रविवार, 18 अक्टूबर 2015

काल्पनिक मित्र


सप्ताहांत होने  के कारण  मित्रों के साथ  छोटे से शहर  के सबसे  बड़े  रेस्तराँ  (बड़े  शहरों  के छोटे  रेस्तराँ  जैसा ) में  रात्रि भोज का आयोजन  था ।
आयोजन  धीमें - धीमे  अपनी रफ्तार  पकड़  रहा  था!  मेरा ध्यान बगल वाली मेज पर बैठे  परिवार ( हम दो हमारे  दो)   जो पहनावे और बातचीत  से उच्च  मध्यम वर्गीय समाज  का हिस्सा जान पड रहे थे, के मुखिया  पर बरबस  ही आकर रुक जा रही थी । 
यूँ  तो कहने को वो चार लोग एक साथ बैठे  हुए  थे पर उन  चारों  के बीच  अप्रतक्ष रुप से  एक पाँचवाॅ भी जुड़ा हुआ  था/ थी,  जिसे  बोलचाल  में  भरचुअल मित्र भी कहते  हें और उनका  सुपुत्र लगातार  उससे  बात (चैट) करने  में  मसगुल था ।

पिता  नें कहा क्या लोगे बेटा? 
बेटे नें चोंकते हुए अपने  समार्ट फोन से ऊॅगलियां हटाया, 
ऊूँ ???

पिता  नें फिर वही  सवाल  दोहराया,  क्या लोगे बेटा? 
आपलोग जो चाहो ! 

पिता  नें अपनी  बेटी  से भी यही सवाल  किया किन्तु   संतोष जनक उत्तर नहीं पा के थोड़े  झल्ला रहे थे !  खैर मीनू  ऑडर कर दिया  गया ।
उनके आपसी बातचीत से यह पता चल रहा था  की बेटे का  किसी अच्छे संस्थान में  पठन -पाठन चल रहा था और अगले  दिन वह घर से  फिर पढ़ाई के लिए  जा रहा है
फोन की बजती लगातार  बीप परिवार  के हंसी-मजाक को हर बार विराम  दिये जा रही थी !  उसे अपने  परिवार के हंसी -मजाक से ज्यादा दिलचस्पी उस भरचुअल मित्र में था जो देश या दुनिया  के किसी  कोने  में  बैठा/बैठी  हुआ /हुई  था/थी ।
उनकी  सुपुत्री का भी कमोबेश यही हाल था ।वह भी जब - तब नजरें बचा के अपने  फौन को देख ही रही थी ।

पिता  नें झल्लाहट भरे नजरों  से अपनी  पत्नी की तरफ देखा  ! ऑखें सवाल पूछ रही थी !  क्या हो रहा है ये सब?     पत्नी नें भी नजरों  की भाषा  में  ही उत्तर दिया !  शांत  हो जाइए  ये यंग जैनेरेसन है आपकी तरह थोड़े  बुढ्ढे हो गयें हैं  !  पिता  भी अपने  आप को यह समझाते  हुए शांत कर गये जैसे  मानो यही कटु सत्य  हो ।  परंतु  अब माहौल  में  नाराजगी  स्पष्ट रुप से  झलक  रही थी ।

खाना  मेज पर आ चुका  था,  प्लेटें सज चुकी  थी!  बेटा  तुभ भी खाओ,  माँ  ने बेटे  से कहा ।

पिता   ने  गुस्साए नजरों  से पत्नी की और फिर  देखा,  इस  बार पत्नी की ऑखों से कोई  प्रत्युतर नहीं  आया नजरें  केवल यहीं कह रही थी "हम कर भी क्या सकते हैं ????

और मैं  ये सब अपने  टेबल पर बैठे  हुए देख रहा था,  पार्टी का आनंद घटने लगा था!!!!! :- रामकृपाल

डायरी के पन्नों से (किसान )

किसान  ।।

बस यूँ  ही

फिर  एक पुरानी कहावत लगातार  याद आ रहीहै ! 

"गरीबैं नै करीयै गरब !
जैहै दिन  दाल भात सैहे दिन  परब !  "
(शाब्दिक अर्थ :- गरीब को घमंण्ड नहीं  हो सकता 
                         जिस दिन  दाल - चावल नसीब हो जाए
                         वो दिन ही त्योहार समान हो जाता  है )

गरीबों के संद॔भ में ये  बातें  आज  के अत्याधुनिक डिजिटल इंडिया  में भी उतनी ही सटीक और सत्यपरक मालूम  पडती  है जितना  की आज से 15-20 साल पहले  ।
गरीबों के यंहा दाल और थाल में  मानो आपसी  रक्त - रंजीस छिड़ी हुई  है !   प्याज  मुँह  फुलाये हुए  बैठा हुआ है । बड़े  ही मान - मन्नौवल्ल   से किसी - किसी   दिन  इन सबों मै आपसी सहमति  बनती भी है तो यह सहमति छनिक ही होती है । 

केवल यही नहीं  यकीन  मानिए हम - आप में  से बहुतों  घरों  में  प्याज - दाल  के उपयोग  पर कुछ  ना कुछ  नियंत्रण लगा ही है ।

डिजिटल  इंडिया से याद आया पिछले  दिनों   जुकरब॔ग साहब के बेजोड प्रयोग ने,  (चाहे उनका  इरादा   किसी  कम्पनी का विज्ञापन करना ही क्यों ना रहा हो,  और  हंलाकी  जिसे बाद में  हटा ही क्यों ना लिया  गया हो)    हम आप सभी नें उनके इस अनुपम प्रयोग को  धव्नीमत से  अपनाया ही नहीं  बल्कि  जोरदार और  धुआँधार  तरिके से  इसका प्रचार -प्रसार भी किया । चाहे  आपने इसे  श्वैक्षीक अभिव्यक्ति  के पक्षधर के रूप में   या किसी पुर्वाग्रह  से ग्रसित होकर ही क्यों ना किया हो ।  खैर इसका सम॔थन होना ही चाहिए  क्योकी डिजीटल इंडिया अभियान आज के दौर का  महत्वपुण॔  ही नहीं  अपितु  आवश्यक अभियान  भी है ।

एक चिर सत्य यह भी है की  भारत गाँवों का देश है और सहर की संपूर्ण आबादी  अनाज के मामले में  गाँवों पर ही निर्भर रहती  है । और अनाज  की उपज निर्भर  रहती  है किसानों पर  अगर हम अपनी   थोडी सी सहभागिता, ध्यान,रुझान  किसान  और  किसानी  की  और भी  दें  जिससे    सरकार का ध्यान किसानों  पर बना रहे  और पैदावार की विकट  समस्या से  निपटने  का समुचित  समाधान  निकाला  जा सके तो गरीब  भी थाल और दाल के झगड़े  से मुक्ति  पा सकेंगे !   और फिर  बड़े   आराम  से कहेंगे  ! 
"दाल रोटी  खाएंगें और  प्रभू के गुन गाएंगें " ।
- रामकृपाल