मंगलवार, 27 दिसंबर 2022

भगवान श्रीकृष्ण द्वारा हेतुतः सोलह सहस्त्र स्त्रियों का वरण।

भगवान श्रीकृष्ण द्वारा हेतुतः सोलह सहस्त्र स्त्रियों का वरण।
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अपनी अमोघ शक्ति को लहरों में सीमित कर दिन भर लपलपाता हुआ समुद्र रात में उन्हीं लहरों से लयबद्ध और गुडरम्य गर्जन करता है। रात में सागर की यह भाषा श्रीकृष्ण को और सुहाती थी। द्वारिका के निर्माण का एक कारक यह भी तो था। 

लेकिन श्रीकृष्ण के चक्रवर्ती जीवन को स्थैर्य रास कहाँ आता था भला। उनके दरबार का एकमात्र धेय्य ही दीन-दुखियों के कष्टों का निवारण मात्र था। कामरूप के राजनगर प्राग्ज्योतिषपुर के राजा "नरकासुर" के अत्याचार से त्रस्त होकर वहाँ से भागी हुई कुछ स्त्रियाँ आज श्रीकृष्ण के सम्मुख गुहार लगाने आयीं थी। 

अपने नाम के अनुरूप ही कुकृत्य करने वाले अत्याचारी "नरकासुर" ने अपने कारागृह में सोलह सहस्त्र स्त्रियों को बन्दी बनाकर उनके जीवन को नर्क की यातनाओं में धकेल रखा था। उस नर्क का वही राजा था और वही यमराज। भूख और उस अत्याचारी की यातना सहते हुए कई स्त्रियां उस कैद में ही कालकवलित होती जा रहीं थी। 

क्या उन निष्पाप सहस्त्रों नारियों का इस विराट आर्यावर्त में कोई त्राता नहीं है महाराज? दोनों हांथों को ऊपर उठा कर जीवन संकट से लड़ती हुई स्त्रियों ने कृष्ण के सम्मुख हृदयभेदी चीत्कार किया। 

भगवान श्रीकृष्ण के मुखमंडल का तेज कुछ क्षण के लिए मलिन सा हो गया। मानो उन स्त्रियों के दुःखों के काले बादल उनके चमकते हुए चेहरे के तेज को ढांपने आ गए हों। सहसा श्रीकृष्ण उठे और बोल पड़े। नारायणी सेना प्राग्ज्योतिषपुर जाएगी। कामरूप की कलंकित होती धरा नरकासुर के पापों से मुक्त होगी।

यह कार्तिक चतुर्दशी का दिन था। नारायणी सेना और नरकासुर की सेनाएं के बीच, लोहित गंगा (ब्रम्हपुत्र नदी) के किनारे, प्राग्ज्योतिषपुर की समरभूमि में रोमहर्षक युद्ध हुआ। नरकासुर नारायण के हाथों मारा गया। कामरूप की युद्धभूमि का सूखा तृण राक्षसों के लहू से रक्तस्नात हो गया। सभी बन्दी स्त्रियों को नरकासुर के नर्क से मुक्ति दिलाई गई और उन्हें उनके घर के लिए विदा किया गया।

लेकिन शाम होते होते वो सभी स्त्रियां पुनः वापस लौटने लगी। उनके स्वजनों ने उन्हें अस्वीकृत कर आश्रय देने से मना कर दिया था। श्रीकृष्ण द्वारा प्राप्त मुक्तिदान अब उन स्त्रियों के लिए अभिशाप बनकर काले नाग की भांति फन काढ़े हुए निर्भीक खड़ा था। 

भगवान श्रीकृष्ण का मुखमण्डल पहले की भांति मलिन नहीं हुआ। वे थोड़ा रुके और सहसा मुस्कुराते हुए राजमहल से बाहर निकले जहाँ सभी स्त्रियाँ अपने घरों से असहाय लौट कर खड़ी थीं। अपने ग्रीवा को गगन गामी करते हुए भगवान श्रीकृष्ण ने सभी स्त्रियों को सम्बोधित किया। 

"मैं द्वारिका के महाराज वसुदेव का पुत्र श्रीकृष्ण अपने कुलदेवी "इडादेवी" को स्मरण करते हुए आप सभी स्त्रियों को अभयदान करने की घोषणा करता हूँ। हे समाज की बहिष्कृत नारियों मैं तुम्हें पत्नी के रूप में स्वीकार करता हूँ। मेरे नाम का मंगलसूत्र धारण कर समस्त आर्यावर्त में कहीं भी और किसी से भी तुम अधिकारपूर्वक कह सकती हो कि मैं द्वारिकाधीश श्रीकृष्ण की पत्नी हूँ। आज से तुम सब द्वारिका की हो। तुम्हारे सम्मान की रक्षा करना मेरा प्रथम कर्तब्य होगा।"

सम्पूर्ण राजमहल श्रीकृष्ण के जयजयकारों से गूंज उठी। सेनाएं वापस लौटने लगी। द्वारिका उन सभी स्त्रियों के सम्मान की प्रतीक्षा में जगमगाने लगा...

