कुत्ते को लड़ते कभी ना कभी तो देखा ही होगा आपने , थोडा सोचिये तो कैसे चेहरा बनाता है , दाँत बाहर मुँह खुला, जीभ बाहर , हल्ला करते हुए एक दसरे पर हावी होने की भरजोर कोशिश। कई मुहावरे भी बने इनके लड़ाई पर , सोचने से हँसी तो आती है की कुत्ते की तरह क्यों हल्ला कर रहे हैं । खेर हल्ला से ध्यान आया दो तीन दिन पहले झारखंड विधान सभा में CNT- SPT संशोधन विधेयक पर मचे शोर-शराबै , हो -हंगामे , कुर्सी फैंक परफॉर्मेन्स पर । वही स्थिति थी , मुँह खुला , दाँत बाहर , जीभ बाहर , हल्ला करते हुए एक दूसरे पर हावी होने की भरपूर कोशिश ! अंग्रेज़ो ने यह नियम बनाया था की छोटानागपुर और संथाल परगना के आदिवासियों के जमीन को ना तो खरीदा जा सकता है और ना ही बेचा जा सकता है। समय बदला नियम बदले , संशोधन हुए और आज भी संशोधन जारी है । समय बदला लोग बदले पर एक चीज जो नहीं बदली वो ये की जमीन पहले भी बेचे जाते थे, आज भी बेचे जा रहे हैं और आगे भी बेचे जाते रहेंगे । बस अंतर ये हो गया है की आम बोलचाल की भाषा में जमीन की क़िस्म दो तरह की हो गयी है । सेलेबल और नोनसेलेबल। (नोंनसेलबेल जमीन खरीददार को 90 सालों के लिए लीज़ पर दिया जाता है और बाद में यह फिर से उसके असल मालिकाना हक रखने वाले के पास आ जाता है । यह एक वैधानिक नियम है पर असल में प्रयोग होता नहीं है )। अधिकांश छोटे जिले, अनुमण्डल, कस्बे का बड़ा हिस्सा नोंनसेलेबल जमीन पर बसा हुआ है या बसने की तैयारी कर रहा है । गांव से पलायन जारी है , शहरीकरण जारी है , सेलेबल जमीन घट रहे हैं तो लोग जाये तो कहा जाये , फिर चाहे जमीन संथाल की हो या किसी और की । एक बात और की इसमे हर्ज़ कहाँ है और किस हिसाब से है, की लोग कुर्सी फैकने और मारने मारने पर आमादा हो गए हैं।
जब सेलेबल जमीन के मालिकाना हक रखने वाले उसे अपनी जरूरत के हिसाब से बेच सकते हैं तो फिर नोंनसेलबेल वाले क्यों नहीं ?? एक महत्वपूर्ण बात ये की जमीन अगर नॉनसेलेबल हुई तो कीमत सीधे आधी भले ही वह बाजार के कितने ही पास क्यों न हो अगर बेचने वाले की जरुरत भी हो तब भी उसे ठीक दाम नहीं मिल पता है , और हाँ जो लोग हल्ला - चिल्ला कर रहे थे ना' यकीं मानिये उनके पास भी जमीन है वो भी नोंसेलबेल वाली जिनका मालिकाना हक किसी दूसरे के पास ही है । खेर संशोधन जरुरी है और जारी रहना चाइये यह अच्छा है खरीदने वाले के लिए और बेचने वाले के लिए भी !