मंगलवार, 28 फ़रवरी 2017

क्या कहूँ

एक प्रश्न है , सडा - पचा है ,आप इसे यक्ष प्रश्न भी कह सकते हैं , की क्या,देश के सारे बुद्धिजीवी छात्र  कुछ चुनिंदा विश्वविद्यालयों में ही पड़ते हैं ? की क्या सारे ब्यूरोक्रेट्स यहीं से पास आउट होते है ?की क्या सारे इंडस्लिट्रीयलिस्ट यहीं की डिग्री ले के देश की अर्थव्यवस्था में रीढ़ की हड्डी के रूप में स्थापित होते हैं । सारे डॉक्टर, इंजीनयर , चार्टेड अकाउंटेंट , शिक्षक फार्मासिस्ट, मैनेजमेंट कर्ता   सब के सब यहीं से पासआउट हुवे होते हैं क्या ?

नहीं ना !

ये ठीक है की यहाँ शिक्षा का स्तर देश के अन्य विश्वविद्यालयों की तुलना में कहीं ज़्यादा मजबूत और सुदृढ़ है , तुम सब जो यहाँ पढ़ते हो सामान्य से ज़्यादा मेधावी हो , और कुछ विशेष गुणसंपन्न भी हो , जिन्हें अपने वर्तमान और अपने भविष्य की चिंता छोड़ अपने कौम और अपने मज़हब की चिंता ज्यादा होती है । जिन्हें अपने अभिव्यक्ति के आज़ादी की चिंता ज्यादा होती है , जिन्हें "बोल की लब आज़ाद हैं तेरे " वाला जुमला ज्यादा पसंद होता है ।
पर इसका कहीं से ये मतलब नहीं निकलता है की देश के बाकि बचे विश्वविद्यालयों में भूसगोल छात्र ही पड़ते हैं , यहाँ के ख़ान से भी   वो सारे हिरे निकलते हैं जिनकी देश को ज़रूरत होती है , ऐसा नहीं है की पढ़ाई के दौरान उन्हें अपने वर्तमान और भविष्य की चिंता नहीं रहती है । ऐसा नहीं है की उन्हें अपने अभिव्यक्ति  की आज़ादी के प्रति सवेंदनशीलता नगण्य होती है , ऐसा नहीं है की छोटे मोटे  झगड़े यहाँ नहीं होते है ,होता है सब कुछ होता है ,  पर यहाँ तुम्हारे तरह का ज़ाहिलपना नहीं होता है , यहाँ के छात्र को आज भी अपने गार्जन के पास अपनी शिकायत चले जाने का डर रहता है ,  और असल बात ये है की ये सभी अपने आप को उतने शिक्षित नहीं मानते हैं की अपने अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए अपने देश और राष्ट्र के प्रति ही अपना स्वर मुखर कर ले ।

हाँ एक बडी समस्या ये ज़रूर हो रही है की तुम्हारे इस निराधार विरोध के ज़हर की तपिस अब कुछ छोटे मोठे और शांत से रहने वाले विश्वविद्यालयों में भी देखि जाने लगी है जो निश्चित ही चिंताजनक स्थिति है ।

तुम एलीट टाइप के छात्र से तो कोई अनुरोध भी मात्र बेवकूफ़ी ही है , हाँ उन छोटे तामाम विश्विद्यालयों के छात्रों से तो सरकार को वार्तालाप ज़ारी रखनी चाहिए जिन्हें वास्तविक रूप से इस देश के प्रति सम्मान है , जो वास्तविक रूप से देश के निर्माण में अपनी महवत्पूर्ण भूमिका निभाने वाले है , और जिन्हें आज भी अपने देश के प्रति अपने राज्य के प्रति , अपने परिवार के प्रति सम्मान है और जो इन घनघोर रूप से राष्ट्रविरोधीयों के नज़र में पहले निवाले के रूप में देखे जा रहे हैं !!

रविवार, 26 फ़रवरी 2017

डर बनाम मज़बूरी

डर बनाम मज़बूरी
(चेचरि पूल)

जब आपका गला सुखने लगता है , छाती भारी होने लगता है ,  हिम्मत एक क़दम आगे चल कर दो क़दम पीछे सरका लेता है , ज़मीन  आगे चलने लगती है और आप पीछे खिसकने लगते हैं । आप  हिम्मत की पीठ को हल्के हाथों से थप-थपाते हैं और कहते हैं तुम कर सकते हैं। 

अबे ! नहीं  होगा मुझसे यार ! हिम्मत आपके हाथ को झिड़कते हुवे जवाब देता है ।

देखो  बाकि लोग भी कर रहे हैं , तुमसे दुबले , तुमसे छोटे , तुमसे मोटे  , औरत और बच्चे भी ! 

अनपढ़ हैं सब के सब गँवार हैं  , कोई अपना दिमाग़ नहीं लगा रहा है  , जान जोखिम में डालना कोई हिम्मत का काम है ! देखो तो  पैर कैसे फ़िसल रहा है , गिरे तो गए । मरना तय है ।

अबे देख यार वो 8 महीने की गर्भवती महिला अपने तिन साल के लड़के को गोद में उठा के अपना संतुलन बनाये इतने आत्मविश्वास के साथ आगे बढे हुवे आ रही है , फ़िर तुम तो फिट फोर हो ।

हिम्मत मुँह चिढाता है  , उसके मर्दाने अहम के गालों पर यह ज़ोरदार चाटा  था । अपनी सारी हिम्मत बटोर कर हिम्मत आगे बढ़ता है ।

"चेचरि पूल " पर उसके पड़ते हुवे क़दम से उठते आवाज़ और पूल में उठे कंम्पन्न को नजरअंदाज करते हुवे अब वह बीचो- बिच था , पानी की तेज़ बहाव पर नजरें गयी  । वह सन्न सा रह गया , डर विकराल जाल लिए उसे चारों ओर से घेरने लगा था , पैरों में फ़िसलन ज़्यादा महशूस होने लगी थी । चार फ़िट का एकतरफ़ा रास्ता जिसका वज़ूद नदी के तेज़ बहाव के बिच बांस के बल्लियों के सहारे टिका हुवा था मरात्तक भय को जन्म दे रहा था । वह किमकर्त्तव्य विमूढ़ सा था , पीछे वह लोट नहीं सकता था और आगे जाने की हिम्मत उसमे बची नहीं थी ।
पूल में एकाएक कम्पन्न तेज उठने  लगी थी ।  पीछे क़रीब दस और लोग आ गए थे । जान बचानी थी तो आगे बढ़ना था । अब कोई स्पेस बचा नहीं था स्केप करने के लिए । टाईम था  डर पर हिम्मत के हावी होने का , और फिर कुछ वैसा ही हुवा , डर भागते हुवे भूत  की तरह  पीछे छूटता जा रहा था , जूते की फ़िसलन ग़ायब थी पूल स्थिर हो गया था । थोड़ी देर में उसके पैरों के निचे स्थिर ज़मीन थी ।

जीत डर के स्थाई हार पर अट्टहास करने लगा था । पीछे मुड़ कर चेचरि पूल पर लोगों को आते जाते गौर से देखा , हर चेहरा डर पर स्थाई जित की गवाही दे रहा था ।

फ़िर कुछ देर और विचार किया गया कहीं यह मज़बूरी तो नहीं ?
कौन आपने जीवन को जोखिम में डालता है , हिम्मत ने प्रचंड आवाज़ से उत्तर दिया !

अब आगे बढ़ने का समय था ।