शनिवार, 24 दिसंबर 2022

सनातन संस्कृति में शुभ कामनाओं की पूर्ति का प्रतीक स्वस्तिक और पश्चिमी देशों की कुंठाएं....

सनातन संस्कृति में शुभ कामनाओं की पूर्ति का प्रतीक स्वस्तिक और पश्चिमी देशों की कुंठाएं....
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सभ्यता के विकास के क्रमानुक्रम में  मानव ने अपनी भावनाओं को सम्प्रेषित करने के लिए नए मार्ग का सृजन कर लिया था। लोग अपने दैनिक जीवन से जुड़े क्रियाकलापों को चित्रों के माध्यम से गुफा की दीवारों पर अंकित करने लगे थे।इतिहासकारों के अथक प्रयासों के बावजूद भी इन चित्रों और संकेतों के समूहों में से कुछ ही संकेत ऐसे थे जिनके रहस्यों की जानकारी को ढूंढने में सफलता प्राप्त हो सकी।

मानव जीवन मे शुभ संकेतों के वाहक का प्रतीक "स्वस्तिक" का रहस्य भी ऐसा ही है जिसके अस्तित्व का प्रमाण ईसा से दस हजार साल पूर्व तब का माना जाता है जब इतिहास अपने पासाण काल मे था। हालांकि, स्वस्तिक के रहस्यों के लिखित इतिहास की चर्चा अगल-अलग जगहों और अलग-अलग समयों पर होता रहा है। पर्सियनों के धर्म ग्रन्थों में स्वस्तिक को अनन्त और सतत सृजनात्मकता का प्रतीक माना गया है। सिंधु घाटी सभ्यता में इसका प्रयोग शुभ कार्य हेतु लिखित और सांकेतिक रूप से होने के प्रमाण प्राप्त हुए हैं। भारतीय इतिहास में स्वस्तिक के नाम का पहला लिखित साक्ष्य पाणिनि के अष्टाध्यायी (6 ईसा पूर्व) में मिलता है जहाँ इस स्वस्तिक के चित्र का नामकरण "स्वस्तिक" के रूप में वर्णित है। अपितु इतिहासकार यह मानते हैं कि स्वस्तिक का प्रयोग वैदिक और उत्तर वैदिक कालों में भी अनुष्ठानों के सम्पादन हेतु किया जाता रहा है।

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सनातन संस्कृति में बैकुंठ को आत्मा की अनन्त यात्रा का अंतिम पड़ाव माना गया है और ऐसी मान्यता है कि बैकुंठ, ध्रुव तारे के उस पास की दुनियाँ है जिसकी परिक्रमा सप्तऋषियों का समूह वर्ष भर करते रहते हैं। सप्तऋषियों की इस परिक्रमा के फलस्वरूप जो आकृति बनती है वो स्वस्तिक कहलाती है। एक वैदिक मान्यता यह भी है कि स्वस्तिक के चारों फलकें चार वेदों का प्रतीक हैं। ये चार पुरुषार्थ, चार आश्रम, चार लोक और चार देवों का भी प्रतीक है। बौद्ध और जैन ग्रन्थों में भी इसे शुभ प्रतीक के रूप में माना गया है।  

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बाद के वर्षों में स्वस्तिक की महिमा से मुग्ध होकर दुनियाँ ने इसकी प्रसंसा मुक्त कण्ठ से चारों दिशाओं में किया। अमेरिका के इन्फेंट्री डिवीजन से लेकर फिनलैंड की वायुसेना तक ने स्वस्तिक के प्रतीक चिन्हों का उपयोग अपने झंडे के लिए किया। हलांकि पश्चिम के लोगों को दूसरों की संस्कृति से चिढ़ने का एक दीर्घकालिक इतिहास रहा है सो उन्होंने इस बार भी ऐसा ही किया। हिटलर द्वारा उपयोग किये जाने वाले  "हेकेनक्रेज" या "हुक्ड क्रॉस" को उन्होंने स्वस्तिक के समान ही मान लिया।अब चुकी हिटलर द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला हेकेनक्रेज को विनाश का प्रतीक माना जाने लगा था और इसके इस्तेमाल पर हर तरफ प्रतिबन्ध था इसलिए स्वस्तिक के इस्तेमाल पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया। 

उन्हें इस बात से कोई राब्ता नहीं कि मानव सभ्यता के दीर्घकालिक इतिहास को समेटे हुए स्वस्तिक का प्रतीक सनातन धर्म के आधार स्तम्भों में से एक आधार है जिसकी उत्तपत्ति ही शुभ कार्यों हेतु हुई है....

