गुरुवार, 2 जुलाई 2020

उसेन बोल्ट और ट्रिपल-ट्रिपल ......

वोल्ट हँसते हुए कहते हैं कि आप सौ आदमियों को कतार में खड़ा कर बारी-बारी से बास्केटबॉल, फुटबॉल या क्रिकेट के विश्वप्रसिद्ध खिलाड़ियों के नाम को पूछें !
ऐसा करने से इस बात की शत-प्रतिशत सम्भावना बनी रहेगी कि उनकी सहमति किसी एक खिलाड़ी के नाम पर ना बने। लेकिन अगर आप उनसे दुनियाँ के सबसे बेहतरीन धावक का नाम पूछेंगे तो इस बात की भी शत-प्रतिशत सम्भावना रहेगी कि वो एक ही नाम लेंगें "उसेन बोल्ट" !
दरअसल ये उनके मन मे उपजा हुआ विश्वास है जिसे अर्जित करने के लिए समर्पण के इस यज्ञ कुंड में मैंने अपना सर्वस्व आहूत कर दिया था। 6.8 बिलियन जनसंख्या वाली दुनियाँ में, आजतक लगभग 107 बिलियन लोग रह चुके हैं। लेकिन जब आप यह जानते हैं कि आप इन सबों में सबसे तेज हैं तो यह आश्चर्यजनक सा लगता है। "इट डजन्ट गेट ऐनी कूलर देन नोइंग यू आर द फास्टेस्ट देन देम"।
15 साल की उम्र में ही विश्व जूनियर एथिलट चैम्पियनशिप में गोल्ड मैडल जितने वाले बोल्ट ने जब 2004 के एथेंस ऑलम्पिक के ट्रेक पर अपना डेब्यु किया था, तो दर्शकों की करतल ध्वनियाँ बोल्ट के सहर्ष अभिवादन को आतुर थीं। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। कम उम्र में ही मिली सफलता और उससे उपजे उन्माद को पचा पाने में असफल रहे बोल्ट की अनियमित दिनचर्या ने उनके रफ़्तार को असाधारण रूप से छति पहुंचाई थी। बोल्ट को छठे पायदान से ही संतोष करना पड़ा था।
हालांकि ये हार बोल्ट द्वारा साध्य कर पाना कठिन था, अपितु, उनके कैरियर के उत्थान का वास्तविक प्रारूप इस हार ने ही ड्राफ्ट किया था। बोल्ट ने यहाँ से पीछे मुड़ कर कभी नहीं देखा। वो मैदान पर उतरते और पुराने रिकॉर्ड को ध्वस्त कर नए कीर्तिमान स्थापित करते। कई बार दूसरे खिलाड़ियों का और कई बार खुद के ही स्थापित रिकॉर्डों का!
2008 के बीजिंग, 2012 के लंदन और 2016 के रियो ऑलम्पिक में 100 मीटर और 200 मीटर के दौड़ में रफ्तार के इस अजेय योद्धा ने स्वर्ण पदकों की झड़ी लगा दी। बोल्ट ने अपने सभी प्रतिस्पर्धाओं के स्वर्ण पदकों को अपने नाम कर लिया था। तीन ओलम्पिक और हर पर्तिस्पर्धा के तीनो स्वर्ण पदक। बोल्ट, कार्ल लुइस के रिकॉर्ड को तोड़ कर ऐसा कारनामा कर इतिहास रच लिया था। ट्रिपल-ट्रिपल...
बोल्ट आगे कहते हैं कि लोग अक्सर मुझसे पूछते रहते हैं, क्या ऐसा करना आसान है? "इट्स प्रिटी कुल एंड इजियर"। मैं अक्सर उन्हें यही जवाब देता हूँ। लेकिन वास्तव में ये सब इतना आसान नहीं है। बोल्ट को बोल्ट बने रहने की पीछे घण्टों का संयमित मेहनत और उससे उपजता थकावट है। जिससे बोल्ट को नियमित जूझना पड़ता है। लोगों को जीत पसंद होती है और वो वही देखना चाहते हैं। उन्हें पर्दे के पीछे चलने वाले संघर्षों से कोई राब्ता नहीं होता है..


जस्टिन गैटलिन की चुनौती और बोल्ट द्वारा अपने बादशाहत को क़ायम रखना.....

