड्राफ्ट किया था। बोल्ट ने यहाँ से पीछे मुड़ कर कभी नहीं देखा। वो मैदान पर उतरते और पुराने रिकॉर्ड को ध्वस्त कर नए कीर्तिमान स्थापित करते। कई बार दूसरे खिलाड़ियों का और कई बार खुद के ही स्थापित रिकॉर्डों का!
2008 के बीजिंग, 2012 के लंदन और 2016 के रियो ऑलम्पिक में 100 मीटर और 200 मीटर के दौड़ में रफ्तार के इस अजेय योद्धा ने स्वर्ण पदकों की झड़ी लगा दी। बोल्ट ने अपने सभी प्रतिस्पर्धाओं के स्वर्ण पदकों को अपने नाम कर लिया था। तीन ओलम्पिक और हर पर्तिस्पर्धा के तीनो स्वर्ण पदक। बोल्ट, कार्ल लुइस के रिकॉर्ड को तोड़ कर ऐसा कारनामा कर इतिहास रच लिया था। ट्रिपल-ट्रिपल...
बोल्ट आगे कहते हैं कि लोग अक्सर मुझसे पूछते रहते हैं, क्या ऐसा करना आसान है? "इट्स प्रिटी कुल एंड इजियर"। मैं अक्सर उन्हें यही जवाब देता हूँ। लेकिन वास्तव में ये सब इतना आसान नहीं है। बोल्ट को बोल्ट बने रहने की पीछे घण्टों का संयमित मेहनत और उससे उपजता थकावट है। जिससे बोल्ट को नियमित जूझना पड़ता है। लोगों को जीत पसंद होती है और वो वही देखना चाहते हैं। उन्हें पर्दे के पीछे चलने वाले संघर्षों से कोई राब्ता नहीं होता है..


