शनिवार, 26 नवंबर 2016

जमीन बेची जा सकती है

कुत्ते को लड़ते कभी ना कभी तो देखा ही होगा आपने ,  थोडा सोचिये तो कैसे चेहरा बनाता है , दाँत बाहर मुँह खुला, जीभ बाहर ,  हल्ला करते हुए एक दसरे पर हावी होने की भरजोर कोशिश। कई मुहावरे भी बने इनके लड़ाई पर , सोचने से हँसी तो आती है  की कुत्ते की तरह क्यों हल्ला कर रहे हैं । खेर हल्ला से ध्यान आया  दो तीन दिन पहले झारखंड विधान सभा में  CNT- SPT संशोधन विधेयक पर मचे शोर-शराबै , हो -हंगामे , कुर्सी फैंक परफॉर्मेन्स पर । वही स्थिति  थी , मुँह खुला ,  दाँत बाहर , जीभ बाहर ,   हल्ला करते हुए एक दूसरे पर हावी होने की भरपूर कोशिश ! अंग्रेज़ो ने यह नियम बनाया था की छोटानागपुर और संथाल परगना के आदिवासियों के जमीन को ना तो खरीदा जा सकता है और ना ही  बेचा जा  सकता है।  समय बदला नियम बदले , संशोधन हुए और आज भी संशोधन जारी है । समय बदला लोग बदले पर एक चीज जो नहीं बदली वो ये की जमीन पहले भी बेचे जाते थे, आज भी बेचे जा रहे हैं और आगे भी बेचे जाते रहेंगे । बस अंतर ये हो गया है की आम बोलचाल की भाषा में  जमीन की क़िस्म दो तरह की हो गयी है । सेलेबल और नोनसेलेबल।  (नोंनसेलबेल जमीन खरीददार को  90 सालों के लिए लीज़ पर दिया जाता है और बाद में यह फिर से उसके असल मालिकाना हक रखने वाले के पास आ जाता है । यह एक वैधानिक नियम है पर असल में प्रयोग होता नहीं है )। अधिकांश छोटे  जिले, अनुमण्डल,  कस्बे  का बड़ा हिस्सा  नोंनसेलेबल जमीन पर बसा हुआ है या बसने की तैयारी कर रहा  है । गांव से पलायन जारी है , शहरीकरण जारी है , सेलेबल जमीन घट रहे हैं तो लोग जाये तो कहा जाये , फिर चाहे जमीन संथाल की हो या किसी और की । एक बात और की इसमे हर्ज़ कहाँ है और किस हिसाब से है, की लोग कुर्सी फैकने और मारने मारने पर आमादा हो गए हैं।

जब सेलेबल जमीन के मालिकाना हक रखने वाले उसे अपनी जरूरत के हिसाब से बेच सकते हैं तो फिर नोंनसेलबेल वाले क्यों नहीं ?? एक महत्वपूर्ण बात ये  की जमीन अगर नॉनसेलेबल हुई तो कीमत सीधे आधी  भले ही वह बाजार के कितने ही पास क्यों न हो अगर बेचने वाले की जरुरत भी हो तब भी उसे ठीक दाम नहीं मिल पता है , और हाँ जो लोग हल्ला - चिल्ला कर रहे थे ना' यकीं मानिये उनके पास भी जमीन है वो भी नोंसेलबेल वाली जिनका मालिकाना हक किसी दूसरे के पास ही है  । खेर संशोधन जरुरी है और जारी रहना चाइये यह अच्छा है खरीदने वाले के लिए और बेचने वाले के लिए भी !

मंगलवार, 22 नवंबर 2016

नोकरी उर्फ नोकर

यह ठीक है की  कफ़न में जेब नहीं होता है और कोई  कितना ही क्यों न कमा - धमा ले कोई लाद बोज के साथ तो  ले जाता नहीं ।   सब कुछ यही छुट जाता है , सब के अलावे  केस, फरियाद, मुकदमा, झगड़ा, झमेला , भी । कुछ  दुआ और इज्जत  ले जाते हैं  और बाकि बचे  बोरी भर कर गालि और गलौज ( लोगों का बस चले तो जूतम -पेल भी साथ में भेज दें) । कुछ थोड़े लोग बहुतो के लिए बहुत कुछ छोड़ जाते है जिसे लेकर लोग, समुदाय , गाँव, क़स्बा ,शहर, राज्य और देश आगे बढ़ता रहता है , ये अलग बात है की सोनिया पप्पू को छोड़ रही है और अमेरिका ट्रम्प को ! खैर इस भिष्ण गूढ़ ब्रम्ह ज्ञान का आभास होते हुए भी, और इस चिंता को दरकिनार करते हुए की लोग मेरे जाने के बाद मेरे साथ में क्या दे के भेजेंगे ,  "घर" और बुजुर्ग होते माता पिता को  छोड़ कर नोकरी पर जाने के अलावे कोई और दूसरा विकल्प नहीं बचता है । पिछले 10 सालों के दौरान जब -जब नोकरी के लिए घर को छोड़ता हूँ ,कसम से (आप चाहे जो भी कसम खिला लें हम खा लेंगें) मन भारी हो जाता है , लगता है घर, घर नही रहा मायका हो गया है । एक बात जो दिल और दिमाग को हमेसा चुटकी काटते रहती है वो ये की बेटा ये नहीं करोगे तो खाओगे क्या और खिलाओगे क्या ???? तुम्हारे पास इसके अलावे है  क्या ???? यक्ष प्रश्न सामने  !! जवाब ढूँढने की कोसिस होती है , उत्तर आता है :- पापा की  नोकरी ; ना वो उनकी है , खेती ; वो तो भगवान भरोसे है अगर थोडा बहुत हो भी जाता है तो थोडा ही है !   बाकि कुछ बचता नहीं है । दिमागी युधिस्ठिर शांत , निःशब्द और मौन रह जाता है । यक्ष जीत जाता  है ।  दिमाग दिल के भावनावों को रौंदते हुए ममता के बंधन को क्षत -वीक्षत करते हुए यह एकल आदेस पारित करता है की मोह मोह के धागे को तोड़ो और अपनी लुटिया समेटो । 

बचपन से ही दिमाग में एक चीज भर दी जाती है अपने यहाँ  बड़े हो के नोकरी करना  पड़ेगा , बहार रहना होगा , सब तरह से तैयारी करना है, नहीं तो भूखे मारोगे , कोई दूसरा उपाय नहीं है । बस वही किये जा रहा हूँ ।  जी रहा हूँ बस जिए जा रहा हूँ ।