साल 2016 के रियो ऑलम्पिक की तैयारियाँ आखरी छोर पर खड़ी थी। बीजिंग और लंदन में आयोजित पिछले दो ऑलम्पिक के दौरान रफ़्तार में अपनी बादशाहत कायम कर चुके बोल्ट, 100, 200 और 400 मीटर रीले के सभी स्वर्ण पदकों को अपने नाम कर, विरोधियों को यह बता चुके थे कि असल मे रफ़्तार के वो ही क्षत्राधिपति हैं।
इधर बोल्ट को अपना चिरप्रतिद्वंद्वी मानने वाले जस्टिन गैटलिन पर लगा प्रतिबंध अब तक खत्म हो चुका था। एक इंटरव्यू के दौरान पूछे गए सवाल पर गैटलिन ने जवाब देते हुए कहा था कि "विजयी राष्ट्र ध्वजवाहक गैटलिन ही होगा" । दरअसल ये चुनोती सीधे-सीधे बोल्ट को थी। हालाँकि, बोल्ट ने गैटलिन के इस चुनौती का कोई मौखिक जवाब तो नहीं दिया था लेकिन उनके दिनचर्या को इस चुनौती ने प्रभावित तो किया ही था। बोल्ट हंसते हुए आगे कहते हैं "गैटलिन की स्ट्रेटजी काम कर गई थी" ।
लेकिन कठोर परिश्रम को चुनोतियों ने कब तक प्रभावित किया है भला! बोल्ट और गैटलिन अब ट्रैक पर फिर से आमने-सामने थे। बोल्ट ने पुनः सौ, दो सौ, और चार सौ मीटर रीले के सभी प्रतिस्पर्धाओं के स्वर्ण पदक को आपने नाम कर लिया था।
दौड़ खत्म होने के बाद फफ़कते हुए जस्टिन गैटलिन को बोल्ट ने गले लगा कर यह स्थापित किया की खिलाड़ियों के लिए जीत के साथ-साथ दूसरे खिलाड़ियों की भावनाओं का सम्मान महत्वपूर्ण होता है। दर्शकों की करतल ध्वनियाँ बजती रही। प्रशंसकों के नजर में बोल्ट का कद और भी बढ़ता गया। आखीर,यूँ ही तो कोई चैम्पियन नहीं बन जाता है ....
(तस्वीर में गैटलिन हैं । बोल्ट को कौन नही जानता ! उनका भला परिचय क्यों कराया जाए!)

दौड़ का इतिहास और उसेन बोल्ट....

आदमी अनादि काल से दौड़ता रहा है। सभ्यता के विकासपूर्व में मनुष्य भोजन की तालाश में दौड़ता था और सभ्यता के उत्तरार्ध में अब भी इसकी दौड़ जारी है।
एक सैनिक ने ऐसी ही दौड़ ईसा से 490 ईस्वी पूर्व, युद्ध मे जीत की खुशखबरी को अपने राजा तक पहुँचाने के लिए "मैराथन" से "एथेंस" तक बिना रुके ही लगाया था।
समय के साथ उस सैनिक की किंवन्दतियाँ भी आगे बढ़ती गयीं और अंत मे उसके सम्मान में दुनियाँ भर में दौड़ प्रतियोगितायें आयोजित होने लगीं। प्रतियोगिता शुरू हुआ तो सर्वश्रेष्ठ धावकों (जिसकी सूची काफी लंबी है) ने अपनी कीर्ति को स्थापित कर नए-नए कीर्तिमान बनाये। एक बनाता तो दूसरा उसे तोड़ उससे भी श्रेष्ठ कीर्ति स्थापित करता। समय आगे बढ़ता गया और सर्वश्रेष्ठ धावकों की सूची लम्बी होती गई।
मेरे लिए सर्वश्रेष्ठ धावक के रूप में पहला नाम जमैका के "असफा पॉवेल" थे। इसमे कोई दो मत नहीं है कि इनके पहले भी कई दिग्गजों ने अपनी कीर्ति यहाँ स्थापित की थी। लेकिन, पढाई के दौरान मेरे द्वारा किसी धावक का पहला परिचय पॉवेल ने उस समय कराया था जब उन्होंने 2005 में 100 मीटर रीले को 9.77 सेकेंड में दौड़ कर विश्वखेल जगत में अपना झंडा लहराया था।
पहला परिचय लोगों को बहुत दिनों तक याद रहता है इस कारन पॉवेल आज भी मुझे प्रिय हैं। फिर जस्टिन गैटलिन आ गए। कुछ दिन रुके और डोप टेस्ट में फेल होने के बाद कहीं नेपथ्य में गुम हो गए। अब बोल्ट आ गए थे। "उसेन सेंट लियो बोल्ट"। बोल्ट आये, रफ़्तार के आश्चर्यजनक कीर्तिमान को स्थापित किया और अपने कैरियर के उत्थान पर विराजित रहते हुए ही 2017 में इस खेल से विदा ले लिया। पॉवेल मेरे प्रिय रहे हैं लेकिन बोल्ट जैसा कोई नहीं !
कार्ल लुइस से क्षमा याचना के साथ......
(तस्वीरें इंटरनेट से ली गई हैं। बांयें से क्रम में पॉवेल, गैटलिन और बोल्ट हैं)


कारगिल विजय के इक्कीस साल.......