मंगलवार, 20 दिसंबर 2022

जादूगर मैसी

कर्मण्येवाधिकारस्ते सर्वभौम है, लेकिन ऐसा अक्सर ही होता है कि जब सभी परिस्थियां, सभी नक्षत्र, सभी हितैषी एक सीध में आपके पक्ष में खड़े हों तब किसी अभीष्ट कामना की पूर्ति होती है। छत्तीस वर्षों के अंतहीन प्रतीक्षा में व्यग्रता से खड़ा अर्जेंटीना के लिए आज का दिन ऐसा ही रहा। 

उत्साह,अनुशासन और जीत की भूख को समेट कर, अपने निर्धारित समय से ढेड़ गुने अधिक समय तक चलता हुआ यह खेल शुरुआती 60 मिनट तक मैसी के सम्मोहन में वशीभूत होकर उसी के इर्द गिर्द फुटबॉल की तरह घूमता रहा। 

एक जादूगर जैसे जैसे बूढा होता जाता है उसके सम्मोहन की माया का मायाजाल उतना ही व्यापक और सघन होता जाता है। मैसी के ड्रीब्लिंग,पास,और गोल पोस्ट पर दागे जा रहे शॉट्स के आकर्षण का मायाजाल आज दर्शकों पर ठीक वैसा ही काम कर रहा था और मंत्रमोहित होते दर्शकों का समूह ड्रम बजाते हुए खुशी से रोते जा रहे थे। अर्जेंटीना का राष्ट्रध्वज हर तरफ उन्मत्त होकर लहरा रहा था। 

खेल के 60 वें मिनट के बाद अर्जेन्टीना सुस्त हो चली थी। अघाई बिल्ली की तरह। खिलाड़ियों के पास की तरम्यता अब टूटने लगी थी। शुरुआती पेनाल्टी किक और एंजेल डी मारिया के दूसरे गोल के बदौलत जीत के प्रति आस्वस्त अर्जेंटीना का जादू खेल के 74वें में जैसे बिफर सा गया। समर्थकों के नाद और करतल स्वर की ध्वनियाँ जैसे स्तब्ध सी हो गई।  इस विश्वकप के सनसनी माने जा रहे ऐमबापे ने एक के बाद एक, दो लगातार गोल दागकर अर्जेंटीना के पैरों तले जमीन को अपनी और खींच लिया। 

2014 के विश्वकप के गोल्डन बॉल के विजेता रहे मैसी के जादू का तिलिस्म जैसे दरकता हुआ दिखाई पड़ने लगा। खेल 90 मिनट तक पहुँच कर 2-2 की बराबरी पर आकर वहीं रुक गया था जहाँ से इसकी शुरुआत हुई थी। बीच मे जो कुछ भी होता रहा,अब सब कहने सुनने की बातें मात्र थी। अगले 15 मिनट के अतिरिक्त समय मे फ्रांस का आक्रमण तेज तो हुआ लेकिन नतीजा वहीं का वहीं खड़ा रहा। शून्य पर। 

बोर्ड पर 15 अतिरिक्त मिनट का और समय जोड़ा गया। थकावट और दबाव के बीच चलते हुए खेल में मैसी के ड्रीब्लिंग का जादू एक बार फिर से चला, अर्जेंटीना को पुनःबढ़त मिली लेकिन ऐमबापे द्वारा दागे जा रहे अकाट्य पेनाल्टी शूटआउट ने खेल को फिर से बराबरी पर खड़ा किया। मैच पेनाल्टी शूटआउट तक पहुँची और परिणाम सबके सामने है। 

मैसी के 2006 से चली आ रही अंतहीन प्रतीक्षा को जैसे अपनी मंजिल प्राप्त हुई। उसे फिर से गोल्डन बॉल की उपाधि का हकदार घोषित किया गया और विश्वकप की ट्रॉफी का भी। गोल्डन बॉल की ट्रॉफी लेते हुए उसने विश्वकप की ट्रॉफी को ऐसे चूमा जैसे एक माता प्रसूति गृह से निकलने पर अपने नवजात को चूमती है।जैसे एक प्रमी सालों प्रतीक्षा के बाद एक दूसरे से मिलने पर चूमते हैं। जैसे एक युद्धबन्दी अपने घर लौटने पर अपने बच्चों को चूमता है...

अंत मे यह कि लोग आते हैं चले जाते रहगें। मेस्सी जैसा ना पहले कोई था ना दूसरा कोई होगा। एको अहं, द्वितीयो नास्ति, न भूतो न भविष्यति....