कारगिल - बटालिक सैक्टर - तासी नामगियाल - कैप्टन सौरभ कालिया और ऑपरेशन विजय की शुरुआत.....
उन्नीस सौ निन्यानबे का अप्रेल अपने आखरी दिनों में था। कारगिल के बटालिक सैक्टर के नजदीक "गेरकोन" गाँव में रहने वाले तासी नामगियाल का याक जिसे उन्होंने 12 हजार रुपए से खरीदा था, पिछले तीन-चार दिनों से घर नहीं लौटा था। तासी नामगियाल अपने बायनाकुलर और कुछ साथियों के साथ अपने याक को खोजने पहाड़ों की तरफ आगे बढ़े। बायनाकुलर के सहारे तासी नामगियाल ने अपने याक को तो खोज लिया था लेकिन इस दौरान उन्हें चोटियों के ऊपर आर्मी के वर्दी में बंकर बनाते कुछ लोग भी दिख गए थे जिनकी एपियरेंस पठानों की जैसी थी और उनके पास बंदूके भी थीं।
तासी नामगियाल अपने गाँव लौट कर इस खबर की सूचना, उनके गाँव मे ही रुके सेना के पंजाब रेजिमेंट के जवानों तक पहुँचा दिया था। सेना में यह खबर आग की तरह आगे बढ़ी। सेना ने वास्तविक स्थिति का पता लगाने के लिए कई पैट्रोल टीमों का गठन एक साथ किया था। लेफ्टिनेंट सौरभ कालिया के कमांड में भी एक पैट्रोल पार्टी को एडवांस करने का आदेश मिला था।
पढाई के दिनों में स्कॉलरशिप पाने वाले लेफ्टिनेंट सौरभ कालिया ने दिसम्बर 1998 में भारतीय सेना के फोर्थ जाट रेजिमेंट को जॉइन किया था और उनकी प्रतिनियुक्ति 1999 के हाल के दिनों में ही कारगिल में हुई थी। लेफ्टिनेंट कालिया ने अपने गस्त के दौरान यह पाया कि पहाड़ की चोटियों पर कुछ संदिग्ध लोग भारतीय बंकरों (पाकिस्तान और भारत की सेना एक समझौते के तहत ठंडे के दिनों में अपने-अपने बंकरों को खाली छोड़ पहाड़ के नीचे चले आते थे) में अपनी बन्दूकों और भारी मसीनगनों को माउंट कर रखा था। लेफ्टिनेंट सौरभ कालिया ने इस खबर को सेना तक सबसे पहले पहुंचा दिया था।
पंद्रह मई 1999 को लेफ्टिनेंट सौरभ कालिया अपने पाँच जवान साथियों के साथ जब काकसर सैक्टर के बजरंग पोस्ट की पैट्रोलिंग करते हुए आगे बढ़े थे कि अचानक ही उनकी पैट्रोल पार्टी पर पहाड़ की चोटियों से ताबड़तोड़ गोलियों की बौछारें आनी शुरू हो गईं। लेफ्टिनेंट सौरभ कालिया और उनके साथियों की गोलियां लगातार खत्म हो रही थी। उन्होंने मदद के लिए बैकप का सन्देश रेडियो सेट से रीले किया। लेकिन जब तक भारतीय सेना की रिइंफोर्समेंट उन तक पहुँचती पाकिस्तानी सैनिकों ने सौरभ कालिया और उनके पाँच साथियों को जिंदा ही पकड़ लिया था।
गोपनीय तथ्यों को उगलवाने के लिए पाकिस्तानी सैनिकों ने लेफ्टिनेंट सौरभ कालिया और उनके साथी जवानों को सात जून 1999 (22 दिन) तक क्रूरता के आखरी छोर तक प्रताड़ित किया। लेकिन भारतीय सेना के बहादुर जवानों की सत्यनिष्ठ देशभक्ति से हार कर पाकिस्तानी सैनिकों को जब कुछ हासिल नहीं हो पाया तो अन्ततः इन्हें जान से मार दिया गया। असहनीय पीड़ा को हँसी-हँसी बर्दास्त करते हुए भारत माता के ये वीर सपूत वीरगति को प्राप्त हुए थे।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट पाकिस्तानी सैनिकों की नीचता और क्रूरता को तस्दीक करते हुए यह कहती है कि उनके कानों में गर्म सलाखें डाल दी गई थी। दाँत निकाल लिए गए थे। आँखें निकालने से पहले उन्हें बुरी तरह से छतिग्रस्त किया गया था। जबड़े तौड़ दिए गए थे। होंठों को काट लिया गया था। नाक तोड़ दिए गए। हड्डियाँ तोड़ दी गईं थी आगे और भी बहुत कुछ है जिन्हें नहीं लिखा जा सकता है....।
लेफ्टिनेंट सौरभ कालिया और साथी जवानों की शहादत के प्रतिशोध में भारतीय सेना ने अब ऑपरेशन विजय का आरम्भ किया था ।